असम में स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिजन भी NRC की अंतिम सूची से बाहर

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Updated: September 3, 2019, 1:15 PM IST
असम में स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिजन भी NRC की अंतिम सूची से बाहर
असम में बड़ी संख्‍या में ऐसे लोगों को भी एनआरसी की अंतिम सूची से बाहर कर दिया गया है, जिन्‍होंने नागरिकता साबित करने वाले सभी दस्‍तावेज अधिकारियों को उपलब्‍ध करा दिए थे.

असम में बांग्ला बोलने वाले हिंदू और मुस्लिमों की बड़ी आबादी को संदिग्‍ध मतदाता (Doubtful voter) का तमगा देकर एनआरसी (NRC) की अंतिम सूची (Final List) से बाहर कर दिया गया है. वहीं, गोरखा समुदाय के 23 हजार लोगों को भी 'D' Voters की सूची में डाल दिया गया है.

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प्रांजल बरुआ

गुवाहाटी : असम की मंजू देवी अपनी नागरिकता (Citizenship) साबित करने को लेकर बार-बार एक ही तरह के सवालों का जवाब देकर थक चुकी हैं. वह असम (Assam) के उन तमाम लोगों में एक हैं, जिनका नाम नेशनल रजिस्‍टर ऑफ सिटिजंस (NRC) की अंतिम सूची (Final List) में शामिल नहीं है. स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी (Freedom Fighter) चोबीलाल उपाध्‍याय की 55 वर्षीय पड़पोती मंजू देवी (Manju Devi) पूछती हैं कि क्‍या यह उत्‍पीड़न नहीं है? हमने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए एक जगह से दूसरी जगह चक्‍कर लगाए. इसके बाद भी हमें न्‍याय नहीं मिला और एनआरसी से बाहर कर दिया गया. इन्‍हें क्‍या लगता है कि हम बांग्‍लादेशी हैं?

मंजू देवी और उनके दो बच्‍चों को संदिग्‍ध मतदाता के तौर पर किया गया चिह्नित
मंजू देवी के परदादा चोबीलाल उपाध्‍याय 1921 में गठित असम प्रांतीय कांग्रेस समिति (Assam Provincial Congress Committee) के पहले अध्‍यक्ष थे, जो आजादी की लड़ाई के दौरान इंडियन नेशनल कांग्रेस (Indian National Congress) का हिस्‍सा थी. मंजू देवी ही नहीं उनके दो बच्‍चों को भी एनआरसी की अंतिम सूची में जगह नहीं मिली है. अधिकारियों ने मंजू देवी और उनके दोनों बच्‍चों को संदिग्‍ध मतदाता (Doubtful Voter) के तौर पर चिह्नित कर दिया है. मंजू देवी का कहना है कि अधिकारी मनमानी कर रहे हैं. उन्‍होंने बताया कि उनके खिलाफ फॉरनर्स ट्रिब्‍यूनल और असम सीमा पुलिस में कोई मामला लंबित नहीं है. मैंने आरटीआई (RTI) दाखिल की, अपनी नागरिकता के सभी दस्‍तावेज एनआरसी अधिकारियों को मुहैया कराए और उनकी ओर से मांग गए अन्‍य दस्‍तावेज भी उपलब्‍ध करा दिए. बावजूद इसके हमारे परिवार के लिए यह बुरा सपना खत्‍म ही नहीं हो रहा है.

मंजू देवी ही नहीं उनके दो बच्‍चों को भी एनआरसी की अंतिम सूची में जगह नहीं मिली है.


अनापत्ति प्रमाणपत्र पेश करने के बाद भी कर दिया गया अंतिम सूची से बाहर
सोनितपुर जिले के ढेकियाजुली की रहने वाली 56 वर्षीय माया देवी की कहानी भी कुछ अलग नहीं है. उन्‍हें भी संदिग्‍ध मतदाता बताकर अंतिम सूची से बाहर कर दिया गया है. उनका कहना है कि वह ढेकियाजुली सर्किल ऑफिस का अनापत्ति प्रमाणपत्र जमा कर चुकी हैं. इसके अलावा पुलिस ने भी पुष्टि कर दी है कि उनके खिलाफ संदिग्‍ध मतदाता का कोई केस लंबित नहीं है. उन्‍होंने कहा कि मैं हर सुनवाई के दौरान मौजूद रही और हर बार अनापत्ति प्रमाणपत्र पेश किया. इसके अलावा मैंने अपने स्‍कूल से जुड़े दस्‍तावेज भी पेश किए. वह 1970 में बोरजारानी मिकिर एलपी स्‍कूल में चौथी कक्षा में पढ़ती थीं, जिसमें उनकी जन्‍म तिथि 5 अप्रैल, 1961 लिखी है. उनकी जन्‍म तिथि एनआरसी की अंतिम सूची में शामिल होने के लिए तय तारीख 24 मार्च, 1971 से काफी पहले की है. वह पूछती हैं कि इसके बाद भी मुझे परेशान होने के लिए क्‍यों छोड़ दिया गया? इस गलती के लिए कौन जिम्‍मेदार है?
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गोरखा समुदाय के 23 हजार लोगों को 'D' Voters की सूची में डाला
असम में बांग्ला बोलने वाले हिंदू और मुस्लिमों की बड़ी आबादी को संदिग्‍ध मतदाता (Doubtful voter) का तमगा दे दिया गया है. वहीं, गोरखा समुदाय के 23 हजार लोगों को भी 'D' Voters की सूची में डाल दिया गया है. इतिहासकारों का मानना है कि असम में रहने वाले गोरखा समुदाय की जड़ें राज्‍य में आजादी से पहले से हैं. इनमें ज्‍यादातर को ब्रिटिश शासकों द्वारा नेपाल से सैनिकों के तौर पर असम लाया गया था. वहीं, काफी लोगों को सड़क निर्माण और चाय के बागानों में काम करने वाले मजदूरों के तौर पर यहां बसाया गया था. इसके अलावा ब्रिटिश अधिकारी गोरखा समुदाय के लोगों को रेलवे निर्माण के लिए, कोयला उद्योग और खेती-किसानी में मजदूरों के तौर पर इस्‍तेमाल करने के लिए लाए थे.

