संभल के! मायावती को Twitter पर 'गालियां' दे रहे लोग जा सकते हैं जेल

मायावती के ट्विटर अकाउंट से किए गए कुल 12 ट्वीट्स के रिप्लाई में लगातार असम्मानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: February 7, 2019, 3:18 PM IST
संभल के! मायावती को Twitter पर 'गालियां' दे रहे लोग जा सकते हैं जेल
बसपा सुप्रीमो मायावती (File Photo)
Ankit Francis | News18Hindi
Updated: February 7, 2019, 3:18 PM IST
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने सोशल मीडिया को लेकर अपनी रणनीति में बदलाव किया है. बसपा सुप्रीमो मायावती अब खुद माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर आ गई हैं. मीडिया से दूरी बनाए रखने का बीएसपी का इतिहास रहा है और सोशल मीडिया पर भी अभी तक न तो पार्टी और न ही पार्टी के किसी बड़े नेता का ट्विटर अकाउंट मौजूद था. बताया जा रहा है कि आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के कहने पर मायावती ने ट्विटर पर आने का फैसला किया है.

मायावती को ट्रोल करने वाले संभल जाएं


मायावती का यह अकाउंट अक्टूबर 2018 में ही बनाया गया था, मगर जनवरी तक इस पर कोई ट्वीट नहीं था. 22 जनवरी को उन्होंने पहला ट्वीट किया- 'नमस्कार भाइयो-बहनों, पूरे सम्मान के साथ मैं आप सबके समक्ष ट्विटर पर कदम रख रही हूं. यह मेरा पहला ट्वीट है. @sushrimayawati मेरा आधिकारिक अकाउंट है और यहीं से मैं भविष्य में आप सबसे संपर्क करूंगी. धन्यवाद.' मायावती के इस अकाउंट को अब तक लगभग 50 हज़ार लोग फॉलो कर चुके हैं.



गौर करने वाली बात ये है कि मायावती के ट्विटर अकाउंट से किए गए कुल 12 ट्वीट्स के रिप्लाई में लगातार असम्मानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है. ट्विटर यूजर्स लगातार उनके पढ़े-लिखे न होने से लेकर उनकी ट्विटर डीपी का भी मज़ाक उड़ा रहे हैं. हालांकि ट्विटर इस्तेमाल करने वाले ऐसे ट्रोल ये नहीं जानते कि इसके लिए उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है. दिल्ली हाईकोर्ट के वकील शैलेंद्र प्रताप सिंह के मुताबिक अगर मायावती के खिलाफ ट्विटर पर भी जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है तो ये सीधे-सीधे एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट का मामला बनता है.



हालांकि शैलेंद्र कहते हैं कि कोर्ट में ऐसे जुर्म को साबित करने के लिए ख़ास जाति के खिलाफ 'स्ट्रॉन्ग लैंग्वेज' का प्रमाण होना चाहिए. एससी-एसटी एक्ट के तहत ऐसे कमेंट के लिए भी शिकायत कराई जा सकती है जिसमें स्पष्ट न कहकर 'ख़ास इंटेन्शन' के तहत किसी जाति का होने पर ट्रोल किया गया हो, लेकिन इसे कोर्ट में साबित करना काफी मुश्किल है. बहरहाल शैलेंद्र ये ज़रूर मानते हैं कि जुर्म हुआ है या नहीं ये तो कोर्ट में साबित होगा लेकिन गिरफ़्तारी ज़रूर हो जाएगी, ऐसे में ट्विटर पर भी किसी तरह का कमेंट करने से पहले सोच लेना चाहिए.
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साइबर एक्सपर्ट के मुताबिक ऐसे मामलों में आईटी एक्ट, आईपीसी और सीआरपीसी तीनों के तहत शिकायत दर्ज कराई जा सकती है. ट्रोलिंग के मामले में तो अगर एससी-एसटी एक्ट कोर्ट में साबित नहीं भी हो पाए तो ट्रोलिंग और हरासमेंट के लिए आईटी एक्ट के तहत भी आपको सजा मिल सकती है.

क्या कहता है एससी कमीशन
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य योगेंद्र पासवान के मुताबिक सोशल मीडिया पर भी अगर किसी व्यक्ति विशेष के लिए अभद्र और जातिसूचक कमेंट या ऐसी चर्चा की जाती है तो ये सीधे-सीधे एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट का मामला बनता है. पासवान के मुताबिक मायावती के खिलाफ हो रही ट्रोलिंग के सन्दर्भ में भी ये मामला बनता है. पासवान ने बताया कि अगर ऐसी ट्रोलिंग काफी ज्यादा है और कोई और आयोग से शिकायत करता है तो आयोग स्वतः संज्ञान लेकर भी पुलिस को मामला दर्ज करने के लिए कह सकता है.



एससी/एसटी एक्ट के तहत तुरंत होती है गिरफ्तारी
बता दें कि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति अगर किसी के खिलाफ एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराता है तो आरोपी व्यक्ति के खिलाफ तुरंत प्राथमिकी दर्ज हो जाती है और बिना जांच के उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया जाता है. एससी/एसटी एक्ट में दर्ज मामलों की सुनवाई भी स्पेशल कोर्ट में होती है. इस एक्ट में अग्रिम जमानत मिलने का प्रावधान नहीं है. इन मामलों में जमानत केवल हाईकोर्ट से मिलती है.

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों पर होने वाले अत्याचार और उनके साथ होनेवाले भेदभाव को रोकने के मकसद से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 बनाया गया था. जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में इस एक्ट को लागू किया गया. इसके तहत इन लोगों को समाज में एक समान दर्जा दिलाने के लिए कई प्रावधान किए गए और इनकी हरसंभव मदद के लिए जरूरी उपाय किए गए. इन पर होनेवाले अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष व्यवस्था की गई ताकि ये अपनी बात खुलकर रख सके.
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