ये है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शक्ति...!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का 39 देशों में नेटवर्क है. विदेशों में संघ की करीब एक हजार शाखाएं ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ के नाम से लगती हैं. संघ के 36 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं.

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: February 13, 2018, 5:04 PM IST
ये है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शक्ति...!
बीजेपी के सत्ता में आने के बाद संघ में शामिल होने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है.
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: February 13, 2018, 5:04 PM IST
‘संघ के स्वयं सेवक को तैयार होने में तीन दिन लगेंगे, जबकि यदि सेना समाज के किसी सामान्य व्यक्ति को तैयार करेगी तो उसे छह महीने का वक्त लगेगा.’ संघ प्रमुख मोहन भागवत का यह बयान राजनीतिक मुद्दा बन गया है. लेकिन उनके इस बयान का आधार क्या है? इसके लिए हमने संघ शक्ति की पड़ताल की.

भारत में शहर और गांव मिलाकर ऐसे करीब 80 हजार स्थानों पर संघ की शाखा, साप्ताहिक मिलन और संघ मंडली लगती है. इस समय संघ की करीब 57 हजार शाखाएं काम कर रही हैं. इनके अलावा 22 हजार साप्ताहिक मिलन और संघ मंडली सक्रिय हैं. जानकारों की माने तो देश भर में एक करोड़ से ज्यादा प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं.

दिल्ली प्रांत के प्रचार प्रमुख राजीव तुली बताते हैं कि संघ में 10 हजार की जनसंख्या पर एक बस्ती मानी जाती है. 10 बस्तियों को मिलाकर एक नगर या खंड मानते हैं. इस एक लाख की आबादी को हम एक स्थान मानते हैं. स्वयंसेवकों की सही संख्या बताना कठिन है, लेकिन एक जगह पर कम से कम इससे सौ लोग तो जुड़े होते ही हैं. उनके साथ उनका परिवार भी जुड़ता है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ताकत

शाखा किसी खुली जगह पर या विशेष परिस्थितियों में छत के नीचे एक घंटे की लगती है. इसमें शारीरिक व्यायाम, खेल, देशभक्ति गीत, विविध राष्ट्र हित के विषयों पर चर्चा, बौद्धिक और मातृभूमि की प्रार्थना होती है. संघ सदस्यता की कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं है. कोई भी व्यक्ति नजदीक की संघ शाखा में जाकर संघ में शामिल हो सकता है. संघ के सदस्य को स्वयंसेवक कहते हैं. उसके लिए कोई भी शुल्क या पंजीकरण प्रक्रिया नहीं है.

बीजेपी के सत्ता में आने के बाद संघ में शामिल होने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है. संघ के एक अन्य पदाधिकारी ने बताया कि पिछले तीन साल में हमने संगठन के विस्तार का एक कार्यक्रम चलाया है. हमारी दैनिक शाखाओं, साप्ताहिक बैठकों और मासिक मंडलियों में इस अवधि में 18 फीसदी की बढ़त हुई.

संघ के प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य के मुताबिक "हाल के दिनों में संघ के प्रति लोगों, खासकर युवाओं की रुचि बढ़ी है. बड़ी संख्या में नए लोग संघ से जुड़ रहे हैं. वर्ष 2012 में यह संख्या 1000 व्यक्ति प्रतिमाह थी जो अक्टूबर 2015 में बढ़कर 8000 व्यक्ति प्रतिमाह हो गई है." आरएसएस के मुताबिक, 2015 में 51,332 शाखाएं थीं जो 2016 में 56,569 हो गई हैं.

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का 39 देशों में नेटवर्क है. विदेशों में संघ की करीब एक हजार शाखाएं ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ के नाम से लगती हैं. संघ के 36 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं. 200 से अधिक क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले संगठन हैं, जो संघ की विचारधारा को मानकर राष्ट्र और सामाज के बीच सक्रिय हैं.

आरएसएस तो हमेशा ही देश के लिए काम करता रहा है. 1962 और 1965 के युद्ध में इसने बड़ी भूमिका निभाई थी. इसीलिए पंडित जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा. मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए. 65 में सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक आगे आए थे. स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगाई.
राजीव तुली, दिल्ली प्रांत के प्रचार प्रमुख


तुली ने दावा किया कि 1965 के पाकिस्तान से युद्ध के समय लालबहादुर शास्त्री ने भी संघ को याद किया. आरएसएस की वेबसाइट पर दावा किया गया है कि स्वयंसेवकों ने युद्ध के 22 दिनों तक दिल्ली में यातायात नियंत्रण का काम किया. घायल जवानों के लिए रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे.
दावा ये भी किया गया है कि 2 अगस्त 1954 को दादरा नगर हवेली को पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करवाकर स्वयंसेवकों ने भारत सरकार को सौंप दिया. गोवा मुक्ति आंदोलन और आपातकाल हटाने के लिए हुए आंदोलनों में भी संघ की बड़ी भूमिका रही.

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी. यह एक दक्षिणपंथी विचारों का स्वयंसेवक संगठन है. हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रबल समर्थक आरएसएस देश में सत्तारुढ़ राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी का पैतृक संगठन है.

संघ का मानना है कि भारत में रहने वाला ईसाई या मुस्लिम भारत के बाहर से नहीं आया है. वे सब यहीं के हैं. हमारे सबके पुरखे एक ही हैं. किसी कारण से मजहब बदलने से जीवन दृष्टि नहीं बदलती है. इसलिए उन सभी की जीवन दृष्टि भारत की यानी हिंदू ही है. हिंदू इस नाते वे संघ में आ सकते हैं, आ रहे हैं और जिम्मेदारी लेकर काम भी कर रहे हैं. उनके साथ मजहब के आधार पर कोई भेदभाव या कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं मिलता है.


सेना वाले बयान पर आरएसएस की सफाई
'तीन दिन में सेना तैयार करने' वाले बयान पर डॉ. मनमोहन वैद्य ने सफाई दी है. उनके मुताबिक "भागवत ने कहा था कि परिस्थिति आने पर तथा संविधान द्वारा मान्य होने पर भारतीय सेना को सामान्य समाज को तैयार करने के लिए, छह महीने का समय लगेगा तो संघ के स्वयंसेवकों को भारतीय सेना तीन दिन में तैयार कर सकेगी. वजह स्वयंसेवकों को अनुशासन का अभ्यास रहता है."

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सिर्फ भागवत ही क्यों, इसी जनवरी में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज केटी थॉमस ने केरल के कोट्टायम में आरएसएस प्रशिक्षण शिविर को संबोधित करते हुए कहा था, "संविधान, लोकतंत्र और सेना के बाद आरएसएस की वजह से ही देश में लोग सुरक्षित हैं. अगर किसी संगठन को आपातकाल से देश को मुक्त कराने के लिए क्रेडिट दिया जाना चाहिए, तो मैं आरएसएस को दूंगा." थॉमस ने कहा, 'उन्हें लगता है कि संघ अपने कार्यकर्ताओं को देश की सुरक्षा के लिए अनुशासन सिखाता है.' जानकारों का कहना है कि इन बयानों के पीछे सिर्फ संघ की शक्ति है.

संघ से जुड़े प्रमुख संगठन
भारतीय जनता पार्टी, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, सेवा भारती, राष्ट्र सेविका समिति, शिक्षा भारती, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, संस्कार भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, लघु उद्योग भारती, विश्व संवाद केंद्र.
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