अब गांव का हर सरकारी स्कूल होगा डिजिटल, उपराष्ट्रपति ने किया शुभारंभ

देश डिजिटल हो रहा है. हर कोई सूचना के इस संचार से जुड़ना चाह रहा है, ऐसे में हम चाहते हैं कि गांव-देहात के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे भी आगे बढ़ें और अपना भविष्य संवारे.

Bikram Singh | News18India
Updated: September 30, 2018, 9:27 PM IST
अब गांव का हर सरकारी स्कूल होगा डिजिटल, उपराष्ट्रपति ने किया शुभारंभ
देश डिजिटल हो रहा है. हर कोई सूचना के इस संचार से जुड़ना चाह रहा है, ऐसे में हम चाहते हैं कि गांव-देहात के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे भी आगे बढ़ें और अपना भविष्य संवारे.
Bikram Singh | News18India
Updated: September 30, 2018, 9:27 PM IST
देश में डिजिटल स्कूल की शुरुआत ग्वालियर से हो चुकी है. इसका शुभारंभ उपराष्ट्रपति ने 29 सिंतबर को रिमोट दबाकर किया. शुरुआत में ग्वालियर के 100 सरकारी स्कूलों को डिजिटलाइज्ड किया गया है. आने वाले दिनों में पूरे देश के सरकारी स्कूलों को किया जाएगा. इस मौके पर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मौजूद थे. इस ड्रीम प्रोजेक्ट में 'नरेद्र सिंह तोमर' का महत्वपूर्ण योगदान है. केंद्रीय मंत्री के अलावा मंच पर प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया, नगरीय विकास और आवास मंत्री माया सिंह, महापौर विवेक नारायण शेजवलकर, ग्वालियर ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र के विधायक भारत सिंह कुशवाहा, जिला पंचायत की अध्यक्ष श्रीमती मनीषा भुजबल सिंह यादव, हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के सीईओ सुनील दुग्गल और मुस्कान फाउंडेशन के अभिषेक दुबे भी उपस्थित थे.



क्या है 'मेरा स्कूल, डिजिटल स्कूल'?



'मेरा स्कूल, डिजिटल स्कूल' केंद्रीय ग्रामीण विकास, खनन एवं पंचायती राज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की एक पहल हैंइस मुहिम से वो गांव के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों को एक स्वस्थ माहौल दे रहे हैं ताकि देश का विकास सच्चे रूप में विकास हो सके.

इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री कहते हैं देश डिजिटल हो रहा है. हर कोई सूचना के इस संचार से जुड़ना चाह रहा है, ऐसे में हम चाहते हैं कि गांव-देहात के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे भी आगे बढ़ें और अपना भविष्य संवारे. डिजिटल स्कूल हमारा ड्रीम प्रोजेक्ट है, यह एक कोशिश है. इसके द्वारा गांव के बच्चे देश के विकास में अपनी भागीदारी निभा सकते हैं और गर्व से कह सकते हैं कि हम किसी से कम नहीं हैं. साथ ही साथ मंत्री ने इस कार्यक्रम को देश के पूर्व प्रधानमंत्री व भाजपा के संस्थापक अटल बिहारी वाजेपयी  को समर्पित किया.

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अटलजी को सपर्पित है ये कार्यक्रम
कार्यक्रम में उपस्थित उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में गांव एवं शहर के अंतर को कम करने के लिये साझा प्रयासों की जरूरत है और ग्रामीण डिजिटल स्कूलों का यह मॉडल पूरे देश के लिए प्रेरणादायी है.  डिजिटल स्कूलों ने देश को महत्वपूर्ण एवं बड़ा संदेश दिया है. ग्रामीण विद्यार्थी अब डिजिटल तरीके से विज्ञान व गणित की पढ़ाई करेंगे. यह प्रोजेक्ट से हम नए भारत के निर्माण की ओर तेजी से कदम बढ़ा सकते हैं, ये वो भारत है जिसकी कल्पना पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी ने किया था. इस कार्यक्रम के लिए मुस्कान ड्रीम्स के संस्थापक अभिषेक दुबे व पूरी टीम को तहेदिल से बधाई देना चाहता हूं.



इस लड़के की ज़िद से डिजिटल हुए 100 सरकारी क्लास

"ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है" लिखने वाले क्या ख़ूब लिखा है. उपर्युक्त पंक्तियां ग्वालियर के रहने वाले अभिषेक दुबे पर सटीक बैठता है. आज से ठीक 5 साल पहले यानी 2013 मेंअपने साथियों की तरह अभिषेक अपनी करियर बनाना चाहते थे. करियर के लिए उन्होंने ग्वालियर के एक प्रतिष्ठित संस्थान आईटीएम में एडमिशन लिया. पढ़ाई में मन भी लग रहा था और पढ़ाई भी करना चाहता थे, मगर ग़रीब और बेसहारा बच्चों की पढ़ाई ने झकझोर दिया. वो बच्चों की पढ़ाई के लिए हमेशा चिंतित रहने लगे. समय बीतता गया और अभिषेक की चिंता भी बढ़ती गई. पढ़ाई के दौरान अपना समय निकालकर बच्चों को पढ़ाते थे, मगर अभिषेक के साथ समस्याएं आने लगीं. इजीनीयरिंग की पढ़ाई कर रहे थे ऐसे में प्रोजेक्ट्स और होम वर्क भी मिल रहे थे. अभिषेक ने ठान लिया कि बच्चों का भविष्य सुधारेंगे, इसके लिए पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी. अभिषेक के इस कदम से उनके पिताजी दुखी हुए और गुस्से में कह दिया कि या तो पापा चुन लो या फिर बच्चे. अभिषेक के लिए बहुत ही कठिन समय था, मगर हिम्मत नहीं हारी और बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाने में लग गए.

