COVID-19 : भारत समेत दुनिया के कई देशों में कोरोना की दूसरी लहर, क्या खत्म होगा वायरस या बढ़ेगा खतरा?

पूरी दुनिया के कुल संक्रमितों की संख्या में 20.22% अमेरिका और 16.89% मरीज भारत में हैं. (PTI)
पूरी दुनिया के कुल संक्रमितों की संख्या में 20.22% अमेरिका और 16.89% मरीज भारत में हैं. (PTI)

Second Wave of Covid-19 Pandemic: कोरोना वायरस (Coronavirus) का सबसे ज्यादा असर अमेरिका और भारत में देखने को मिला. अमेरिका में अब तक 1.18 करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं. यानी पूरी दुनिया के कुल संक्रमितों की संख्या में 20.22% अमेरिका और 16.89% मरीज भारत में हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 9, 2020, 10:27 AM IST
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नई दिल्ली. दुनिया में कोरोना वायरस (Coronavirus) को आए हुए एक साल होने वाला है. पिछले साल इसी महीने की 17 तारीख को चीन के वुहान में आधिकारिक तौर पर 55 साल की महिला को कोरोना संक्रमित बताया गया था. इसके बाद कोरोना पूरी दुनिया पर कहर बनकर टूटा. अब तक दुनियाभर में 5 करोड़ से ज्यादा लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं. 12 लाख 57 हजार से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं. वहीं, भारत में कोरोना मामलों का आंकड़ा 85 लाख के पार हो गया है, जबकि संक्रमण से अब तक 1 लाख 26 हजार 611 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. इस बीच देश के कुछ राज्यों जैसे दिल्ली, महाराष्ट्र, केरल में कोरोना की दूसरी लहर (Second Wave of Covid-19) आ चुकी है.

दिल्ली के कुछ इलाकों में कोरोना की तीसरी लहर की बात भी कही जा रही है. दुनिया की बात करें तो फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका कोरोना के सेकंड वेब देख रहे हैं. कई देश दोबारा लॉकडाउन (Covid-19 Lockdown) की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसे में सवाल ये है कि कोरोना के दूसरी लहर के बाद क्या इसका संक्रमण खत्म हो जाएगा या भारत समेत दुनियाभर के तमाम देशों को कोरोना की तीसरी लहर के लिए तैयार रहना चाहिए.

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अमेरिका और यूरोप में संक्रमण खतरनाक स्तर पर पहुंचता जा रहा है. ब्रिटेन में शनिवार को 413 संक्रमितों की इलाज के दौरान मौत हो गई. अमेरिका में लगातार आठवें दिन एक लाख से ज्यादा मामले मिले. ब्रिटेन में दूसरे यूरोपीय देशों की तरह संक्रमण तेजी से फैल रहा है. सरकार ने देश के कुछ हिस्सों में कर्फ्यू लगाया, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हो रहा. शनिवार को यहां 25 हजार से ज्यादा मामले सामने आए. इसी दौरान 413 संक्रमितों की मौत हो गई. सरकार ने साफ कर दिया है कि तमाम विरोध के बावजूद लॉकडाउन खत्म किए जाने का कोई प्लान नहीं है. अंग्रेजी अखबार 'इंडियन एक्सप्रेस' ने प्रोफेसर सुनेत्रा गुप्ता के हवाले से कोरोना वायरस की दूसरी लहर और उससे होने वाले संभावित खतरों को आगाह किया है.
आइए जानते हैं प्रोफेसर सुनेत्रा ने कोरोना वायरस की दूसरी लहर और हर्ड इम्यूनिटी को लेकर क्या कहा:-

कोरोना वायरस की दूसरी लहर को लेकर प्रोफेसर सुनेत्रा गुप्ता बताती हैं, 'जब एक नया रोगजनक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करता है, जहां किसी की भी प्रतिरक्षा नहीं होती है, तो यह तबाही का कारण बन सकता है. आमतौर पर, प्रतिरक्षा में जोखिम बहुत कम रहता है. इसे जीका वायरस से समझा जा सकता है, जिसका प्रकोप हाल ही में ब्राजील में देखा गया था. इसमें माइक्रोसेफली का एक अंश था और अब ये व्यापक आबादी की प्रतिरक्षा बन चुका है. इसका मतलब यह नहीं है कि जीका गायब हो गया है, लेकिन इसका संक्रमण कुछ कम जरूर हुआ है.

कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में हर्ड इम्यूनिटी कितनी कारगर है? इस सवाल के जवाब में प्रोफेसर गुप्ता बताती हैं, 'हाल में हुए अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि हर्ड इम्यूनिटी कोरोना से जूझ रहे देशों के लिए फिलहाल दूर की बात है. क्योंकि जिन देशों में भी कोरोना फैला है, वहां पर संक्रमितों का प्रतिशत सिंगल डिजिट में ही है. हर्ड इम्यूनिटी वह स्तर होता है, जिसके बाद वायरस व्यापक रूप से नहीं फैल पाता.'

दरअसल, लॉकडाउन की वजह से ठप हुए उद्योग-धंधों और सुस्त होती अर्थव्यवस्थाओं को देखते हुए कुछ वैज्ञानिकों ने सवाल उठाया था कि आखिर कब तक वायरस से छिपकर बैठा जा सकता है. ऐसे वैज्ञानिकों की दलील थी कि भुखमरी के ज़्यादा बड़ी समस्या बनने से पहले कोरोना वायरस के खिलाफ हर्ड इम्यूनिटी विकसित करने के बारे में सोचना चाहिए. लेकिन फिलहाल जो अध्ययन हुए हैं उनसे साफ हो गया है कि हर्ड इम्यूनिटी कोविड19 वायरस से निपटने का कारगर हथियार नहीं है, बल्कि इससे किसी भी देश की जनसंख्या के बड़े हिस्से को जान का जोखिम हो सकता है.


वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर कोई बीमारी जनसंख्या के बड़े हिस्से में फैल जाती है तो बाकी बचे लोग इससे सुरक्षित हो जाते हैं, यानी इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस बीमारी से लड़ने में संक्रमित लोगों की मदद करती है. ऐसे लोग जो बीमारी से लड़कर पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, वो उस बीमारी से ‘इम्यून’ हो जाते हैं, यानी उनमें प्रतिरक्षात्मक गुण विकसित हो जाते हैं. इम्यूनिटी का मतलब है कि व्यक्ति को संक्रमण हुआ और उसके बाद उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ने वायरस का मुक़ाबला करने में सक्षम एंटी-बॉडीज़ तैयार कर लिया.

हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने में भारत अभी कितना दूर है? इसके जवाब में प्रोफेसर कहती हैं, 'भारत में कई इलाके पहले ही स्पष्ट रूप से हर्ड इम्यूनिटी हासिल कर चुके हैं, क्योंकि संक्रमण का स्तर स्वाभाविक रूप से गिर रहा है. ऐसी कई स्टडी सामने आई है, जिसमें कहा गया कि भारत में कुछ जगहों पर विशेष रूप से 60-70% एंटीबॉडी मिली है. ये वे क्षेत्र हैं जहां रिकवरी ज्यादा हुई है. चूंकि, अभी कोविड-19 की वैक्सीन नहीं विकसित हुई है. इसलिए हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने का एक ही तरीका है कि कुल जनसंख्या का 60 से 70% कोरोना संक्रमित हो जाएं.


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प्रोफेसर सुनेत्रा गुप्ता आगे बताती हैं, 'उन देशों में जिनमें कोरोना का प्रकोप सबसे ज़्यादा रहा, वहां भी हर्ड इम्यूनिटी के लिए ज़रूरी संख्या तक संक्रमण नहीं फैला है. स्वीडन की बात करें तो उसने लॉकडाउन का पालन नहीं किया. रेस्टोरेंट, स्कूल, पार्क खुले रखे. दलील ये दी गई कि बीमारी से निपटने के शॉर्ट टर्म तरीकों की जगह वहनशक्ति बढ़ाने के लॉन्ग टर्म तरीकों पर ध्यान दिया जाए.'

क्या पहले हर्ड इम्यूनिटी हासिल की गई?
जॉन हॉप्किन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के मुताबिक खसरा, चेचक, पोलियो, ममप्स (गलगंड रोग) कुछ बहुत ही ज़्यादा संक्रमित बीमारियां अमेरिका से अब लगभग मिट चुकी हैं क्योंकि वैक्सीन की मदद से हर्ड इम्यूनिटी हासिल की जा चुकी है. हालांकि, कुछ ऐसी जगहों पर अब भी इनके फैलने के मामले सामने आते रहते हैं, जहां वैक्सीनेशन कम हुआ हो.ऐसी बीमारियां जिनकी वैक्सीन नहीं बन पाई है उनके संपर्क में आने पर भले ही व्यस्कों में इम्यूनिटी पैदा हो जाए, लेकिन बच्चों के लिए खतरा हो सकता है.
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