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मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार की खबरों के पीछे ये है असली वजह

मोदी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में सहयोगियों को जल्द ही बड़ा मौका मिल सकता है.

मोदी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में सहयोगियों को जल्द ही बड़ा मौका मिल सकता है.

चर्चा है कि जल्द ही मोदी सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार होगा. इसमें कुछ मंत्रियों के विभाग बदल सकते हैं और कुछ नई एंट्र ...अधिक पढ़ें

पिछले करीब 1 सप्ताह से मोदी मंत्रिमंडल (Modi Cabinet) के विस्तार की चर्चा जोरों पर है. सबसे पहले पटना से खबर आई कि जेडीयू (JDU) मोदी मंत्रिमंडल में शामिल हो रही है और उसे सरकार में 3 मंत्री पद दिए जा सकते हैं. पटना से आई इस खबर के बाद दिल्ली में भी चर्चा जोरों पर है. मीडिया में आई खबरों की मानें तो सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार पर चर्चा के कई पहलू हैं. पहला ये कि आने वाले समय में कई मंत्रियों के विभाग बदले जा सकते हैं, तो कई मंत्रियों के काम का बोझ कम किया जा सकता है साथ ही कई मंत्रियों की छुट्टी भी हो सकती है.

दूसरा पहलू ये कि विस्तार में नए सहयोगी दलों को भी जगह मिल सकती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक नितिन गडकरी, पीयूष गोयल, धर्मेंद्र प्रधान जैसे बड़े मंत्री जो काम के बोझ से दबे हैं और इनके पास एक से अधिक मंत्रालयों के काम का जिम्मा है, उनसे एक-एक मंत्रालय वापस लिया जा सकता है.

दरअसल, ज्यादा काम का बोझ वरिष्ठ मंत्रियों के काम की रफ्तार पर पड़ रहा है. इन मंत्रियों के पास महत्वपूर्ण मंत्रालय हैं. सरकार इनका काम हल्का कर रुके हुए कामों में तेजी लाना चाहती है. अब जब मीडिया में मंत्रिमंडल विस्तार की इतनी चर्चा है, तो सवाल ये है कि क्या इसकी कोई खास वजह है? और वो भी तब जब सरकार को काम करते हुए अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ है.


NDA में क्यों बढ़ रही है सहयोगियों की हैसियत?
2019 के लोकसभा चुनाव को देखें तो बीजेपी भले ही एनडीए का हिस्सा बनकर चुनाव लड़ी थी लेकिन पार्टी को अकेले 303 सीटें मिली जो बहुमत के आंकड़े से करीब 10 फीसदी ज्यादा हैं. बीजेपी चाहती तो अकेले सरकार बना सकती थी लेकिन उसने एनडीए की सरकार बनाई, उसके बाद भी पार्टी के कई सहयोगी दल जैसे शिवसेना, जेडीयू, अकाली दल और लोक जनशक्ति पार्टी को भी उतनी हिस्सेदारी नहीं मिली जिसकी वो उम्मीद कर रहे थे.

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शिवसेना ने तो महाराष्ट्र चुनाव के बाद बीजेपी का साथ ही छोड़ दिया और अब एनसीपी-कांग्रेस के साथ सरकार चला रही है. शिवसेना और बीजेपी के बीच मतभेद 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र सरकार में मंत्रिमंडल की सीटों की संख्या पर ही पहली बार सामने आया था. 2019 में मंत्रिमंडल में सीटों की संख्या के कारण ही बीजेपी की दूसरी सबसे पुरानी सहयोगी जेडीयू सरकार में शामिल नहीं हुई. लेकिन एक बार फिर जेडीयू को साथ लाने की बात चल रही है चर्चा है कि जेडीयू को मंत्रिमंडल में 3 बर्थ मिल सकती हैं. ऐसे में सवाल उठाना लाजिमी है कि जिस पार्टी को 2019 में मोदी सरकार में एक से ज्यादा मंत्री पद नहीं मिल रहा था उससे अब तीन मंत्री पद क्यों मिल रहे हैं?

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह. (फाइल फोटो)


इसके पीछे के राजनीतिक कारण को देखें तो 303 सीटों से लोकसभा चुनाव जीतने वाली बीजेपी का 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद हुए विधानसभा चुनाव में सफलता का प्रतिशत बहुत खराब रहा है. लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधान सभा चुनाव में हरियाणा में जहां बीजेपी की सीटों की संख्या कम हुई और उसे गठबंधन की सरकार बनानी पड़ी, वहीं महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्य में बीजेपी की सरकार चली गई.

महाराष्ट्र में तो सरकार जाने का कारण मतदाताओं से ज्यादा बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टियों में से एक शिवसेना का रवैया रहा. 2014 और 2019 में केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री पद को लेकर खराब हुए रिश्ते का असर अब देखने को मिल रहा है, जब मौका मिलते ही शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी जैसे विरोधी विचाराधारा के पार्टियों के साथ चली गई. ऐसे में बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व नहीं चाहेगा कि बिहार चुनाव से पहले उसके सबसे पुरानी सहयोगी दलों में से एक जेडीयू से भी उसके रिश्ते खराब हो क्योंकि सीटों के बटवारे को लेकर पार्टी के स्थानीय नेता कई बार आमने-सामने आ चुके हैं.

