क्या है लिपुलेख विवाद, क्यों इसको लेकर नेपाल में भारत के लिए बरपा गुस्सा

क्या है लिपुलेख विवाद, क्यों इसको लेकर नेपाल में भारत के लिए बरपा गुस्सा
भारत ने कई साल की मेहनत के बाद लिपुलेख दर्र तक नया सड़क मार्ग तैयार किया है, जिसे लेकर नेपाल से विवाद हो गया है

भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख दर्रे तक बनाई गई 80 किलोमीटर की लिंक रोड भी विवाद का विषय बन गई है. इसे लेकर नेपाल में नाराजगी है. भारत जहां इस इलाके पर अपना दावा करता रहा है, वहीं नेपाल ने इसे अपना बताया है. क्या है ये पूरा मामला और ये सड़क क्यों भारत के लिए महत्व रखती है

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दो दिन पहले भारत ने लिपुलेख (Lipulekh Pass) तक 80 किलोमीटर लंबा एक सड़क मार्ग तैयार किया था. जिसका रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो द्वारा उद्घाटन किया था. ये सड़क चीन सीमा तक आखिरी भारतीय चौकी तक पहुंचती है. लेकिन इस सड़क परियोजना को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है. क्योंकि नेपाल का कहना है कि ये उसका इलाका है, जिस पर भारत अतिक्रमण कर रहा है.

नेपाल में यह मामला इस क़दर गर्म है कि ना केवल इसे संसद में उठाया गया बल्कि काठमांडू में भारतीय दूतावास के सामने इसके विरोध में जमकर प्रदर्शन भी हुआ. ये सड़क उत्तराखंड राज्य के घाटियाबागढ़ को हिमालय क्षेत्र में स्थित लिपुलेख दर्रे से जोड़ती है. भारत सरकार के समाचार सेवा प्रभाग के अनुसार, सीमा सड़क संगठन ने धारचुला से लिपुलेख तक सड़क निर्माण कार्य पूरा किया है.

कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्रियों को 80 किलोमीटर की यह सड़क बनने के बाद लंबे रास्‍ते की कठिनाई से राहत मिलेगी और गाड़ियां चीन की सीमा तक जा सकेंगी. धारचुला-लिपुलेख रोड, पिथौरागढ़-तवाघाट-घाटियाबागढ़ रूट का विस्‍तार है. ये सड़क घाटियाबागढ़ से शुरू होकर लिपुलेख दर्रे पर ख़त्म होती है जो कैलाश मानसरोवर का प्रवेश द्वार है



क्या ये विवादित क्षेत्र है
लिपुलेख ला या लिपुलेख दर्रा या लिपुलेख भञ्ज्याङ हिमालय का एक पहाड़ी दर्रा है जो एक विवादित क्षेत्र है. 'ला' तिब्बती शब्द है. इसका अर्थ दर्रा होता है. ये नेपाल के धार्चुला जिला ब्यास गांउपालिका में है लेकिन इस क्षेत्र पर 1962 से ही भारत का कब्जा रहा है.

यह क्षेत्र भारत के उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं क्षेत्र को तिब्बत के तकलाकोट (पुरंग) शहर से जोड़ता है. यह प्राचीनकाल से व्यापारियों और तीर्थयात्रियों द्वारा भारत और तिब्बत के बीच आने-जाने के लिए प्रयोग किया जा रहा है.

दो दिन पहले ही 80 किलोमीटर के इस महत्वपूर्ण लिंक मार्ग का रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो के जरिए उद्घाटन किया था


नेपाल का क्या कहना है
नेपाल का दावा है कि लिपुलेख दर्रा उसका इलाक़ा है. इस दावे के पक्ष में नेपाल ने 1816 की सुगौली संधि का हवाला भी दिया है.नेपाल का कहना है कि सुगौली संधि भारत के साथ उसकी पश्चिमी सीमा का निर्धारण करती है. संधि के तहत महाकाली नदी के पूरब का इलाक़ा जिसमें लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख शामिल हैं, नेपाल के क्षेत्र हैं.

