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नेतृत्व, संगठन, आंतरिक कलह, कांग्रेस के लिए कई सवाल छोड़ गया जितिन प्रसाद का पार्टी से जाना

कांग्रेस में बेचैनी का सबसे बड़ा मुद्दा संगठन स्तर पर प्रबंधन और नेतृत्व है. (पीटीआई फाइल फोटो)

Jitin Prasada Joins BJP: समितियों की बढ़ती संख्या इस बात की ओर इशारा कर रही है कि पार्टी कमजोर नेतृत्व के बीच आंतरिक मुश्किलों का सामना कर रही है. पार्टी के भीतर इस तरह की गतिविधियां पहले ही हताश कार्यकर्ताओं के लिए अच्छी नहीं हैं.

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    नई दिल्ली. जितिन प्रसाद का पार्टी से जाना कांग्रेस (Congress) की कार्यप्रणाली पर कई तरह से सवाल खड़े कर रहा है. प्रसाद का दल बदलने का यह फैसला 2014 के बाद से संगठन के आंतरिक मुद्दों को खत्म ना कर पाना, नेतृत्व समेत पार्टी की कई जारी मुश्किलों की ओर इशारा कर रहा है. हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के करीबी कांग्रेस से बाहर हुए हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) भी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो चुके हैं. साथ ही सचिन पायलट (Sachin Pilot) भी बगावत कर चुके हैं.

    टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, सिंधिया और पायलट दोनों अपने राज्यों में बुजुर्ग नेताओं से घिरा हुआ महसूस कर रहे थे. कई अन्य नेताओं के समेत प्रसाद उन राजनेताओं में से हैं, जिनपर कांग्रेस ने सत्ता में रहने के दौरान काफी दांव लगाया था, लेकिन बुरे दौर से उबरने के दौरान उनके लिए कोई भूमिका तलाश नहीं कर सके थे.

    उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व में हुए प्रयोग से प्रसाद को बाहर रखा गया था. G-23 समूह में शामिल होने के बाद उन्हें 'प्रमोट' कर पश्चिम बंगाल का AICC प्रभारी बना दिया गया था. यह कदम प्रसाद के राज्य से उनके निर्वासन की ओर संकेत कर रहा था. अब प्रसाद के पार्टी छोड़ने से इस बात को बल मिलता दिख रहा है कि कांग्रेस नेता अभी और भविष्य में पार्टी को विजेता के रूप में नहीं देख रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ राहुल गांधी की नाराजगी भी पार्टी सदस्यों को प्रभावित नहीं कर पाई है.

    कांग्रेस में बेचैनी का सबसे बड़ा मुद्दा संगठन स्तर पर प्रबंधन और नेतृत्व है. हाल ही में केरल, असम और बंगाल में हुई हार के बाद अशोक चव्हाण कमेटी को जांच करनी पड़ी. जबकि, पंजाब में जारी असंतोष के बीच भी AICC को कमेटी तैयार करनी पड़ी है. जबकि, राजस्थान में संकट को खत्म करने के इरादे से तैयार की गई कमेटी ने अभी भी मुद्दे को खत्म नहीं किया है.

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    समितियों की बढ़ती संख्या इस बात की ओर इशारा कर रही है कि पार्टी कमजोर नेतृत्व के बीच आंतरिक मुश्किलों का सामना कर रही है. पार्टी के भीतर इस तरह की गतिविधियां पहले ही हताश कार्यकर्ताओं के लिए अच्छी नहीं हैं. रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी खुद को तैयार करने के लिए वापसी नहीं कर पा रही है. उदाहरण के लिए केरल में हार के बाद राज्य में नए नेतृत्व की घोषणा की गई. इसपर एक पदाधिकारी का कहना है कि 'बिखरा हुआ नेतृत्व' एक असफल प्रयोग है.

    इसके अलावा लीडरशिप से जुड़ी परेशानियां पार्टी के अंदर अनिश्चितता बढ़ा रही हैं. कांग्रेस के सदस्य उस पैटर्न की ओर इशारा कर रहे हैं कि गांधी से सीधे संपर्क में रहने वाले युवा नेता ही पार्टी के बुरे दौर में पहले बगावत कर रहे हैं. खैर कांग्रेस का सियासी भविष्य काफी हद तक उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और पंजाब में आगामी चुनाव पर निर्भर करता है.