अपना शहर चुनें

States

पिता की 51 साल पुरानी दलीलों के सहारे वकील सिद्धार्थ लूथरा ने रेप आरोपी की फांसी की सजा टलवाई

पिता केके लूथरा की 1968 में दी दलीलों के आधार पर बेटे सिद्धार्थ लूथरा ने सुप्रीम कोर्ट से एक दोषी की मौत की सजा खारिज करा ली.
पिता केके लूथरा की 1968 में दी दलीलों के आधार पर बेटे सिद्धार्थ लूथरा ने सुप्रीम कोर्ट से एक दोषी की मौत की सजा खारिज करा ली.

पिता केके लूथरा ने 1968 में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में न्‍यायमित्र (Amicus Curiae) की हैसियत से दलील दी थी कि दोषी को पर्याप्त और प्रभावी कानूनी सहायता हासिल करने का हक है. सत्र अदालत (Trial Court) की ओर से दी गई मौत की सजा (Death Sentence) आरोपी के जीवन के अधिकार (Right to Life) का हनन है क्‍योंकि उसके वकील को तैयारी का पर्याप्‍त समय तक नहीं दिया गया. अब उनके बेटे सिद्धार्थ लूथरा ने एक मामले में मौत की सजा पाए व्‍यक्ति को इन्‍हीं दलीलों के आधार पर फांसी की सजा से बचा लिया है. 

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 18, 2019, 8:47 PM IST
  • Share this:
उत्‍कर्ष आनंद

नई दिल्‍ली. वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता केके लूथरा 1968 में बतौर न्‍यायमित्र (Amicus Curiae) एक मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की मदद कर रहे थे. हत्‍या के मामले (Murder Case) में एक व्‍यक्ति को निचली अदालत (Trial Court) ने फांसी की सजा (Death Sentence) सुनाई थी. तब दी गईं केके लूथरा की दलीलों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को खारिज करते हुए नए सिरे से मामले की सुनवाई करने का फैसला दिया था. इस फैसले के 51 साल बाद केके लूथरा के बेटे सिद्धार्थ लूथरा ने भी रेप व हत्‍या (Rape-Murder) के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के लिए न्‍यायमित्र की हैसियत से अपने पिता की दलीलों का ही सहारा लिया. इस बार भी कोर्ट ने मौत की सजा खारिज करते हुए नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया.

दोनों ही मामलों के आरोपियों को आखिरी मौके पर दी गई कानूनी मदद
मध्‍य प्रदेश (Madhya Pradesh) में रेप और हत्‍या के एक मामले में निचली अदालत ने महज 13 दिन के भीतर एक आरोपी को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को निचली अदालत के फैसले को खारिज करते हुए नए सिरे से सुनवाई (Fresh Trial) करने का आदेश दिया है. पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (Former ASG) सिद्धार्थ लूथरा की इस मामले में दी गई दलीलें अपने पिता की पांच दशक पहले दी गई दलीलों के इर्दगिर्द ही थीं. उन्‍होंने दलील दी कि आरोपी को संविधान के अनुच्‍छेद-21 (Article 21) के तहत निष्‍पक्ष सुनवाई का हक है. इन दोनों ही मामलों में दोषियों को कानूनी मदद (Legal Aid) सुनवाई के आखिरी चरण में दी गई थी.
केके लूथरा की दलील, बचाव पक्ष को नहीं मिला तैयारी का पर्याप्‍त समय


केके लूथरा ने 1968 में सुप्रीम कोर्ट में न्‍यायमित्र की हैसियत से दलील दी थी कि दोषी (Convict) को पर्याप्त और प्रभावी कानूनी सहायता हासिल करने का हक है. सत्र अदालत की ओर से दी गई मौत की सजा आरोपी के जीवन के अधिकार (Right to Life) का हनन है क्‍योंकि उसके वकील को तैयारी का पर्याप्‍त समय तक नहीं दिया गया. उनकी इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अगर बचाव पक्ष के वकील को तैयारी का पर्याप्‍त समय नहीं दिया जाता है तो निश्चित रूप से पक्षपात माना जाएगा. साथ ही मामले में आगे की सुनवाई को रोक दिया जाएगा.

आरोपी को आरोप तय किए जाने के दिन ही दिया गया था वकील
सिद्धार्थ लूथरा ने भी सुप्रीम कोर्ट में कहा कि आरोपी को उपलब्‍ध कराए गए वकील को तैयारी का पर्याप्‍त समय नहीं दिया गया. आरोपी को उसी दिन वकील उपलब्‍ध कराया गया, जिस दिन उस पर आरोप तय किए जा रहे थे. वकील को आरोपी से मिलने तक का मौका नहीं मिल पाया. इस दौरान उन्‍होंने 1968 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला भी दिया. जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने सिद्धार्थ लूथरा की दलीलों को स्‍वीकार करते हुए नए सिरे से मामले की सुनवाई का आदेश दिया. साथ ही फैसला में पिता-पुत्र की दलीलों का जिक्र भी किया.

ये भी पढ़ें:

News18 Chaupal: कपिल सिब्‍बल ने कहा-SC तय करेगा, CAA संवैधानिक है या नहीं

News18 Chaupal: नकवी ने कहा- अफवाहों से अमन को अगवा करने की हो रही है कोशिश
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज