आखिर क्यों चुप है कोटा शहर

यहां के आम लोग, मकान मालिक और कोचिंग संस्थान आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह पढ़ाई का दबाव या फिर माता-पिता का प्रेशर नहीं बल्कि स्टूडेंट्स का किसी 'गलत काम' में पड़ जाना मानते हैं.

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: February 15, 2018, 1:34 PM IST
आखिर क्यों चुप है कोटा शहर
यहां के आम लोग, मकान मालिक और कोचिंग संस्थान आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह पढ़ाई का दबाव या फिर माता-पिता का प्रेशर नहीं बल्कि स्टूडेंट्स का किसी 'गलत काम' में पड़ जाना मानते हैं.
Ankit Francis | News18Hindi
Updated: February 15, 2018, 1:34 PM IST
शहर में कोचिंग करने आए स्टूडेंट्स की आत्महत्या की घटनाओं पर बीते दो सालों में कोटा ने एक 'ख़ास' चुप्पी तो ओढ़ ही ली है साथ ही इस बारे में एक आम राय भी कायम की जा रही है. यहां के आम लोग, मकान मालिक और कोचिंग संस्थान आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह पढ़ाई का दबाव या फिर माता-पिता का प्रेशर नहीं बल्कि स्टूडेंट्स का किसी 'गलत काम' में पड़ जाना मानते हैं. ज्यादातर मामलों में ये 'गलत काम' लड़के-लड़कियों का साथ घूमना या किसी लव अफेयर में होना होता है. हालांकि दो मामले छोड़ दें तो किसी में भी रिलेशनशिप के आत्महत्या की वजह होने का मामला सीधे तौर पर सामने नहीं आया है लेकिन इन दो मामलों की आड़ में ये शहर अपनी ज़िम्मेदारी से बचता हुआ नज़र आता है.

सिर्फ एजुकेशन हब नहीं था कोटा
इस शहर की आर्थिकी हमेशा से कोचिंग पर निर्भर नहीं थी. 17वीं सदी के आखिरी सालों में मुग़ल सेना में राव किशोर सिंह नाम का एक सेनापति हुआ करता था जिसने मैसूर से लाकर कोटा को 'मैसूरिया मलमल' का तोहफा दिया. राव किशोर मैसूर से कुछ बुनकरों को लेकर आया था जिन्होंने इस शहर के बाज़ार को 'कोटा-मैसूरिया' साड़ियों के लिए देश भर में मशहूर कर दिया. कोटा में इन साड़ियों को 'मैसूरिया' जबकि बाकी जगह 'कोटाडोरिया' के नाम से जाना जाता है. 18वीं सदी में महाराणा भीमदेव भी दकन से कुछ बुनकरों को लेते आए और इन बुनकरों ने सिल्क और सूत को मिलाकर साड़ियां बनाने की शुरुआत की.

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कोटा डोरिया के आलावा ये शहर कई तरह के चूना पत्थरों (लाइम स्टोन) के लिए भी जाना जाता है. ये पत्थर यहां हरा-नीला, ब्राउन और सफ़ेद रंग में पाया जाता है. इस पत्थर की खासियत है कि ये काफी मजबूत होता है और पानी नहीं सोखता, ये चिकना नहीं होता जिससे फिसलने का खतरा भी नहीं होता. ये पत्थर यहां से पूरे देश में सप्लाई किया जाता है. एजुकेशनल हब बनने से पहले कोटा कि इकॉनोमी का आधार यही दो बिजनेस हुआ करते थे.

ये शहर किसी वजह से 'चुप' है
बातचीत के दौरान साफ़ हो जाता है कि ये शहर इन आत्महत्याओं पर बात करने पर तवज्जो नहीं देना चाहता क्योंकि इसकी बड़ी आबादी की रोज़ी-रोटी का इंतजाम इन्हीं बच्चों के जरिये हो रहा है. एक अनुमान के मुताबिक ये अब 26 हज़ार करोड़ रुपए की इंडस्ट्री बन चुकी है जिसमें काफी लोगों का काफी कुछ दांव पर लगा है. कोटा में मेस चला रहे राजेंद्र बताते हैं कि मीडिया में सुसाइड वाली ख़बरों के आने से मार्केट के बिगड़ जाने का खतरा है. यहां की बड़ी आबादी की आमदनी कोचिंग स्टूडेंट्स के आने पर ही निर्भर है, इसलिए लोगों को लगता है कि नेगेटिव इमेज बनने से अगर मां-बाप ने बच्चों को भेजना बंद कर दिया तो उनका तो धंधा ही ठप हो जाएगा.

