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ग्राउंड रिपोर्ट: ठोस कचरे को अलग नहीं कर पाने के कारण नष्ट हो रही हिमालय की पारिस्थितिकी

News18Hindi
Updated: December 24, 2019, 7:53 PM IST
ग्राउंड रिपोर्ट: ठोस कचरे को अलग नहीं कर पाने के कारण नष्ट हो रही हिमालय की पारिस्थितिकी
इस तरह कचरा फेंकने से जमीन पर उपलब्ध जल स्रोतों से निकलने वाले नाले अवरुद्ध हो रहे हैं. इसकी वजह से बाढ़ आ रही है. (फोटो : हृदयेश जोशी)

नीति आयोग (Niti Aayog) के मुताबिक, उत्तराखंड (Uttarakhand) की 60 फीसदी से अधिक जल आपूर्ति (Water Supply) के स्रोत प्राकृतिक सोते हैं. जमीन पर उपलब्ध जलाशयों (Reservoirs) तक पानी ले जाने वाले नालों में कचरा (Garbage) फेंके जाने से ये जल स्रोत प्रदूषित (Pollute) हो सकते हैं.

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  • Last Updated: December 24, 2019, 7:53 PM IST
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हृदयेश जोशी

उत्तराखंड में भीमताल से बस कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर कचरे (Garbage) का पहाड़ खड़ा है. हर सप्ताह नजदीक के बाजारों और घरों से ट्रकों में भरकर ठोस कचरा (Solid Waste) यहां लाकर डाला जाता है. नगरपालिका इस कचरे को यहां लाने से पहले इन्हें अलग नहीं करती है. गीले कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक, पेपर, पॉलिथिन और शीशे की बोतल एक साथ यहां डंप कर दिए जाते हैं. यह डंपिंग ग्राउंड (Dumping Ground) वन क्षेत्र में आता है. भीमताल (Bhimtal) के 38 वर्षीय प्रवीण पाठक का कहना है कि यहां भोजन की तलाश में भटकते हुए पहुंचे जानवरों (Animals) को कचरे में मौजूद प्लास्टिक खाते हुए अकसर देखा जा सकता है. पारिस्थितिकीय (Ecology) रूप से बहुत ही संवेदनशील उत्तराखंड (Uttarakhand) में यह अकेला क्षेत्र नहीं है, जहां नियमों को ताक पर रख कचरे की ऐसी डंपिंग होती है. ऐसी कई जगह पर कचरे की डंपिंग के कारण हिमालय की पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान हो रहा है.

कचरा शोधन नहीं होने से जल स्रोत हो सकते हैं प्रदूषित
उत्तराखंड के 13 में नौ जिले हिल डिस्ट्रिक्ट्स हैं, जो बहुमूल्य विरल पौधों और जंतुओं से भरे पड़े हैं. यहां मौजूद ग्लेशियरों और जंगलों (Glaciers and Forests) से कई नदियां निकलती हैं. इस क्षेत्र में कचरा शोधन सुविधा (Waste Treatment Facility) के अभाव और ठोस कचरा प्रबंधन के नियमों को लागू नहीं किए जाने से कचरा रिसकर पहाड़ों के झरनों व जलाशयों (Springs and Reservoirs) को प्रदूषित कर रहे हैं. कचरे को अमूमन जलाशयों से पानी ले जाने वाले नालों में डंप किए जाने से जल बहाव पर भी असर पड़ रहा है. इससे भूस्खलन (Landslide) होता है और बाढ़ (Flood) की स्थिति पैदा होती है. नीति आयोग के अनुसार, उत्तराखंड में 60 फीसदी से भी अधिक जलापूर्ति का स्रोत झरने हैं. कचरे को डंप करने की उचित व्‍यवस्‍था नहीं होने के कारण सभी जल स्रोत प्रदूषित (Pollute) हो सकते हैं.



ठोस कचरा प्रबंधन में उत्तराखंड का प्रदर्शन सबसे खराब


सरकार ने 2016 में ठोस कचरा प्रबंधन के नियमों को संशोधित किया था. पहाड़ी क्षेत्रों में ठोस कचरा प्रबंधन से संबंधित कुछ विशेष प्रावधानों को अधिसूचित किया गया था. इन नियमों के अनुसार, पहाड़ियों पर लैंडफिल के निर्माण से बचा जाएगा और पहाड़ी से नीचे समतल क्षेत्र में 25 किलोमीटर के अंदर इसके लिए उपयुक्त जगह की पहचान की जाएगी. अगर इस तरह की जमीन नहीं मिलती है तो उस क्षेत्र में स्वच्छ लैंडफिल का निर्माण किया जाएगा, जिसमें निष्क्रिय और अवशिष्ट कचरे को डंप किया जा सकता है. हकीकत यह है कि पहाड़ों में इस तरह के नियम सिर्फ काग़ज पर ही हैं. उत्तराखंड में यह समस्या ज़्यादा चिंताजनक है, क्योंकि ठोस कचरा शोधन और प्रबंधन की दृष्टि से यह देश का सर्वाधिक खराब प्रदर्शन करने वाला राज्य है.

