लाइव टीवी

Analysis: नीतीश ने क्यों कही जातिगत जनगणना की बात, समझिए बिहार का जातीय समीकरण

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: January 22, 2019, 5:40 PM IST
Analysis: नीतीश ने क्यों कही जातिगत जनगणना की बात, समझिए बिहार का जातीय समीकरण
नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

आरजेडी ने सवर्ण आरक्षण का विरोध कर यह जता भी दिया है कि वह पिछड़े समुदाय और दलितों को यादवों के साथ मुसलमानों का समीकरण बनाकर एक नई रणनीति पर चलना चाह रही है. इसमें उपेन्द्र कुशवाहा, मुकेश सहनी और जीतनराम मांझी के चेहरे को आगे किया जा रहा है.

  • Share this:
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मांग उठाई है कि वर्ष 2021 की जनगणना जाति आधार पर होनी चाहिए. उनके अनुसार किस जाति के लोगों की संख्या कितनी है, यह मालूम होना चाहिए. इससे देश में आबादी के अनुरूप आरक्षण का प्रावधान हो, इससे अच्छी कोई बात नहीं होगी. जाहिर है नीतीश कुमार के इस बयान के राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं.

दरअसल कहा जा रहा है कि बीजेपी के सवर्ण आरक्षण के दांव को जेडीयू ने अपने एंगल से इसे भुनाने की कोशिश की है. क्योंकि यह बिहार के पिछड़े वोटबैंक को संदेश देने की कोशिश है कि जेडीयू उसके हितों की सोचती है. यह उस कड़ी की एक लड़ी मानी जा सकती है जिसमें जेडीयू कई मुद्दों पर बीजेपी से अलग खड़ी दिखना चाहती है. हालांकि अभी इस बयान को दोनों ही दलों की राजनीतिक जीत-हार के गणित से जोड़कर देखा जा रहा है.

ये भी पढ़ें-  राजनीति के बाद अब क्रिकेट के मैदान पर उतरे तेजप्रताप यादव, विरोधियों के छुड़ाए छक्के

बहरहाल हम इस पहलू पर एक नजर डालते हैं कि आखिर बिहार के तमाम दिग्गज नेताओं द्वारा जातिगत जनगणना की बात बार-बार क्यों की जाती है?  खिर क्या है बिहार का जातीय समीकरण? इसका सबसे अधिक लाभ कौन सा राजनीतिक दल उठा सकता है?

दरअसल देश में जातिगत जनगणना 1931 में हुई थी. इसके बाद मंडल आयोग रिपोर्ट आई जिसमें जातिगत अनुपात का जिक्र किया गया. इसके अनुसार बिहार में 13% ब्राहृमण, राजपूत एवं भूमिहार थे. यादव, कुर्मी अन्य पिछड़ी जाति 19.3%, अत्यंत पिछड़ा 32 % मुस्लिम 12.5% और अनुसूचित जाति एवं जनजाति 23.5% थे.

ये भी पढ़ें-  'मीसा भारती बेटी समान, मेरा कटा हुआ हाथ भी उसे आशीर्वाद देने के लिए ही उठेगा'

इसके बाद राजनीतिक दलों ने मांग उठाई तो 2011 में आर्थिक-सामाजिक जनगणना हुई. इसके बाद रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग से लालू प्रसाद पिछड़ों को गोलबंद करने में लग गए. इसका फायदा उन्होंने 2015 में उठाया भी और नीतीश कुमार के साथ बिहार में सरकार बनाई.इसके अतिरिक्त एक तथ्य ये है कि 1931 में ओड़िशा और झारखंड भी बिहार के हिस्सा थे. उस वक्त की जनगणना के अनुसार बिहार की कुल आबादी 3 करोड़ 85 लाख थी. उसमें सवर्णों की संख्या 47 लाख 92 हजार 764 थी. यानि तब सवर्णों की आबादी 19.45% थी.

ये भी पढ़ें-  Analysis: लोकसभा चुनाव में चिराग के लिए आसान नहीं जमुई में जीत की राह

संयुक्त बिहार में हिन्दुओं में यादवों की संख्या 1931 में भी सबसे अधिक थी. अब भी शेष बिहार में सर्वाधिक है. 2011 के अपुष्ट आंकड़ों के अनुसार आज बिहार में यादवों की आबादी 14.60 प्रतिशत है. इनसे अधिक सिर्फ मुसलमान हैं. जिनकी आबादी 15.50 प्रतिशत है.

बनिया समुदाय की आबादी 8.2 प्रतिशत और कुशवाहा की आबादी 4.5 प्रतिशत है. कुर्मी 3.3 प्रतिशत और मुसहर 2.3 प्रतिशत हैं. मल्लाह की आबादी 5.2 प्रतिशत और दुसाध 5.1 प्रतिशत है. चर्मकार की आबादी 5.3 प्रतिशत है.