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राजेंद्र आगे कहते हैं कि कोचिंग चलाने वाले तो ज्यादातर 'मोटी पार्टी' हैं, जिस शहर बच्चे जाएंगे वहां पहुंच जाएंगे लेकिन हम लोगों के तो भूखे मरने की नौबत आ जाएगी. शहर के लोग ये नहीं चाहते कि बच्चे आत्महत्या करें लेकिन वो ये तो बिलकुल नहीं चाहते कि ये सारी कहानियां बाहर जाएं और उनके बिजनेस को किसी तरह का नुकसान हो. आदिल, तेज, पवन या फिर देव सभी से बात करने के दौरान भी ये 'मकान मालिक' समाज असहज होकर मुझे घूरता है और नहीं चाहता कि मेरे जरिए भी कोई कहानी कही जाए.

इसे ऐसे भी समझा जाए....
आत्महत्या किसी भी समाज की साझी विफलता होती है, ये आत्महत्या करने वाले के सारे करीबी लोगों की नाकामी भी है. कोटा में हो रही आत्महत्याओं के लिए सिर्फ कोचिंग इंस्टीटयूट्स को जिम्मेदार ठहरा देना भी घटना का सामान्यीकरण जैसा भी नज़र आता है. कोटा एक ऐसा शहर है जहां 13 से 16 साल की उम्र में बच्चा 'परचेजिंग पावर' से लैस एक कस्टमर की तरह दाखिल हो रहा है और ये बाज़ार उसकी जेब की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देखता है.

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मेडिकल कि तैयारी के लिए 3 साल से कोटा में रह रहा 18 साल का आदिल बेहद मासूमियत से इसे ऐसे समझाता है- 'जब मैं पहली बार घर से कोटा आया और स्टेशन से बाहर निकला तो ऑटो वाले, मेस वाले, कोचिंग वाले, हॉस्टल वाले सभी ने मुझे चारों तरफ से घेर लिया...उन्हें मैं इंसान नहीं शायद एक एटीएम कार्ड नज़र आ रहा था.' ध्यान से इस शहर के मार्केट पर नज़र डालें तो ये दिखाई भी देता है कि ये यहां के लोकल लोगों के लिए नहीं बल्कि इन स्टूडेंट्स को ध्यान में रखकर ही डवलप हो रहा है.



मामला ये है कि इन कस्टमर्स का बड़ा हिस्सा बेहद छोटे शहरों और गांवों से आ रहा है और ज़्यादातर मामलों में पहली बार घर से इतना दूर आया है. इस मार्केट में कई सौ की संख्या में मौजूद कोचिंग संस्थान, पीजी-मेस-हॉस्टल चलाने वाले लोकल लोगों से लेकर ऑटो वाला, धोबी, छोटी-छोटी परचून की दुकान वाले और शॉपिंग मॉल के मालिक सभी अपनी हिस्सेदारी क्लेम कर रहे हैं. शहर के एक बड़े कोचिंग संस्थान का अधिकारी जब बातचीत के दौरान स्टूडेंट्स को कस्टमर कहकर संबोधित करता है तो स्थिति और साफ़ हो जाती है.

दिक्कत है कि ये कस्टमर उम्र के सबसे दबाव भरे इमोशनल फेज़ से गुजर रहा है जहां उसे पढ़ाई, करियर, फ्यूचर जैसे भारी-भरकम सवालों का जवाब तो चाहिए ही साथ ही रिलेशनशिप, ओपॉजिट सेक्स अट्रेक्शन जैसी चीज़ें भी वो पहली बार महसूस कर रहा है. बहरहाल, आत्महत्या से जुड़े ज्यादातर मामलों में सामने यही निकल कर आता है कि वो अभी सिर्फ 16 साल का एक बच्चा है, जो इन सब तिकड़मों को समझ ही नहीं पा रहा और उसे लगने लगता है कि ये सब उसकी जिंदगी के साथ ही ख़त्म हों पाएंगी.
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