उत्तराखंड के नैनीताल जिला स्थित भीमताल के जंगल में कचरे का ढेर.


तीन फीसदी वार्ड में ही कचरा अलग करने की व्‍यवस्‍था
संसद में सरकार की ओर से पेश आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में हर दिन 1400 टन से अधिक कचरा पैदा होता है. उत्‍तराखंड इसका शून्य प्रतिशत शोधन करता है. केंद्रीय आवास और शहरी विकास मंत्रालय ने राज्यसभा में मार्च, 2018 में यह जानकारी दी. लिखित उत्तर में सरकार ने बताया कि उत्तराखंड में 3 प्रतिशत नगर निगम वार्ड में कचरे को स्रोत पर अलग करने की व्यवस्था है. प्रशासन का कहना है कि कचरे को स्रोत पर ही अलग करना कचरा इकट्ठा करने का जरूरी हिस्सा है. नैनीताल में कचरा प्रबंधन के लिए किए गए करार के तहत एजेंसी जो भी कचरा घरों से इकट्ठा करती है, उसे स्रोत पर ही अलग किया जाना है. नैनीताल के डीएम साविन बंसल का कहना है कि इस बारे में जागरूकता की कमी के कारण लोग आज भी कचरे को अलग करने की अहमियत नहीं समझ पाए हैं. घर पर ही कचरा को अलग करने के लिए विशेष तरह का डस्टबिन उपलब्ध कराने के बावजूद लोग आज भी मिश्रित कचरा देते हैं.

इंदौर नगरपालिका शहर के उपभोक्‍ताओं पर लगाती है दंड
सवाल उठता है कि लोग क्यों इस नियम का पालन नहीं कर रहे हैं? विशेषज्ञों के मुताबिक, स्थानीय प्रशासन ने मान लिया है कि लोग खुद कचरे को अलग कर लेंगें. अमूमन ऐसा नहीं होता है. अगर उन्होंने पहले कभी ऐसा नहीं किया है तो आज वे इसे कैसे कर लेंगें? पर्यावरण और स्वच्छता के मुद्दे पर काम करने वाले लेखक अंकुर बिसेन का कहना है कि बिना किसी रोक या दंडात्मक प्रावधान के यह कभी नहीं होगा. इंदौर नगरपालिका शहर के घरेलू और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं पर दंड लगाती है. उसने प्रभावी कचरा प्रबंधन व्यवस्था बनाई है, जिससे सारा देश सीख सकता है.

अफलता छिपाने के लिए बहाना भी बनाते हैं अधिकारी
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इसके दूसरे पहलू भी हैं. कई बार अधिकारी सभी घरों और दुकानों से कचरा इकट्ठा नहीं कर पाने की अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए कचरे को अलग करने की समस्या के बहाने को आगे बढ़ाते हैं. कई बार ठेकेदारों के साथ ठेकों में मूल्य निर्धारण की गड़बड़ी और गलत वाणिज्यिक शर्तों को छिपाने के लिए भी ऐसा किया जाता है. बिसेन के मुताबिक, यह भी सही है कि उचित मूल्य निर्धारण और दिशानिर्देशों की निगरानी की व्यवस्था की कमी के कारण घरों में कचरे को अलग नहीं किया जा सकता.



नियम तोड़ने वालों से मिलीभगत भी करते हैं अधिकारी
एक तो ठोस कचरा से निपटने के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधा नहीं होती है. प्रशासन भी कई बार नियम तोड़ने वालों से सख़्ती से निपटने के बजाय उनके साथ मिलीभगत कर लेता है. इस वर्ष जुलाई में दो एनआरआई के बेटों की शादियों के बाद गढ़वाल के संवेदनशील औली क्षेत्र में 32,000 किलो कचरा छोड़ दिया गया. अधिकारियों ने न केवल ऐसा होने दिया बल्कि राज्य सरकार के ब्यूरोक्रेट्स और मंत्री इस समारोह में शामिल भी हुए, जहां पर्यावरण के हर नियम को खुले तौर पर तोड़ा गया.

ठोस कचरा अलग नहीं करने से वन्य जीवनों को खतरा
हिमालयी क्षेत्रों के जंगलों और पहाड़ों में डंप किए जाने वाला कचरा जंगली जानवरों व चिड़ियों के आहार (feed) बनते हैं. इस वजह से उनकी जिंदगी को खतरा पैदा हो गया है. इस वर्ष जुलाई में एक चीते का प्लास्टिक खाता हुआ चित्र वायरल हो गया. कई पर्यावरणविदों ने इस पर चिंता जताई है. यह समस्या यहां सिर्फ एक या दो जगह पर नहीं है. करेंट साइंस में दिसंबर में छपे एक शोध से पता चला कि कई ऐसे जीव जंतु हैं, जो कचरे पर पल रहे हैं. यह शोध नैनीताल क्षेत्र में दो स्थानों पर किया गया, जहां हर साल करीब 200 पक्षी और 75 स्तनधारी (mammals) आते हैं. इस अध्ययन में कहा गया है कि अब ज्‍यादा से ज्‍यादा पक्षी और पशु कचरे में बचे खाद्य पदार्थों पर आश्रित (dependent) रहने लगे हैं.

खाने की चीजों के साथ पॉलिथिन खा जाते हैं वन्‍य जीव
विशेषज्ञों का कहना है कि फास्‍ट फूड, बिस्कुट और चिप्स में मौजूद नमक के कारण जानवर कचरे की ओर ज्‍यादा आकर्षित होते हैं. ये वस्तुएं कचरे के ढेर में प्लास्टिक के रैपर में बंद या लिपटे होते हैं. ऐसे में जानवर प्लास्टिक और पॉलिथिन को भी खाने लगते हैं. जनवरी, 2006 में मैदानी इलाके में पाए जाने वाले सैकड़ों बाज़ रानीखेत में कचरे के डंपयार्ड के पास बेहोश पाए गए. रानीखेत नैनीताल के पास एक लोकप्रिय हिल स्टेशन है. ये प्रवासी पक्षी प्रजनन के लिए हर साल जाड़े में रूस से भारत आते हैं और मार्च-अप्रैल में वापस लौट जाते हैं.

मैदानी क्षेत्र में पाए जाने वाले बाज़ रानीखेत में कचरे के डंपयार्ड के पास बेहोश पाए गए. (फोटो : जोगेंद्र बिष्ट)


2006 में रानीखेत के डंप यार्ड में मारे गए थे 78 बाज़
मैदानी क्षेत्र के कई बाज़ 2006 में रानीखेत के घिंघारीखल में डंप यार्ड के पास मरे हुए और कई गंभीर रूप से बीमार पाए गए. कई पक्षी जमीन पर जैसे-तैसे रेंग रहे थे. हमने उन्हें ग्लूकोज मिला पानी दिया और उनका इलाज करने की कोशिश की. पर्यावरण के मुद्दे को लेकर सक्रिय कार्यकर्ता जोगेंद्र बिष्ट का कहना है कि कुछ बाज तो ठीक हो गए, लेकिन उस घटना में 78 बाज़ मर गए. बाद में पता चला कि इन पक्षियों ने जंगल में कुछ विषैला पदार्थ खा लिया था. विष्‍ट बीमार बाजों को बचाने वाले दल में शामिल थे. हर साल लगभग 125 मैदानी बाज़ रूस से भारत आते हैं. साल 2006 में 78 बाजों का मर जाना पहाड़ियों में कचरे के कुप्रबंध को लेकर एक गंभीर चेतावनी थी. जाहिर है कि ठोस कचरा प्रबंधन से संबंधित नियमों को कठोरता से लागू नहीं कर पाने के कारण कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं. पहले ही बुरी स्थित से गुजर रहे हिमालय क्षेत्र के संवेदनशील पारिस्थितिकीय व्यवस्था को यह और बिगाड़ सकता है.

टूरिस्‍ट सीजन में पहाड़ों पर ज्‍यादा कचरा इकट्ठा होता है
मसूरी और नैनीताल जैसे हिल स्टेशन को कचरा कुप्रबंधन से सबसे ज्‍यादा खतरा है, क्योंकि हर साल टूरिस्ट सीजन के दौरान यहां ज्‍यादा कचरा इकट्ठा होता है. पर्यटक बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री जैसे पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की भी यात्रा करते हैं. नैनीताल के आरएस टोलिया उत्तराखंड प्रशासनिक अकादमी के विकास प्रकोष्ठ में सहायक प्राध्यापक मनोज पांडे का कहना है कि इन क्षेत्रों में नियमों को कड़ाई से लागू करने की ठोस संरचनात्मक योजना अथॉरिटीज के पास नहीं है. वे चाहते हैं कि संवेदनशील पारिस्थितिकी और दुर्गम घाटी को देखते हुए उन्‍हें इसका तैयार समाधान मिलना चाहिए. वहीं, हमें यह याद रखना चाहिए कि पहाड़ों पर ज्‍यादा संख्या में कचरा चुनने वाले अनौपचारिक (informal) मजदूर उपलब्ध नहीं होते, जो शहरी क्षेत्रों और महानगरीय इलाकों में कचरे को अलग करने के काम को आसान कर देते हैं.

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First published: December 24, 2019, 6:19 PM IST
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