OPINION: पश्चिम बंगाल में दशकों से राजनीतिक हिंसा है आम बात

Anil Rai | News18Hindi
Updated: September 2, 2019, 3:07 PM IST
OPINION: पश्चिम बंगाल में दशकों से राजनीतिक हिंसा है आम बात
पश्चिम बंगाल में हिंसा का नाता चुनाव से नहीं राजनीति से हो गया है. राज्‍य में दशकों से राजनीतिक हिंसा आम बात है.

पश्चिम बंगाल में राजनीति की बात होती है तो पहले वहां की सियासी हिंसा की चर्चा होती है. देश के करीब-करीब हर राज्य में चुनाव के दौरान हिंसा की छिटपुट घटनाएं होती हैं यानि इन राज्यों में हिंसा चुनावी होती है. वहीं, पश्चिम बंगाल में हिंसा का नाता चुनाव से नहीं राजनीति से हो गया है.

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पश्चिम बंगाल में हिंसा और राजनीति एकदूसरे के पूरक हैं. जब भी पश्चिम बंगाल में राजनीति की बात होती है तो पहले वहां की सियासी हिंसा की चर्चा होती है. देश के करीब-करीब हर राज्य में चुनाव के दौरान हिंसा की छिटपुट घटनाएं होती हैं यानि इन राज्यों में हिंसा चुनावी होती है. वहीं, पश्चिम बंगाल में हिंसा का नाता चुनाव से नहीं राजनीति से हो गया है. पश्चिम बंगाल में दशकों से राजनीतिक हिंसा आम बात है.

बीजेपी ने अर्जुन सिंह पर हमले को बताया लोकतंत्र की हत्‍या
पश्चिम बंगाल में कहीं किसी पार्टी की रैली हो, बड़े नेता का दौरा हो, कोई विरोध प्रदर्शन हो तो हिंसा होना आम हो गया है. ताजा मामला 24 परगना जिले का है. बीजेपी कार्यालय पर कब्जे की सुचना पाकर मौके पर जा रहे पार्टी सांसद अर्जून सिंह पर रास्ते में ही भीड़ ने हमला कर दिया, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गए. बीजेपी ने इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया तो तृणमूल कांग्रेस (TMC) फिलहाल चुप है यानि पहले राजनीतिक हिंसा हुई और अब हिंसा पर राजनीति शुरू हो गई है

सूबे में चार दशक से पुराना है राजनीतिक हिंसा का इतिहास

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की शुरुआत नक्सल आंदोलन के साथ हुई. 1960 से 1970 के बीच शुरू हुई नक्सली हिंसा धीरे-धीरे राजनीतिक हिंसा में बदल गई. एक सरकारी आकड़े की मानें तो इन चार दशकों में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा में करीब 30 हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. सूबे में राजनीतिक हिंसा का दौर आज भी जारी है. इस दौरान सबसे ज्यादा मौत सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलन में हुईं. राजनीतिक जानकार अब इस बात से भी डरे हुए हैं कि जैसे-जैसे राज्य में विधानसभा चुनाव करीब आएंगे राजनीतिक हिंसा और बढ़ेगी.

पयिचम बंगाल में 1967 में लेफ्ट की सरकार आई जो 2011 तक यानि 34 साल रही. एक आकड़े के मुताबिक इन 34 वर्षों के दौरान राज्य में राजनीतिक हिंसा में 28 हजार लोग मारे गए.


क्या क्षेत्रीय राजनीति है इस हिंसा की जिम्मेदार
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पश्चिम बंगाल में हिंसा का दौरा 1960 के बाद शुरू हुआ. उसके बाद 1967 में राज्य में लेफ्ट की सरकार आई जो 2011 तक यानि 34 साल तक रही. एक आकड़े के मुताबिक इन 34 वर्षों के दौरान राज्य में राजनीतिक हिंसा में 28 हजार लोग मारे गए. ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए नंदीग्राम और सिंगुर आंदोलन को पश्चिम बंगाल की सरकार ने जिस हिंसात्मक तरीके से दबाया वो ताबूत में आखिरी कील साबित हुई और 34 साल की लेफ्ट सरकार का पतन हुआ. लोगो को उम्मीद जगी कि अब सरकार बदलने के बाद पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पंचायत चुनाव हो या विधानसभा-लोकसभा चुनाव, पश्चिम बंगाल में हिंसा कम नहीं हुई. अब तो बिना किसी चुनाव के भी राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या और उन पर हमला आम बात हो गई है.

तो आखिर कैसे बदलेगी तस्वीर
बंगाल में लेफ्ट के 34 साल और ममता बनर्जी के 8 साल के कार्यकाल में राजनीतिक हिंसा की तस्वीर बदलती नजर नहीं आई. ऐसे में लोगो की उम्मीद अब किसी तीसरे विकल्प पर है. यह विकल्प 2021 के विधानसभा चुनावों में तय होगा. 2021 में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में टीएमसी, लेफ्ट, कांग्रेस और बीजेपी चारों मुख्य राजनीतिक पार्टियां होगी,. अब तक मिलीं सूचनाओं में कांग्रेस और टीएमसी का एकसाथ चुनाव लड़ना तय है. साफ है कि ऐसे में पश्चिम बंगाल की जनता के सामने लेफ्ट, टीएमसी और बीजेपी तीन विकल्प होगें, जिनमें 2 विकल्प वहां की जनता पहले ही आजमा चुकी है. ऐसे में बीजेपी अपने आप को राज्य में मजबूत विकल्प के रूप में देख रही है. शायद इसीलिए बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है.

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First published: September 2, 2019, 2:37 PM IST
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