मंत्रिमंडल विस्तार में जेजेपी को शामिल कर पार्टी हरियाणा में नए सहयोगी को भी अपने साथ मजबूती से बांधे रखना चाहेगी. बीजेपी के एक धड़े का मानना है कि सहयोगी दल केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद राज्य की राजनीति में अचनाक बदली परिस्थितियों के कारण हड़बड़ी में कोई फैसला नहीं केरेगे.

इसलिए बीजेपी ने बदली रणनीति
राजनीतिक जानकारों का मानना है पिछले करीब 15 महीने में 5 राज्यों में सरकार गंवाने के बाद बीजेपी ने अपनी रणनीति बदल दी है. पार्टी अपने अब अपने सीमा विस्तार की रफ्तार थोड़ा धीमा कर रही है. BJP राज्यों में सरकार में बने रहना चाहती है क्योंकि महाराष्ट्र और झारखंड की सरकार सहयोगियों से रिश्ता खराब होने के नाते ही गई. जबकि हरियाण में नए सहयोगी के कारण ही बीजेपी सत्ता में बनी रह पाई. जानकारों की मानें तो पार्टी के एक बड़े धड़े का मानना है कि विपक्ष में बैठने से जरूरी सत्ता में हिस्सेदारी है और अगर सहयोगी दलों को कुछ केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह देने और राज्यों के चुनाव में कुछ सीटें देने से पार्टी राज्यों की सत्ता में काबिज रह सकती है तो इसमें कोई बुराई नहीं है. बीजेपी की इस रणनीति से एनडीए और मजबूत होगा जिसका दूरगामी फायदा भारतीय जनता पार्टी को ही मिलेगा.

राज्यसभा का गणित भी है एक वजह
हालांकि कुछ लोग भारतीय जनता पार्टी के इस बदले हुए नजरिए के पीछे राज्यसभा के गणित को भी एक बड़ा कारण मान रहे हैं. पार्टी को उम्मीद थी 2020 खत्म होते होते बीजेपी राज्यसभा में बहुमत का आंकड़ा पा लेगी. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में विधानसभा की 325 सीटें होने के बाद भाजपा को 10 में से करीब 8 सीटें मिलने की उम्मीद है. इसके पहले बीजेपी में कई दूसरी पार्टियों के राज्यसभा सदस्य भी शामिल हुए. ऐसे में उम्मीद थी कि उत्तर प्रदेश के राज्यसभा के चुनाव के बाद बीजेपी राज्यसभा में बहुत में आ जाएगी. लेकिन 5 राज्यों की हार ने बीजेपी के राज्य सभा के गणित को उलटा कर दिया.

साल 2020 में जिन 73 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होने हैं उनमें 69 सीटें ऐसी है जो सदस्यों के कार्यकाल पूरा होने से खाली हो रही हैं. जबकि 4 सीटों पहले से खाली हैं. हरदीप पुरी, रामदास आठवले और विजय गोयल का कार्यकाल भी 2020 में खत्म हो रहा है. जिन 73 सीटों पर 2020 में चुनाव होने हैं उनमें बीजेपी अपनी संख्या बढ़ाते हुए नहीं दिख रही है. बिहार की जिन 5 सीटों पर चुनाव होने हैं फिलहाल वह राज्यसभा में एनडीए के पास ही हैं. लेकिन विधानसभा का जो गणित है वह साफ कर रहा है कि कम से कम 2 सीटें आरजेडी के खाते में जाएंगी. इसी तरह राजस्थान में बीजेपी को 1 सीट का नुकसान हो रहा है.

अलग-अलग राज्यों के गणित को देखें तो साफ है बीजेपी को उत्तर प्रदेश से फायदा हो रहा है उतना ही 5 राज्यों की हार के बाद नुकसान. साफ है कि 2020 में बीजेपी अपनी राज्य सभा की वर्तामान सीटों में 83 में एक-दो सीट ही जोड़ पाएगी. जबकि पार्टी 2014 में पार्टी के रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि BJP 2020 में राज्यसभा में 100 का आंकड़ा पार कर जाएगी जिससे राजसभा में बहुमत का आंकड़ा एनडीए के पास हो जाएगा. हालांकि वर्तमान आंकड़े के साहरे ही बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने, तीन तलाक, सीएए जैसे बिल पास कराए हैं लेकिन इन आंकड़ों में उनके सहयोगी दलों का साथ थोड़ा सख्त रहा है. ऐसे में एक वजह ये भी है कि मंत्रिमंडल के बहाने BJP अपने सहयोगियों को साथ रखे.

Tags: Amit shah, Delhi, Modi government, Pm narendra modi

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