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जानिए महाराष्ट्र में क्यों लगा है राष्ट्रपति शासन?

एहतेशाम खान | News18Hindi
Updated: November 13, 2019, 5:18 PM IST
जानिए महाराष्ट्र में क्यों लगा है राष्ट्रपति शासन?
महाराष्ट्र में मंगलवार से राष्ट्रपति शासन लग गया है.

महाराष्ट्र (Maharashtra) में मंगलवार को लगाए गए राष्ट्रपति शासन को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं ऐसे में यह जानना ज़रूरी है कि भारत का संविधान (Indian Constitution) ऐसी स्थिति के लिए क्या कहता है.

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  • Last Updated: November 13, 2019, 5:18 PM IST
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नई दिल्ली. महाराष्ट्र (Maharashtra) में राष्ट्रपति शासन  को लेकर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं. शिवसेना (Shivsena) सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में अर्जी दाखिल करने के लिए विचार कर रही है. शिवसेना का आरोप है कि राज्य के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी बीजेपी (BJP) के इशारे पर काम कर रहे हैं. राज्यपाल ने उन्हें सरकार बनाए के लिए तीन दिन का समय नहीं दिया. शिवसेना ने राज्यपाल से तीन की मोहलत मांगी थी लेकिन इस मांग को ठुकरा दिया गया और राष्ट्रपति शाषन की सिफारिश कर दी गई.

ऐसे में जानना ज़रूरी है कि भारत का संविधान (Indian Constitution) ऐसी स्थिति के लिए क्या कहता है. दरअसल संविधान में कई तरह की स्थिति के लिए कुछ स्पष्ट नहीं कहा गया है. इसलिए जब भी राज्य या केंद्र सरकार बनने या गिरने या राष्ट्रपति शासन लगाने की बात होती है तो सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का ज़िक्र आता है. उसमे सबसे अहम है 11 मार्च 1994 का एसआर बोम्मई जजमेंट (SR Bommai Judgement).

संविधान की यह है व्यवस्था
संविधान में व्यवस्था दी गई है कि जब भी राज्य या केंद्र में सरकार बनानी है तो उसमें राज्यपाल या राष्ट्रपति सबसे पहले सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का न्योता देंगे. अगर वह पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में ना हो तो चुनाव से पहले के सबसे बड़े समूह (Pre poll alliance) को सरकार बनाने के लिए कहा जाए. अगर ये भी संभव ना हो तो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने की लिए कहा जाए. अगर ये भी संभव ना हो तो चुनाव के बाद बने समूह (Post poll alliance) को सरकार बनाने के मौका दिया जाएगा.

इसमें सबसे अहम बात ये है कि राज्य में सरकार बनने को लेकर राज्यपाल की अहम भूमिका होगी. राज्यपाल एक-एक कर राजनीतिक दलों या समूह को सरकार बनाने के लिए कहेंगे. लेकिन इस में राज्यपाल के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई है. ये कहा गया है कि As soon as possible यानी जितना जल्द संभव हो.

गवर्नर की ये है जिम्मेदारी
राज्यपाल को ज़िम्मेदारी दी गई है कि विधायकों का खरीद फरोख्त ना हो. अगर कोई भी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में ना हो तो राज्यपाल राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज सकते हैं. सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी को असेंबली में 50 फीसदी से एक ज़्यादा विधायक का बहुमत होना चाहिए. राष्ट्रपति शासन के फैसले के लिए राज्यपाल के विवेक को अहम बताया गया है.
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खास बात ये है कि राज्यपाल के विवेक का कोई आंकलन नहीं हो सकता. इसका फायदा कई बार केंद्र सरकार उठा लेती है क्योंकि आम तौर पर राज्यपाल केंद्र द्वारा नियुक्त होते हैं. ऐसे कई मामले आए हैं जहां राज्यपाल ने अपने पद का दुरुपयोग किया है. और केंद्र सरकार या सत्ताधारी पार्टी के हक में काम करते हैं. इसलिए बोम्मई फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ गाइडलाइन बनाए हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राष्ट्रपति शासन आखिरी विकल्प होगा. राज्यपाल को देखना होगा कि सरकार बनाने की हर संभव प्रयास किए जा चुके हैं.

फैसले के दो अहम पहलू
बोम्मई फैसले के दो अहम पहलू हैं. पहला ये कि किसी भी पार्टी को बहुमत है या नहीं इसका फैसला सदन के अंदर होगा. सदन के पटल पर वोटिंग से साबित होगा कि उस पार्टी को बहुमत हासिल है या नहीं. ना कि राज्यपाल के विवेक से सब कुछ तय होगा. अगर राज्यपाल राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर रहे हैं तो इसके लिए उन्हें एक रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजनी होगी जिसमें राष्ट्रपति को सेटिस्फाई करना होगा कि सरकार बनाने के सारे विकल्पों का इस्तेमाल किया जा चुका है.

बोम्मई फैसले का दूसरा अहम पहलू ये है कि राज्यपाल के फैसले को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जा सकेगा. इन दो आधार पर ही सरकार बनने या बनी हुई सरकार के गिरने का फैसला लिया जाता है. राष्ट्रपति शासन तब ही लागू हो सकता है जब संविधान के मुताबिक सरकार बनना या चलना असंभव लगे.

राष्ट्रपति शासन का कार्यकाल छह महीने तक होता है. और इस दौरान अगर कोई पार्टी सरकार बनाने का दावा पेश करती है तो उसे इसका मौका दिया जाएगा. राष्ट्रपति शासन सिर्फ एक अस्थायी व्यवस्था होता है.

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First published: November 13, 2019, 5:18 PM IST
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