दोस्तों ने मदद की

अभिषेक की मेहनत रंग लाई. साथ में पढ़ रहे साथियों ने अभिषेक की मदद की और शेल्टर होम्स में रह रहे बच्चों को पढ़ाने में लग गए. इतना ही नहीं, दोस्तों की मदद से 2014 में मुस्कान ड्रीम्स नाम की संस्था की स्थापना की. अभिषेक अपने धून में रम गए. इसी बीच बच्चों को स्कूल किट देने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया. इस काम में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और आईटीएम के प्रबंधक दौलत सिंह ने सहयोग किया.



कैसा होता है डिजिटल स्कूल?

यूं तो डिजिटल स्कूल के बारे में में कई ख़बरें पढ़ने, देखने व सुनने को मिलती हैं, मगर हक़ीक़त कुछ और ही होती है. आइए, आपको वास्तविक डिजिटल स्कूल की ख़ासियत के बारे में बताते हैं.

स्कूलों का सौंदर्यीकरण- सरकारी स्कूलों की मरम्मत की जाती है. उसके बाद दीवारों पर चर्चित कार्टून्स की पेंटिंग की जाती है. साथ ही साथ महापुरुषों के अनमोल विचारों को भी लिखा जाता है.

दीवारों पर एटलस- बच्चों का प्रैक्टिकल ज्ञान बढ़ाने के लिए दीवारों पर एटलस लगाए गए हैं. इसके अलावा फोटो सिंथेसिस चार्ट से लेकर बॉडी डायग्राम बनाए गए हैं. साथ ही साथ इस स्कूल में प्रोजेक्टर से पढ़ाई की व्यवस्था की गई है.

डिजिटल लर्निंग-  स्कूल में 2 कम्प्यूटर लगवाए जाते हैं. इनकी मदद से बच्चों को पढ़ाया जाता है.

प्रोजेक्टर- क्लासरूम में प्रोजेक्टर भी लगवाए गए हैं, इसकी मदद से बच्चों को बड़े पर्दे पर पढ़ाया जाता है.

कंटेंट- पढ़ाई को रोचक बनाने के लिए कंटेंट पर काम किया गया है. EXTRA MARKS नाम की कंपनी ने विशेष तौर पर बच्चों के लिए पढ़ाई का कंटेंट तैयार किया है. इसकी मदद से बच्चे आसानी से पढ़ते हैं.

टीचर्स ट्रेनिंग-  स्कूल में कक्षा 6 से 8वीं की 109 छात्राएं अध्ययनरत हैं. प्रोजेक्टर के जरिए हर क्लास की छात्राओं को 2-2 घंटे पढ़ाया जाएगा.


इस पूरे कार्यक्रम और कोर्स डिजाइनिंग पर मुस्कान ड्रीम्स के संस्थापक अभिषेक दुबे बताते हैं कि हमारा मक़सद गांव के बच्चों को बेहतर भविष्य देना है. हम चाहते हैं कि कोई उनकी ग़रीबी पर दया न करे. अगर उनको अच्छी पढ़ाई मिल गई तो वो अपना रास्ता और भविष्य ख़ुद बना लेंगे. मुस्कान ड्रीम्स से जुड़े सभी लोग इस उद्धेश्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं. पहले बच्चों को पढ़ाई में कम इंटरेस्ट था, मगर अब वो पढ़ना चाहते हैं. आने वाले दिनों में यही बच्चे देश का भविष्य बनेंगे. हमें ख़ुशी है कि हमें सभी का साथ मिल रहा है.

बहुत कम लोग होते हैं जो गांव के विकास के बारे में सोचते हैं. आज अभिषेक जैसे लोगों के कारण कई बच्चों और गरीब परिवारों के चेहरे पर ख़ुशियां आ रही हैं. 29 सितंबर को ग्वालियर के मेला ग्राउंड में यह कार्यक्रम  संपन्न हुआ. इस कार्यक्रम में सभी स्कूलों के बच्चों को बुलाया गया था. वहीं ग्वालियर जिले से 40 किमी दूर चीनौर ग्राम में स्थित मिडिल स्कूल के छात्राओं को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था. ये वही जगह है, जहां से डिजिटल स्कूल की शुरुआत हुई.

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यहां पढ़ने वाली छात्राएं बहुत ख़ुश थीं. उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वो उपराष्ट्रपति के साथ बैठकर फ़ोटो खींचवाएंगी. 15 साल की दिव्या बताती हैं कि एक समय ऐसा था, जब गांव में स्कूल नाम मात्र का था. लोग सिर्फ़ नाम लिखवाते थे ताकि डिग्री मिल जाए, मगर आज गांव की ही नहीं आस-पास के इलाके की बी लड़कियां कंप्यूटर की पढ़ाई करने आती हैं. ये हमारे लिए किसी सपने से कम नहीं है.


दिव्या के साथ आईं एक टीचर जो स्कूल में ही कंप्यूटर पढ़ाती हैं. उन्होंने बताया कि हमें पहले कंप्यूटर चलाना नहीं आता था. मगर हमने इसी स्कूल से सीखा और बच्चों को पढ़ा रही हूं. आज इसके कारण ज़िंदगी में बहुत बदलाव हो रहे हैं.

सोचिए, भारत के कई गांवों में स्कूल नहीं हैं, कई ऐसे स्कूल हैं जहां टीचर नहीं हैं, जहां टीचर और स्कूल हैं वहां पढ़ाने वाला कोई नहीं है. अगर ऐसे में डिजिटल देश की ज़रूरत बन गई है. आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए कम ख़र्चे पर पूरे देश के बच्चों को बेहतरीन शिक्षा दी जा सकती है. आने वाले दिनों में ये संभव भी है.

 

 
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