इतना ही नहीं लिपुलेख दर्रे से लगे और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कालापानी के इलाक़े पर नेपाल अपना दावा करता है. हालांकि साल 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से ही कालापानी में भारतीय सैनिक तैनात हैं. नेपाल के विदेश मंत्रालय ने शनिवार को एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा, "भारत की ये एकतरफ़ा कार्रवाई दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को बातचीत के ज़रिए सुलझाने को लेकर बनी सहमति के ख़िलाफ़ है."

भारत का क्या दावा है
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने 09 मई को कहा, "हाल ही में पिथौरागढ़ ज़िले में जिस सड़क का उद्घाटन हुआ है, वो पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र में पड़ता है. कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्री इसी सड़क से जाते हैं."

नए लिंक मार्ग से क्या आसान हुआ है
भारत ने ये जो सड़क लिंक तैयार किया था, उसके दो उद्देश्य थे. पहला कैलाश मानसरोवर यात्रा को सुगम करना और दूसरा चीन सीमा पर स्थित भारत की आखिरी चौकी पर जल्दी पहुंचना. पहले जब ये सड़क नहीं थी, तब इस जगह तक पहुंचने के लिए तीन दिन लगते थे, अब इस 80 किलोमीटर के लिंक मार्ग के बनने के बाद केवल 03-04 घंटे ही लगेंगे.

लिपुलेख दर्रे का प्राचीन काल से काफी महत्व रहा है, यही वो रास्ता है, जहां से होकर भारत और तिब्बत के बीच व्यापार होता था और तीर्थ यात्री कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाते थे


इस दर्रे की स्थिति और महत्व क्या है
ये 5,334 मीटर (17,500 फीट) की ऊंचाई पर है. प्राचीन काल में तो इसका बहुत महत्व था, क्योंकि भारत-तिब्बत के बीच आने-जाने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन मानसून में भूस्खलन तथा ठंड में बर्फ से ढंका होने के कारण इस दर्रे से आना-जाना बहुत मुश्किल हो जाता है.

क्या प्राचीन काल में इसी रास्ते का इस्तेमाल होता था
उत्तराखंड से लगी चीन सीमा पर लिपुलेख दर्रे से 1991 से भारत-चीन व्यापार शुरू किया गया था. गौरतलब है कि भारत-चीन के बीच अपनी तरह का यह एकमात्र जमीनी व्यापार मार्ग है. हालांकि दो साल पहले नाथुला दर्रे को भी खोल दिया गया था लेकिन वहां से नाममात्र का ही व्यापार होता है.

लिपुलेख के ताजा विवाद से पहले भारत और नेपाल के बीच कुछ समय पहले कालापानी इलाके को भी लेकर बड़ा विवाद हो चुका है. नेपाल में भारत विरोधी प्रदर्शन भी हुए हैं. हालांकि माना जाता है कि चीन लगातार नेपाल में भारत विरोधी भावनाएं भड़काता रहा है


कालापानी विवाद क्या है
पिछले साल भारत ने कालापानी को अपने नक्शे में दिखाया जिसे लेकर भी नेपाल ने विरोध जताया था. कालापानी उत्तराखंड के पिथौड़ागढ़ ज़िले में 35 वर्ग किलोमीटर ज़मीन है. यहां इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के जवान तैनात हैं. भारतीय राज्य उत्तराखंड की नेपाल से 80.5 किलोमीटर की सीमा लगती है और 344 किलोमीटर चीन से. काली नदी का उद्गम स्थल कालापानी ही है. भारत ने इस नदी को भी नए नक्शे में शामिल किया है. 1816 में ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच सुगौली संधि हुई थी.
तब काली नदी को पश्चिमी सीमा पर ईस्ट इंडिया और नेपाल के बीच रेखांकित किया गया था. 1962 में भारत और चीन में युद्ध हुआ तो भारतीय सेना ने कालापानी में चौकी बनाई. नेपाल का दावा है कि 1961 में यानी भारत-चीन युद्ध से पहले नेपाल ने यहां जनगणना करवाई थी और तब भारत ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी. नेपाल का कहना है कि कालापानी में भारत की मौजूदगी सुगौली संधि का उल्लंघन है.

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