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मणिपुर के इस अलगाववादी को लोग बुलाते हैं 'माटीपुत्र', जानें बंदूक उठाने वाले राजकुमार की कहानी

News18Hindi
Updated: November 20, 2019, 12:39 PM IST
मणिपुर के इस अलगाववादी को लोग बुलाते हैं 'माटीपुत्र', जानें बंदूक उठाने वाले राजकुमार की कहानी
म्‍यांमार में पकड़े जाने के बाद भारतीय इंटेलिजेंस अधिकारियों को उम्‍मीद थी कि राजुकमार मेघन को भारत को सौंप दिया जाएगा.

महान मणिपुरी राजा बीर तिकेंद्रजीत (Bir Tikendrajit) के वंशज राजकुमार मेघन (Rajkumar Meghen) उर्फ सना याइमा (Son of the Soil) के समर्थकों का कहना है कि उन्‍हें अवैध रूप से हिरासत में लिया जा रहा है. इससे पूर्वोत्तर (Northeast) में विद्रोही समूहों (Insurgent Groups) के साथ केंद्र सरकार की ओर से शुरू की गई शांति प्रक्रिया (Peace Process) पर बड़ा असर पड़ सकता है.

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  • Last Updated: November 20, 2019, 12:39 PM IST
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राजीव भट्टाचार्य

गुवाहाटी. मणिपुर के अलगाववादी संगठन (Separatist Outfit) यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (UNLF) के पूर्व मुखिया राजकुमार मेघन (Rajkumar Meghen) उर्फ सना याइमा (Son of the Soil) को एक सप्‍ताह पहले गुवाहाटी (Guwahati) की जेल से रिहा होते ही राष्‍ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) दिल्‍ली ले आई. सरकार के इस कदम से सभी चौंक गए, लेकिन साफ दिख रहा था कि इस बारे में कई महीने पहले ही पूरी योजना बना ली गई थी. मेघन के बेटे और वकील एम. गुनेधर सिंह (M Gunedhor Singh) ने बाद में मीडिया के सामने राजकुमार मेघन को राष्‍ट्रीय राजधानी ले जाए जाने की पुष्टि की. विद्रोही मुखिया को 29 सितंबर, 2010 को बांग्‍लादेश (Bangladesh) में पकड़ा गया था. बाद में भारत को सौंप दिया गया था.

मेघन को देश के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए दी गई थी सजा
एनआईए की विशेष अदालत (Special Court) ने राजकुमार मेघन और उनके साथियों पर देश के खिलाफ जंग छेड़ने का मुकदमा चलाया और सभी को 10 साल कैद की सजा सुनाई. अधिकारियों को डर था कि नगा विद्रोहियों (Naga Militants) के साथ समझौते (Agreement) के बीच मेघन की मणिपुर (Manipur) में उपस्थिति का बुरा असर पड़ सकता है. राजकुमार का मणिपुर की इम्‍फाल घाटी (Imphal Valley) में काफी प्रभाव है, जो नगा विद्रोहियों के साथ समझौते को लेकर पहले से ही आक्रामक है. नेशनल सोशलिस्‍ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (इम्‍फाल) की ओर से उठाई गई ग्रेटर नगालिम (Greater Nagalim) की मांग को सरकार पहले ही खारिज कर चुकी है. इससे क्षेत्र में सरकार के खिलाफ पहले ही माहौल बना हुआ है.

पूर्वोत्‍तर में शांति प्रक्रिया को लंबा नहीं खींचना चाहती सरकार
सूत्रों का कहना है कि सरकार पूर्वोत्तर (Northeast) में अन्य विद्रोही संगठनों के साथ शांति प्रक्रिया (Peace Process) की तर्ज पर मेघन को भी बातचीत की पेशकश करेगी. ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सरकार क्षेत्र में शांति प्रक्रिया को बहुत लंबा नहीं खींचना चाहती है. सरकार उन सभी अलगाववादी संगठनों को शांति प्रक्रिया में शामिल करना चाहेगी, जो समझौते के लिए तैयार हैं. बता दें कि मेघन कोई साधारण विद्रोही नहीं हैं. वह मणिपुर के महान शासक बीर तिकेंद्रजीत (Bir Tikendrajit) के वंशज हैं. राजकुमार मेघन ने जादवपुर युनिवर्सिटी (Jadavpur University) से इंटरनेशनल रिलेशंस में पोस्‍ट ग्रेजुएट करने के बाद जंगलों में जीवन बिताया है. वह ज्‍यादातर समय म्‍यांमार में ही रहे. उन्‍होंने ज्‍यादातर पत्रकारों से 2005 में मुलाकात की.

म्‍यांमार में सजा पाने से बाल-बाल बचे थे राजकुमार मेघन
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मेघन दो बार कचिन (Kachin) गए. ये म्‍यांमार (Myanmar) का उत्‍तरी राज्‍य है, जो चीन (China) और भारत (India) की सीमा से लगा है. वह 2001 में म्‍यांमार में तब सजा पाने से बाल-बाल बचे, जब उन्‍हें और उनके करीबियों को म्‍यांमार की सेना (Army) ने गिरफ्तार कर लिया था. इससे कुछ समय पहले ही यूएनएलएफ ने अलग-अलग जगहों से बड़ी मात्रा में हथियार (Weapons) और गोला-बारूद खरीदा था. जैसे ही इसकी खबर भारत को लगी, नई दिल्‍ली से शीर्ष इंटेलिजेंस ऑफिसर्स (Intelligence Officers) मणिपुर के सीमावर्ती कस्‍बे मोरे पहुंच गए. उन्‍हें उम्‍मीद थी कि म्‍यांमार राजकुमार मेघन को भारत को सौंप देगा, लेकिन यूएनएलएफ ने म्‍यांमार की सेना को भारी-भरकम रकम देकर मेघन को छुडा लिया.

म्‍यांमार की सेना के अभियानों के बाद से खामोश हैं विद्रोही
यूएनएलएफ की स्‍थापना 1964 में की गई थी. यह संगठन नगा नेशनल काउंसिल (NNC) के बाद पूर्वोत्‍तर का दूसरा सबसे पुराना (Second Oldest) अलगाववादी संगठन है. फिलहाल यूएनएलएफ 3,000 काडर की क्षमता के साथ म्‍यांमार से संचालित सभी विद्रोही संगठनों में सबसे बड़ा (Largest) है. यूएनएलएफ म्‍यांमार की कोऑर्डिनेशन कमेटी के उन छह समूहों में एक है, जो मणिपुर से जड़े हुए हैं. हालांकि, म्‍यांमार की सेना की ओर से जनवरी, 2019 से चलाए जा रहे अभियानों के बाद से ज्‍यादातर विद्रोही संगठन खामोश हो गए हैं. सेना ने तगा (Taga) क्षेत्र के शिविरों (Camps) को तबाह कर दिया है और कई वरिष्‍ठ विद्रोहियों को अवैध संगठन चलाने के आरोप में जेल भेज दिया गया है. अब देखना यह है कि राजकुमार मेघन शांति प्रक्रिया में शामिल होते हैं या नहीं.

(लेखक गुवाहाटी के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. लेख उनके निजी विचार हैं.)
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First published: November 20, 2019, 12:04 PM IST
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