ये भी पढ़ें-  बिहार की अदालत ने दिया विजय रूपानी और अल्पेश ठाकोर के खिलाफ केस दर्ज करने का आदेश

दूसरी ओर  2011 के अपुष्ट आंकड़ों के अनुसार बिहार में सवर्णों की संख्या 11.60 है. जाहिर है आबादी के लिहाज से 1931 की तुलना में सवर्णों की भागीदारी घटी है. या यूं कहें कि पिछड़ी, अति पिछड़ी, मुस्लिमों और निम्न जातियों का जनसंख्या अनुपात बढ़ा है. ऐसे में नीतीश कुमार के बयान के मायने समझे जा सकते हैं.

बीते लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पीएम मोदी को बिहार में अति पिछड़े के रूप में ही पेश किया था. यह रणनीति बड़ी कारगर साबित हुई. अति पिछड़े मतदाताओं की संख्या कोई 30-35 प्रतिशत (कहार,कुशवाहा,धानुक और ऐसी ही बहुत सी छोटी-छोटी जातियां) मतदाताओं में सबसे ज्यादा है. इन्होंने खुलकर बीजेपी का साथ दिया और पिछड़े, अतिपिछड़े और सवर्णों के साथ मिलकर केन्द्र में पूर्ण बहुमत की सत्ता प्राप्त कर ली.

ये भी पढ़ें-  जिंदा महिला को चिता पर लिटा कर जलाने की थी तैयारी, पुलिस की तत्परता से बची जान

हालांकि अपने विरुद्ध बन रहे नकारात्मक माहौल को देखते हुए बीजेपी ने सवर्ण आरक्षण का दांव चला. लेकिन बिहार की परिस्थिति में ये उल्टा भी साबित हो सकता है अगर पिछड़ी जातियों की बीजेपी-जेडीयू के पक्ष में गोलबंदी टूटी तो एनडीए को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है.

वहीं आरजेडी ने सवर्ण आरक्षण का विरोध कर यह जता भी दिया है कि वह पिछड़े समुदाय और दलितों को यादवों के साथ मुसलमानों का समीकरण बनाकर एक नई रणनीति पर चलना चाह रही है. इसमें उपेन्द्र कुशवाहा, मुकेश सहनी और जीतनराम मांझी के चेहरे को आगे किया जा रहा है.

वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ये बयान भी उसी संदर्भ में माना जा सकता है कि आरजेडी कहीं इस मुद्दे पर लीड न ले ले और वह अपने ही समर्थक वोटरों को खो दे. क्योंकि माना जाता है कि अतिपिछड़ा समुदाय जहां पीएम मोदी के नाम पर बीजेपी के साथ अब भी खड़ा है, वहीं कुर्मी और कुशवाहा जैसी जातियां नीतीश कुमार को ही अपना चेहरा मानती हैं. इसके साथ ही महादलितों की 22 जातियों में नीतीश कुमार ने गहरी पैठ बनाई है.

ये भी पढ़ें-  लालू के 'इमोशनल स्टेप' से एक हुए तेजस्वी-तेजप्रताप, अब पिता की रिहाई के लिए करेंगे आंदोलन

दरअसल सच्चाई ये है कि बिहार के राजनीतिक-सामाजिक जीवन में जातीयता की गहरी पैठ रही है. चुनाव नजदीक देख सियासी दलों द्वारा विभिन्न जाति संगठनों के रैली-सम्मेलन के आयोजन भी किया जा रहा है. इन सम्मेलनों में राजनीतिक दलों पर आबादी के हिसाब से राजनीतिक हिस्सेदारी की मांग भी गूंजती रही है. अब बारी है टिकट देने और फिर चुनाव जीत कर जाति-समुदाय विशेष का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का है.

वहीं रामविलास पासवान का ये कहना कि सवर्णों ने हमेशा दलितों और पिछड़ों को आगे बढ़ने में मदद की है, का उद्येश्य भी यही है. यह इसलिए कि आरजेडी कभी सवर्णों के नाम पर पिछड़े समुदाय को सेंटिमेंटल ब्लैकमेल न कर सके. जाहिर है ऐसे में नीतीश कुमार का ये बयान भी चुनावी गणित के हिसाब से ही माना जा रहा है ताकि बीजेपी-जेडीयू की ओर बनी जातीय गोलबंदी में टूट न हो.

ये भी पढ़ें- लोकसभा चुनाव 2019: NDA के सामने है बिहार के 'चितौड़गढ़' में जीत का हैट्रिक लगाने की चुनौती

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए देश से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: January 22, 2019, 5:40 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर