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जानें, आरएसएस के केंद्र में कब और कैसे आया राम मंदिर आंदोलन

News18Hindi
Updated: November 12, 2019, 6:35 PM IST
जानें, आरएसएस के केंद्र में कब और कैसे आया राम मंदिर आंदोलन
अयोध्‍या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मथुरा और काशी पर ध्‍यान देने के बजाय संघ राममंदिर के लिए चंदा जुटाकर ग्रामीण भारत में अपनी पहुंच बढ़ाने पर जोर देगा.

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (RSS) पर करीबी नजर रखने वाले लेखक श्रीधर दामले (Shridhar Damle) ने बताया कि कैसे आरएसएस ने स्‍वदेशी और गोकशी पर प्रतिबंध (Cow Slaughter Ban) के मुद्दे पर आम लोगों की अच्‍छी प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद राममंदिर मामले (Ram Mandir Issue) को आगे बढ़ाया. दामले ने News18 से बात करते हुए कहा कि संघ अब मथुरा (Mathura) और काशी (Kashi) पर ध्‍यान देने के बजाय ग्रामीण भारत (Rural India) में अपनी पहुंच बढ़ाने पर जोर देगा.

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  • Last Updated: November 12, 2019, 6:35 PM IST
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सुहास मुंशी

नई दिल्‍ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की संविधान पीठ ने अयोध्‍या (Ayodhya) में राम मंदिर (Ram Mandir) बनाने का आदेश दे दिया है. फैसले के बाद राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) ने कहा कि अब हम मिल-जुलकर राम मंदिर बनाएंगे. उन्‍होंने अपील की समाज का हर वर्ग राम मंदिर निर्माण में अपना कर्तव्‍य निभाए. राम मंदिर निर्माण के मामले को इस मुकाम तक पहुंचाने में संघ का बड़ा योगदान रहा है. आरएसएस पर करीबी नजर रखने वाले लेखक श्रीधर दामले (Shridhar Damle) बताते हैं कि संघ ने गोकशी पर रोक (Cow Slaughter Ban) और स्‍वदेशी के मामले पर आम लोगों की अच्‍छी प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद कैसे राम मंदिर के मुद्दे को आगे बढ़ाया.

श्रीधर दामले ने बताया कि 40 और 50 के दशक की शुरुआत में संघ के नेताओं को राम मंदिर का मुद्दा स्‍थानीय मसला लगता था. यहां तक कि संघ इसे पूरे उत्‍तर प्रदेश (UP) में उठाए जाने लायक मुद्दा भी नहीं मानता था. उस दौरान आरएसएस गोकशी पर रोक और स्‍वदेशी के मुद्दे को जन आंदोलन बनाने की कोशिशों में जुटा था. अमेरिकी विद्वान वाल्‍टर एंडरसन (Walter Anderson) के साथ मिलकर किताब 'आरएसएस: ए व्‍यू टू द इनसाइड' लिखने वाले दामले ने News18 को बताया कि कैसे राममंदिर का मुद्दा संघ के केंद्र में आया. उनके मुताबिक, अयोध्‍या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मथुरा (Mathura) और काशी (Kashi) पर ध्‍यान देने के बजाय संघ राममंदिर के लिए चंदा (Donation) जुटाकर ग्रामीण भारत (Rural India) में अपनी पहुंच बढ़ाने पर जोर देगा.

संघ ने गोकशी पर रोक के लिए जुटा लिए थे 1.75 करोड़ हस्‍ताक्षर

दामले ने बताया कि 40 और 50 के दशक में संघ ने गोकशी पर प्रतिबंध के लिए पूरे देश में घूम-घूमकर हस्‍ताक्षर अभियान चलाया. संघ ने पहली बार चलाए इस तरह के अभियान में 1.75 करोड़ लोगों के हस्‍ताक्षर जुटा लिए थे. इस दौरान बड़ी संख्‍या में लोग संघ के साथ जुड़े. इनमें बहुत से हिंदू धार्मिक नेता (Hindu Religious Leaders) और रजवाड़े (Princely States) भी शामिल थे. संघ के दूसरे प्रमुख एमएस गोलवलकर (MS Golwalkar) ने 1967 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव से पहले गोकशी पर रोक के मुद्दे को लेकर अपने कार्यकर्ताओं को फिर सक्रिय किया. हालांकि, इस मुद्दे को गोरखनाथ मठ के महंत अवैद्यनाथ और रामराज्‍य परिषद के संस्‍थापक करपात्री महाराज जैसे महत्‍वाकांक्षी नेताओं ने झटक लिया.

कांग्रेस नेता दाउ दयाल खन्‍ना ने 1983 में सरसंघचालक बनने जा रहे रज्‍जू भइय्या और दो बार अंतरिम प्रधानमंत्री रह चुके गुलजारी लाल नंदा के सामने कहा था कि म‍थुरा, काशी और अयोध्‍या में मस्जिदों को हटाना ही होगा.


कांग्रेस नेता ने कहा था, छेड़ना ही होगा राममंदिर के लिए आंदोलन
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कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता और उत्‍तर प्रदेश सरकार में कई बार कैबिनेट मंत्री रहे दाउ दयाल खन्‍ना (Dau Dayal Khanna) ने विश्‍व हिंदू परिषद (VHP) के मंच से 1983 में कहा था कि मथुरा, काशी और अयोध्‍या में मंदिर को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों को हटाना होगा. उन्‍होंने पूर्व अंतरिम प्रधानमंत्री व कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता गुलजारीलाल नंदा (Gulzari Lal Nanda) और तब सरसंघचालक बनने जा रहे राजेंद्र सिंह उर्फ रज्‍जू भइय्या (Rajju Bhaiyya) के साथ बैठक में अपनी बात को दोहराया. इसके बाद संघ प्रचारकों ने राममंदिर मुद्दे पर उत्‍तर प्रदेश और राजस्‍थान (Rajasthan) में एक के बाद एक कई बैठकें कीं. इसके बाद इस मामले को तत्‍कालीन संघ प्रमुख बाला साहेब देवरस (Balasaheb Deoras) के सामने रखा गया. इस पर देवरस ने कहा, 'क्‍या! अभी तक राममंदिर पर ताले (Locks) लगे हुए हैं.'

