जुलाई-अगस्त में क्या बच्चों को स्कूल भेजना आग से खेलना साबित होगा?

जुलाई-अगस्त में क्या बच्चों को स्कूल भेजना आग से खेलना साबित होगा?
कोरोना वायरस के चलते कई राज्यों में परीक्षाएं स्थगित या रद्द कर दी गईं हैं.

मार्च के महीने में देश भर में स्कूलों को बंद कर दिया गया था. Lockdown देख चुके देश को अब Unlock-1 देखना है. चूंकि देश में Coronavirus संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं और विशेषज्ञ और खतरनाक हाल निकट भविष्य में देख रहे हैं तो स्कूल खोले जाने (Schools Reopening) और बच्चों को स्कूल भेजने का मुद्दा गंभीर हो गया है.

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देश में कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अब स्थिति कम्युनिटी ट्रांसमिशन (Community Transmission) की हो चुकी है और Covid-19 का सबसे बुरा दौर आना अभी बाकी है. देश में कई जगहों पर स्कूल खोले जाने की नई तारीखें या टाइमलाइन सामने आ रही है, लेकिन अभिभावकों (Parents) के लिए यह जानना ज़रूरी है कि उन्हें अपने बच्चों को स्कूल भेजने का फैसला कैसे करना चाहिए.

विशेषज्ञ सलाह दे चुके हैं कि स्कूल खोले जाने में जल्दबाज़ी न की जाए वरना अंजाम खतरनाक हो सकता है जैसे इज़राइल (Israel) में दिख रहा है. वहीं, लाखों से करोड़ों की संख्या में अभिभावक बच्चों की सेहत की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं. बड़ी संख्या में अभिभावक तय कर रहे हैं कि सरकार कुछ भी फैसला करे, वो अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजेंगे. आइए समझें कि यह बड़ा मुद्दा कैसे बन गया है और अभिभावकों को कैसे फैसला करना चाहिए.

कब खोले जाने चाहिए स्कूल?
किसी राज्य में जून से तो कहीं जुलाई से स्कूल खोले जाने की खबरें सामने आ रही हैं. केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने ​कहा है कि 15 अगस्त के बाद से स्कूल खोले जाएंगे. लेकिन, विशेषज्ञ इन तारीखों को लेकर एकमत नहीं हैं. कर्नाटक के नेता प्रतिपक्ष सिद्धारमैया ने कहा है कि अक्टूबर तक स्कूल न खोले जाएं.
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कोविड 19 की वैक्सीन या पुख्ता इलाज आने तक स्कूल न खोले जाने की सलाह विशेषज्ञ दे रहे हैं. फाइल फोटो.


दिल्ली में स्कूल खोले जाने के सरकारी प्रस्ताव का विरोध करते हुए कांग्रेस नेता अजय माकन ने कहा है कि जब तक वैक्सीन न बने, स्कूल नहीं खोले जाने चाहिए. महाराष्ट्र सरकार को भी स्वास्थ्य सेक्टर के विशेषज्ञों ने स्कूल खोलने को लेकर जल्दबाज़ी न करने की सलाह दी थी.

इज़रायल में हुआ भयानक अंजाम
कुछ ही हफ्तों पहले इज़रायल में स्कूल खोलने के आदेश दिए गए थे लेकिन अब फिर सरकार ने स्कूल बंद करने के आदेश दे दिए. कारण यह कि कोरोना के संक्रमण से अब तक 217 स्कूली बच्चे और शिक्षकों को संक्रमित पाया जा चुका है और करीब 10 हज़ार बच्चों व शिक्षकों को क्वारंटाइन किया जा चुका है. दो मौतें भी रिपोर्ट हुई हैं. अन्य देशों में भी स्कूल खोलने को लेकर गहन विचार विमर्श चल रहा है.

विशेषज्ञ मान रहे हैं कि भारत में अगर पूरी रणनीति के तहत स्कूल नहीं खोले गए या जल्दबाज़ी की गई तो इज़रायल जैसा अंजाम होना तय है. बच्चों की बलि लेने की रणनीति को लेकर अभिभावक न सिर्फ डरे हुए हैं, बल्कि ये फैसले तक कर रहे हैं कि भले ही बच्चों का एक साल बर्बाद हो जाए लेकिन स्थितियां काबू में आने तक बच्चों को स्कूल नहीं भेजेंगे.