'साजिश के तहत जानबूझकर गोरखा समुदाय का उत्‍पीड़न किया जा रहा है'
असम गोरखा सम्‍मेलन के पूर्व सचिव दीपक निरोला का आरोप है कि साजिश के तहत जानबूझकर गोरखा समुदाय का उत्‍पीड़न किया जा रहा है. उनके मुताबिक, गृह मंत्रालय के पिछले नोटिस में स्‍पष्‍ट किया गया था कि नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के तहत अगर किसी गोरखा समुदाय के व्‍यक्ति का जन्‍म असम में हुआ है या पंजीकरण के जरिये नागरिकता हासिल की है या संविधान के प्रभावी होने के दौरान भारत में था तो वह विदेशी नहीं है. साथ ही अधिसूचना में असम सरकार को ऐसे मामलों को फॉरनर्स ट्रिब्‍यूनल को नहीं भेजने का निर्देश दिया गया था. इसके बावजूद आज बड़ी संख्‍या में गोरखा समुदाय के लोगों को ट्रिब्‍यूनल का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है. असम में भारतीय गोरखा परिसंघ के अध्‍यक्ष नित्‍यानंद उपाध्‍याय के मुताबिक करीब एक लाख गोरखा लोगों को असम में अंतिम सूची से बाहर कर दिया गया है.

पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, केंद्र सरकार को ध्‍यान रखना चाहिए कि वास्‍तविक भारतीय सूची से बाहर न रह जाएं.


ममता बनर्जी ने केंद्र को दी वास्‍तविक भारतीयों का ध्‍यान रखने की सलाह
चुनाव आयोग ने 1997 में मतदाता सूची में किए गए संशोधन के दौरान आदेश दिया कि जो मतदाता अपनी नागरिकता साबित करने में नाकाम रहे हैं उनके नाम के आगे संदिग्‍ध मतदाता दर्ज कर दिया जाए. ऐसे सभी मामलों को राज्‍य में स्‍थापित फॉरनर्स ट्रिब्‍यूनल के पास भेज दिया गया. संदिग्‍ध मतदाता के तौर पर चिह्नित लोगों को मतदाता पहचान पत्र जारी नहीं किया जाता है और वे वोट भी नहीं डाल सकते हैं. शुरू से ही एनआरसी का विरोध कर रहीं पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि एक लाख से ज्‍यादा गोरखा समुदाय के लोगों का एनआरसी की अंतिम सूची से बाहर होना चौंकाने वाला है. ममता ने ट्वीट किया, केंद्र सरकार को ध्‍यान रखना चाहिए कि वास्‍तविक भारतीय सूची से बाहर न रह जाएं. वहीं, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता बिनय तमांग ने जल्‍द ही एक प्रतिनिधिमंडल के असम का दौरा करने की घोषणा की है.

दार्जिलिंग के सांसद राजू बिस्‍ता ने तमाम आरोपों को किया खारिज
दार्जिलिंग के सांसद राजू बिस्‍ता ने तमाम आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि एक लाख से ज्‍यादा गोरखा समुदाय के लोगों को अंतिम सूची से बाहर रखने की बातें अफवाह हैं. ऐसे सभी आरोप निराधार हैं. ये आंकड़े कुछ लोगों का अपना अंदाजा है. सूची से बाहर रखे गए लोगों के वास्‍तविक व आधिकारिक आंकड़े आने में कुछ दिन और लगेंगे. उन्‍होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल गलत सूचनाएं फैलाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं. ऐसे लोग राजनीतिक फायदा लेने की मंशा से अफवाहें फैला रहे हैं. मैं उनसे आग्रह करता हूं कि वे इस मुद्दे पर सियासत न करें. आधिकारिक आंकड़े आने तक लोग शांत रहें.

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First published: September 3, 2019, 12:58 PM IST
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