विधि आयोग का सरकार को झटका, कहा- कॉमन सिविल कोड की जरूरत नहीं

केंद्र सरकार ने विधि आयोग से कानूनी राय मांगी थी की क्या देश में हर धर्म के लोगों के लिए एक यूनिफार्म सिविल कोड होना चाहिए.

भाषा
Updated: September 1, 2018, 8:53 AM IST
विधि आयोग का सरकार को झटका, कहा- कॉमन सिविल कोड की जरूरत नहीं
प्रतीकात्मक तस्वीर
भाषा
Updated: September 1, 2018, 8:53 AM IST
विधि आयोग यानि लॉ कमीशन ने पर्सनल लॉ और यूनिफार्म सिविल कोड पर केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि मौजूदा हालात में यूनिफॉर्म सिविल कोड की जरूरत नहीं है. हर धर्म के अपने पर्सनल लॉ है और उन्हें बेहतर बनाने की जरूरत है.

इससे पहले केंद्र सरकार ने विधि आयोग से कानूनी राय मांगी थी कि क्या देश में हर धर्म के लोगों के लिए एक यूनिफार्म सिविल कोड होना चाहिए. साथ ही कई ऐसे प्रथा जैसे ट्रिपल तलाक, बहु विवाह और हलाला जैसी चीजों पर राय मांगी गई थी. 187 पन्नो के विस्तृत रिपोर्ट में विधि आयोग ने हर पहलू पर अपनी राय दी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि-



इस स्टेज पर यूनिफॉर्म सिविल कोड की जरूरत नहीं है. मौजूदा पर्सनल कानूनों में सुधार की जरूरत है. धार्मिक परम्पराओं और  मूल अधिकारों के बीच सामंजस्य बनाने की ज़रूरत है. ट्रिपल तलाक को सुप्रीम कोर्ट पहले ही रदद् कर चुका है.

हालांकि केंद्र सरकार ट्रिपल तलाक पर एक कानून बनाने की सोच रही है लेकिन रिपोर्ट इसको लेकर किसी कानून का जिक्र नहीं करती. कमीशन के मुताबिक एकतरफा तलाक की स्थिति में घरेलू हिंसा रोकथाम कानून और IPC 498 के तहत कार्रवाई की जा सकती है. रिपोर्ट में ट्रिपल तलाक की तुलना सती, देवदासी, दहेज प्रथा जैसी परम्पराओं से की है. कहा गया है कि ट्रिपल तलाक न तो धार्मिक परम्पराओं और न ही मूल अधिकारों से जुड़ा है. अगर ट्रिपल तलाक पर लगाम लगता है तो हलाला भी खत्म हो जाएगा.

मुस्लिम में बहुविवाह करने वाले  लोगों की संख्या नगण्य है. ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा है, जिन्होंने कई शादी करने के मकसद से मुस्लिम धर्म अपनाया.

कई मुस्लिम देशों में दो विवाह को लेकर सख्त कानून है. पाकिस्तान में दूसरा विवाह करने के लिए पहली पत्नी की मंजूरी जरूरी है. पहली पत्नी की मर्ज़ी के बिना दूसरी शादी करना अपराध है. इसलिए ये बेहतर होगा कि निकाहनामे में जिक्र होना चाहिए कि बहुविवाह करना अपराध होगा. हालांकि कमीशन  ने कहा कि वो फिलहाल इसकी सिफारिश नही कर रहा क्योंकि मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है.

मुस्लिम समाज में प्रचलित कॉन्ट्रैक्ट मैरिज महिलाओं के लिए फायदेमद है. अगर कॉट्रेक्ट की शर्तों पर सही तरह से अमल हो तो वो फायदेमंद है.
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रिपोर्ट में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मॉडल निकाहनामा पर विचार करने के लिए कहा गया है.

लॉ कमीशन ने सभी धर्मो के अवैध (शादी से बाहर के) बच्चों के लिए स्पेशल कानून बनाने की सिफारिश की है. कहा गया है कि इन बच्चों को अपने माता-पिता की सम्पति में बराबर हक़ मिलना चाहिए.

लॉ कमीशन ने स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 में बदलाव की बात की है. अभी कोर्ट में हुई शादी को कानूनी मान्यता देने से पहले परिवार वालों को 30 दिन का नोटिस पीरियड दिया जाता है.

लॉ कमीशन ने कहा कि ये पीरियड खत्म होना चाहिए या उस दौरान कपल को सुरक्षा दी जानी चाहिए. कमीशन का मानना है कि इस पीरियड का अंतर्जातीय शादी का विरोध करने वाले परिवारवाले गलत इस्तेमाल करते है. साथ ही ये शादी के लिए धर्मांतरण को बढ़ावा देता है.

रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि लड़का और लड़की दोनों की शादी की उम्र 18 साल होनी चाहिए. मौजूदा स्थिति में लड़के की शादी की उम्र 21 और लड़की की 18 है. इससे इस मान्यता को बढ़ावा मिलती है कि लड़की हमेशा लड़के से छोटी होनी चाहिए.

साथ ही तलाक को और आसान बनाने की भी बात कही गई है. इससे कानूनी पचड़े में पड़े शादीशुदा जोड़े की जिंदगी आसान हो जाएगी.
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