देवरस ने कहा था, तीन दशक तक इस लड़ाई के लिए तैयार रहें
देवरस का ये बयान संघ प्रचारकों के लिए बाबरी मस्जिद (Babari Masjid) के खिलाफ लंबा अभियान चलाने का संकेत जैसा था. बताया जाता है कि तब देवरस ने प्रचारकों से कहा था, 'आपको राममंदिर के मुद्दे पर प्रदर्शन तभी शुरू करना चाहिए, जब आप इस लड़ाई को अगले तीन दशक (Three Decades) तक लड़ने के लिए तैयार हों. ये आपके धैर्य की परीक्षा की लड़ाई होगी. जो इस लड़ाई में पूरे धैर्य के साथ अंत तक लड़ता रहेगा, जीत उसी की होगी.' इसके बाद संघ ने गोकशी के खिलाफ चलाए हस्‍ताक्षर अभियान की तर्ज पर एकसाथ पूरे देश में आंदोलन छेड़ने की योजना बनाई. संघ के नेता मोरोपंत पिंगले (Moropant Pingle) के विचार के मुताबिक, विश्‍व हिंदू परिषद ने एकतामाता यात्रा (Ekatmata Yatra) का आयोजन किया.

यूपी में ही गंगाजल की सभी बोतलें बिकने पर चौंके संघ नेता
स्‍वयंसेवकों ने चार देशव्‍यापी यात्राओं के दौरान राममंदिर निर्माण चंदा के लिए गंगाजल की बोतलें (Gangajal Bottels) बेचने की योजना बनाई. जब योजना पर अमल किया गया तो सारी बोतलें उत्‍तर प्रदेश में ही बिक गईं. इससे संघ के कुछ नेता चौंक गए. उन्‍हें एहसास हुआ कि राममंदिर का मुद्दा आम जनता (Common People) का मसला है. इस अभियान में संघ ने करीब 8 करोड़ रुपये जुटाए. लेकिन, संघ के मुताबिक, इस अभियान के दौरान उन्‍होंने धन से ज्‍यादा जन समर्थन जुटाया. धीरे-धीरे संघ को एहसास हुआ कि राम जन्‍मभूमि (Ram Janmbhoomi) का मुद्दा किसी भी दूसरे मामले से बहुत बड़ा है.

मोरोपंत पिंगले ने 1984 में राम मंदिर के लिए राम शिलापूजन का आयोजन कराया.


ताले में बंद रामलला के बैनर लगाकर 40 ट्रक यूपी में घुमाए गए
संघ ने 1984 में तालों में बंद रामलला के बड़े-बड़े बैनर 40 ट्रकों पर लगाए और उन्‍हें पूरे उत्‍तर प्रदेश में घुमाया गया. मोरोपंत पिंगले ने राम मंदिर के लिए राम शिलापूजन (Shila Poojan) का आयोजन कराया. इस पूजन का आयोजन देश के तीन लाख से ज्‍यादा गांवों और कस्‍बों में किया गया. बीजेपी ने 1989 में पालनपुर संकल्‍प (Palanpur Resolution) में इस मामले को औपचारिक तौर पर अपने एजेंडे में शामिल किया. जब उनसे पूछा गया कि संघ का अगला मुद्दा क्‍या हो सकता है तो उन्‍होंने कहा कि अब आरएसएस ग्रामीण भारत में पकड़ मजबूत करने पर ध्‍यान देगा. इसका एक तरीका हो सकता है कि संघ भव्‍य राम मंदिर निर्माण के लिए गांव-गांव जाकर चंदा जुटाए ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों के संपर्क में आ सके. संघ मथुरा और काशी के मामलों को भी नहीं छुएगा. अगले तीन से चार साल संघ सिर्फ राममंदिर निर्माण पर जोर देगा.

आरएसएस अपने किसी भी नेता को हीरो बनाकर पूजा नहीं करता
दामले से पूछा गया कि क्‍या मोहन भागवत का कद उनसे पहले के सरसंघचालकों से बड़ा हो गया है तो उन्‍होंने कहा कि आरएसएस किसी को हीरो नहीं बनाता. रज्‍जू भैय्या और के. सुदर्शन से मोहन भागवत की तुलना करना उचित नहीं है. संघ दीन दयाल उपाध्‍याय, एमएस गोलवलकर और दत्‍तोपंत ठेंगड़ी को सबसे ऊपर रखता है. इसके अलावा संघ बाला साहेब देवरस, भाउराव देवड़ा, नानाजी देशमुख और मोरोपंत के योगदान को हाइलाइट कर रहा है. दरअसल, बाला साहेब देवरस ने तीन ऐसे नियम बनाए थे, जिससे किसी भी सरसंघचालक का कद विराट न हो जाए. उन्‍होंने नियम बनाया कि सरसंघचालक 75 साल की उम्र में सेवानिवृत्‍त हो जाएगा. उनका अंतिम संस्‍कार सामान्‍य व्‍यक्ति की ही तरह होगा और गोलवलकर व हेडगेवार के अलावा किसी भी संघ नेता की तस्‍वीर आरएसएस के कार्यक्रमों में नहीं लगाई जाएगी.

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First published: November 12, 2019, 4:02 PM IST
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