'सलामत रहे तो फिर पढ़ लेंगे बच्चे, उन्हें गंवाना क्यों?'
मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के निवासी और पेशेवर विशेषज्ञ डॉक्टर मोहन कुमार नागर ने सोशल मीडिया पर कठोर घोषणा करते हुए कहा है कि महामारी के सबसे ख़तरनाक चरण में देश प्रवेश करने वाला है और भयावहता का अनुमान होने के बावजूद डॉक्टर वा​स्तविकता बता नहीं सकते. डॉ. नागर ने साफ कहा है कि भले ही उनके बच्चे या बच्ची एक साल पिछड़ जाएं लेकिन वो पुख्ता इलाज आने तक उन्हें स्कूल नहीं भेजेंगे. डॉ. नागर ने देश के कर्णधारों से कहा है कि वो देश के बच्चों की बलि न लें.

विशेषज्ञ डॉक्टर नागर की एफबी पोस्ट.


'भले ही साल ​बर्बाद हो, नहीं भेजेंगे स्कूल'
इसी तरह का विचार मैंगलूरु शहर के हज़ारों अभिभावकों ने व्यक्त किया था. मैंगलोरियन की रिपोर्ट के मुताबिक हज़ारों अभिभावकों ने एक कैंपेन के तहत अपने बच्चों को स्कूल न भेजने का फैसला लिया. यह कहकर कि भले ही बच्चों का एक साल खराब हो जाए लेकिन उनकी सुरक्षा पहले ज़रूरी है.

कैसा है देश के अभिभावकों का मन?
जब तक ज़ीरो केस की स्थिति न हो जाए तब तक सरकार स्कूल न खोले, इसके लिए एक जून तक 2 लाख से ज़्यादा अभिभावकों ने ऑनलाइन अर्ज़ी चेंज.ओआरजी पर साइन की. वहीं कम्युनिटी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकलसर्किल ने देश भर में करवाए सर्वे के हवाले से कहा कि सिर्फ 11 फीसदी अभिभावकों ने सरकार के तय किए कार्यक्रम के हिसाब से बच्चों को स्कूल भेजने की सहमति दी.

इस सर्वे के मुताबिक 37 फीसदी अभिभावकों ने कहा कि जब ज़िले और 20 किमी के दायरे में 21 दिनों तक नया केस न हो, तब वो बच्चों को स्कूल भेज सकते हैं. 20 फीसदी ने कहा कि जब देश में 21 दिनों तक कोई नया केस न आए तब और 16 फीसदी ने राज्य में इस स्थिति पर. 13 फीसदी अभिभावकों ने वैक्सीन आने तक बच्चों को स्कूल न भेजने की बात कही.

अभिभावकों को क्यों करना चाहिए चिंता
देश में कई जगहों पर कोरोना संक्रमण को लेकर हालात चिंताजनक बने हुए हैं. ऐसे में, स्कूल आश्वासन ज़रूर दे रहे हैं कि सैनिटेशन और कीटनाशकों के इस्तेमाल से स्कूल को सुरक्षित रखने के कदम उठाए जाएंगे. साथ ही, सोशल डिस्टेंसिंग का भी आश्वासन कुछ स्कूल दे रहे हैं. लेकिन, अभिभावकों को बच्चों की आदतों और स्कूल प्रबंधन के दावों को जांचकर ही अंतिम निर्णय लेना चाहिए. चिंता की बात यह है कि अभी कोविड को लेकर कोई पुख्ता इलाज, दवा और वैक्सीन नहीं है और न ही कम्युनिटी संक्रमण पर लगाम की कारगर तरकीब है.

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स्कूल जल्दबाज़ी में न खोले जाने को लेकर सोशल मीडिया पर कई अभिभावक कैंपेन चला रहे हैं. फाइल फोटो.


कुल मिलाकर, स्थिति यह है कि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर का दौर भी आएगा. दूसरी तरफ, जब राज्य लॉकडाउन को लेकर स्थानीय स्तर पर रणनीति तैयार कर क्रमबद्ध ढंग से अनलॉक कर सकते हैं तो स्थानीय स्तर वाली रणनीति स्कूल खोले जाने के मामले में भी लागू की जा सकती है. लेकिन, बच्चों को जोखिम में डालकर जल्दबाज़ी या अधूरी रणनीति के साथ स्कूल खोले जाने के फैसले आग से खेलने जैसे साबित हो सकते हैं.

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