50 साल तक असम में रह चुके लोगों पर NRC की तलवार, लाखों को नागरिकता खोने का डर

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Updated: August 30, 2019, 1:34 PM IST
50 साल तक असम में रह चुके लोगों पर NRC की तलवार, लाखों को नागरिकता खोने का डर
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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के निर्देश के अनुसार, भारत के रजिस्ट्रार जनरल ( Registrar General of India ) का कार्यालय 31 अगस्त को अंतिम एनआरसी (NRC) प्रकाशित करेगा.

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  • Last Updated: August 30, 2019, 1:34 PM IST
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(प्रांजल बरुआ)

48 वर्षीय दुलाल दास अपने बचपन का डर दूर कर रहे हैं, जब सात साल की उम्र में वह अपने माता-पिता के साथ असम से भागकर पूर्वी पाकिस्तान के मैमनसिंह जिले के दुर्गापुर इलाके में आ गए थे. साल 1968 में पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश- Bangladesh) में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे.

दुलाल ने कहा, 'हमारे घरों को आग लगा दी गई और हम अपनी जान बचाने के लिए भारत (India) भाग गए, लेकिन इस देश में अपने जीवन के पांच दशकों तक रहने के बाद भी  नागरिकता खोने का डर एक बार फिर मुझे सता रहा है, क्योंकि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (National Register of Citizens of India-NRC) की अंतिम सूची में मेरे और मेरे परिवार के सदस्यों के नाम नहीं हो सकते हैं.'

केवल दुलाल ही नहीं, बल्कि अंतिम एनआरसी से निष्कासन की आशंका पूर्वी पाकिस्तान से लगभग 274 हिंदू शरणार्थी परिवारों को है, जो तत्कालीन असम सरकार (Assam) द्वारा गुवाहाटी की राजधानी गुवाहाटी से लगभग 60 किलोमीटर दूर कामरूप जिले के चौधरीपारा में बसाए गए थे. धार्मिक उत्पीड़न के शिकार, ये लोग साल 1964-1968 के बीच राज्य के कई कोनों में बसे थे.

मसौदे में नहीं था मेरा नाम...

दुलाल ने कहा कि 'पिछले साल जारी एनआरसी के मसौदे में मेरा नाम नहीं था. इसमें मेरी पत्नी ममता और बेटे राजेश दास का नाम भी नहीं था. ड्राफ्ट के बाद NRC में हमारे नाम नहीं आए. हमने अपनी नागरिकता का दावा किया और शरणार्थी प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया.' उन्होंने बताया, 'सरकार द्वारा जारी किए गए दस्तावेज़ हमारी बस्तियों को अनुमति देते हैं. हमने भूमि दस्तावेज भी प्राप्त किए, जिसके माध्यम से हमें भूमि के छोटे हिस्से भी आवंटित किए गए थे और दो महीने पहले सुनवाई के दौरान मतदाता सूची के दस्तावेज मिले थे, लेकिन हम अभी भी अनिश्चित हैं कि हमारे नामों का जिक्र होगा या नहीं क्या हम फिर से स्टेटलेस हो जाएंगे?'

ज्यादातर कोच-राजबंशी, हाजोंग और गारो समुदायों से संबंधित हैं, हिंदू शरणार्थी परिवारों का यह झुंड पिछले एक साल में स्थानीय NRC सेवा केंद्र को कागजातों के साथ खुद को और अपने परिवार को शरणार्थी साबित कर रहा है.
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(AP Photo/Anupam Nath)


क्या कहा गया है शरणार्थी प्रमाण पत्र में!

तत्कालीन पुनर्वास मंत्रालय द्वारा जारी किए गए शरणार्थी प्रमाण पत्रों में कहा गया या कि ये परिवार 1964-68 तक बिना किसी पहचान दस्तावेजों के धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारतीय सीमा में पहुंचे. निकटवर्ती शरणार्थी शिविर (बामुनिगांव स्थायी देयता गृह) में कुछ वर्षों तक कैदियों के रूप में रहने के बाद, सरकार ने बाद में प्रत्येक परिवार को जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े आवंटित करने शुरू कर दिए और अब कम से कम दो पीढ़ियों के बाद, परिवार खुद को बाहरी व्यक्ति नहीं मानते.

