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मजदूर दिवस: लॉकडाउन में घर पहुंचने की चाहत में टूट गई जिंदगी की डोर

लॉकडाउन के दौरान बहुत से लोग पैदल ही अपने घरों की ओर निकल पड़ें.

लॉकडाउन के दौरान बहुत से लोग पैदल ही अपने घरों की ओर निकल पड़ें.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को देशभर में लॉकडाउन की घोषणा की थी, जिसे बाद में बढ़ाकर तीन मई तक कर दिया गया है.

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नई दिल्ली. दिन: 24 मार्च, समय: रात के आठ बजे. हर कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश के नाम संदेश का इंतजार कर रहा था. देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे पहले कोरोना के खतरे से लोगों को अवगत कराया. अपने संदेश में उन्होंने बताया कि कोरोना को हराना है तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना होगा. इसके लिए रात 12 बजे से देश में 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा की जाती है. प्रधानमंत्री के इस संदेश के बाद लोग अपने घर जाने के लिए बेचैन हो गए. कुछ लोग घर पहुंच पाए लेकिन कुछ दूसरे राज्यों में ही फंसे रह गए.

लॉकडाउन के बाद देश की सभी परिवहन सेवाओं को पूरी तरह से रोक दिया गया. लॉकडाउन में दूसरे राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूरों का कामकाज पूरी तरह से ठप हो चुका था. ऐसे में हर कोई अपने घर पहुंचना चाहता था. घर पहुंचने की आंस लिए ​सर पर गठरी और कंधे पर बच्चों को लिए मजूदर पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर दूर के सफर के लिए निकल पड़े. कुछ ने तो ये सफर पूरा कर लिया लेकिन कुछ के लिए ये जिंदगी का आखिरी सफर बन गया.

पहली कहानी : मुंबई से बिस्कुट खाकर निकले थे पर घर पहुंचते ही हो गई मौत
उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले का इंसाफ अली अपने बच्चों का पेट भरने के लिए मुंबई में मिस्त्री हेल्पर का काम करता था. लॉकडाउन के बाद सबकुछ बंद हो गया. हर दिन कमाने वाले इंसाफ के हाथ से काम छिन चुका था. इसके बाद इंसाफ ने घर वापस जाने का मन बना लिया. इंसाफ 13​ अप्रैल को मुंबई से यूपी के लिए पैदल ही निकल पड़ा. 1500 किलोमीटर के इस सफर में बमुश्किल उसे कभी कोई वाहन मिला जिसमें वह बैठा हो. ज्यादा समय वह चलता ही रहा. इंसाफ ने सफर के दौरान केवल बिस्कुट खाया. थका हारा इंसाफ 27 अप्रैल को अपने गांव मठकनवा पहुंच गया. यहां पहुंचते ही उसे क्वारंटाइन कर दिया गया और उसी दिन दोपहर इंसाफ की मौत हो गई.
दूसरी कहानी : 1400 किमी. दूर घर था, 60 किमी. में ही तोड़ दिया दम


मध्य प्रदेश के सीधी के मोतीलाल साहू मुंबई में हाउस पेंटर काम करते थे. लॉकडाउन की घोषणा के समय वह मुंबई में ही थे. उस दौरान उन्होंने कई बार अपने घर लौटने की कोशिश की लेकिन हर बार वह नाकाम रहे. दूसरे लॉकडाउन की घोषणा के बाद उनके सब्र का बांध टूट गया और वह 24 अप्रैल को पैदल ही घर की ओर निकल गए. 1400 किलोमीटर का सफर तय करना आसान नहीं था लेकिन बेबसी और लाचारी में इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था. बताते हैं कि मोतीलाल के साथ 50 और प्रवासी मजदूर भी थी. मोतीलाल खाली पेट ही सफर पर निकल पड़े. उनके साथी बताते हैं कि 60 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद ही उनकी हालत खराब हो गई और कुछ ही देर में उनकी मौत हो गई.

तीसरी कहानी : दिल्ली से घर के लिए निकले, आधे रास्ते में तोड़ दिया दम
बिहार के बेगूसराय में रहने वाली रामजी महतो लॉकडाउन के बाद दिल्ली से अपने घर के लिए निकले थे. 1100 किलोमीटर के इस सफर को उन्होंने आधा पार भी कर लिया था लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. 850 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद उनकी सांस फूलने लगी और उन्होंने सड़क पर ही दम तोड़ दिया. बताय जाता है कि रामजी 3 अप्रैल को दिल्ली से निकले थे लेकिन 16 अप्रैल को यूपी के वाराणसी में बेहोश होकर गिर पड़े. वहां से उन्हें एक अस्पताल में ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. बताया जाता है कि उनके घरवालों के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वह रामजी का शव ले जा सकते. बाद में पुलिस ने ही रामजी का अंतिम संस्कार कर दिया.

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