45 वर्षीय सुशील दास ने कहा 'हालांकि सरकार के रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से कहा गया कि ये सभी परिवार अब यहां बसे हुए थे, साल 1971 से पहले धार्मिक उत्पीड़न के लिए पूर्वी पाकिस्तान से पलायन कर गए थे, मेरा नाम और अन्य परिवारों के नाम NRC के मसौदे से गायब हैं.'

उन्होंने कहा कि NRC अपडेशन प्रक्रिया एक दोधारी तलवार के अलावा और कुछ नहीं है. सुशील ने कहा कि 'हमारी पहचान का सवाल अब सबसे बड़ा दुःस्वप्न बन गया है. मेरे पिता साल 1964 में अपनी मां और दो बहनों के साथ पूर्वी पाकिस्तान से चले गए थे. मैं स्थानीय बच्चों के साथ पैदा हुआ और यहां लाया गया. हमारे परिवार को 80 के दशक में भूमि आवंटन मिला, लेकिन अगर अब हमारे नाम एनआरसी सूची में नहीं हैं, तो हम अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं.'

सुशील ने कहा कि ज्यादातर लोग लंबी और महंगी कानूनी लड़ाई लड़ने में सक्षम नहीं हैं. राज्य समाज कल्याण विभाग ने भारत में आने वाले इन शरणार्थी परिवारों को भूमि आवंटन की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाया था.

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लगभग घर के एक शख्स को सत्यापन के लिए बुलाया

यह समस्या केवल इन हिंदू शरणार्थी परिवारों की ही नहीं है जो इस संकट में हैं. कामरूप में बनगांव से लगभग 23 किलोमीटर दूर मालीबारी पाथर में रहने वाले लगभग पांच हज़ार लोगों की नींद हराम है. हालांकि, पिछले साल की एनआरसी मसौदा सूची में यह पता चला है कि ये परिवार इस महीने की शुरुआत में कम नोटिस के बाद अधिकांश परिवारों से कम से कम एक सदस्य अपने एनआरसी दस्तावेजों के पुन: सत्यापन के लिए बुलाए गए. इसके बाद से ही वे चिंतित हैं.

एक स्थानीय व्यापारी, सिराजुल अली ने कहा, 'लगभग सभी गांव वासी इस महीने की शुरुआत में पुनः सत्यापन में आने के लिए सम्मन जारी किए जाने के बाद से चिंतित हैं. अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य गांवों में बसे हुए थे. हमारे अधिकांश लोगों ने एनआरसी प्राधिकरण द्वारा प्रकाशित प्रारंभिक और अंतिम ड्राफ्ट में कई लोगों के नाम कटे. ताजा समन ने फिर से असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है. सभी की निगाहें 31 अगस्त पर टिकी हैं, जब हमारे भविष्य का भाग्य NRC की रिलीज़ के साथ तय किया जाएगा.'हालांकि, अली के परिवार के सभी सदस्यों का NRC के मसौदे में नाम था लेकिन उनके भाई मोइनुल कोपुन: सत्यापन के लिए NRC प्राधिकरण के सामने पेश होने के लिए कहा गया था.

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अगर फाइनल एनआरसी में नाम नहीं आया तो?

केंद्र ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि अंतिम एनआरसी उन लोगों के लिए बंद नहीं होगा जो इससे छूट जाएंगे. अंतिम NRC से बचे लोगों को ट्रिब्यूनल का रास्ता अपनाना होगा. विदेशियों के न्यायाधिकरणों (FTs) के समक्ष नागरिकता की अपील करने के लिए वधि 60 दिनों से बढ़ाकर 120 दिनों तक करने के लिए, सरकार संकट को दूर करने के लिए कुछ 200 अतिरिक्त FTs भी तैयार कर रही है. पहले से ही 100 एफटी मौजूद हैं. यदि कोई न्यायाधिकरण किसी को विदेशी घोषित करता है, तब भी उसे राहत के लिए अदालतों के समक्ष प्रार्थना करने का विकल्प मिलेगा.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, भारत के रजिस्ट्रार जनरल का कार्यालय 31 अगस्त को अंतिम एनआरसी प्रकाशित करेगा. जुलाई 2018 में जारी अंतिम मसौदा में 40 लाख आवेदकों बाहर कर दिए गए थे, जिनमें से लगभग 31 लाख ने फिर से आवेदन किया था.

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First published: August 30, 2019, 12:55 PM IST
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