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RIP Birju Maharaj: ‘मैं जंगल की लाकड़ी, नहीं कोऊ है मोल, अधर लपट घनश्याम के, भई बहुत अनमोल’, ये बिरजू महाराज हैं… जिन्हें कई लोग सिर्फ कथक गुरु समझते हैं

RIP Birju Maharaj: ‘मैं जंगल की लाकड़ी, नहीं कोऊ है मोल, अधर लपट घनश्याम के, भई बहुत अनमोल’, ये बिरजू महाराज हैं… जिन्हें कई लोग सिर्फ कथक गुरु समझते हैं

कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज. (फोटो साभारः ट्विटरः@AdnanSamiLive)

कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज. (फोटो साभारः ट्विटरः@AdnanSamiLive)

RIP Pt. Birju Maharaj: पंडित बिरजू महाराज की गायकी सुननी हो, तो इंटरनेट है ही. थोड़ा खंगालने पर उनकी गाई हुई ‘भैरवी’ का एक वीडियो मिलता है. यही कोई 2 साल पुराना. उस वीडियो को देखने-सुनने के बाद अगर आंख नम न हुई तो बात ही क्या. ठुमरी, दादरा, भजन आदि भी खूब रस से गाया उन्होंने.

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RIP Birju Maharaj: पंडित बिरजू महाराज (Pt Birju Maharaj) को अगर किसी ने सिर्फ कथक गुरु (Kathak Guru) समझा है, तो थोड़ा ठहरिए. यकीन मानिए, आगे जैसे-जैसे पढ़ते और बढ़ते चलेंगे, ये समझ गलत साबित होने वाली है. क्योंकि वे निश्चित तौर पर सिर्फ़ कथक गुरु नहीं, बल्कि अपने आप में ‘पूर्णतम कलाकार’ हैं. कला के लगभग हर आयाम को उन्होंने अपनी 84 बरस की उम्र के दायरे में ही छूने की कोशिश की है. उदाहरण के लिए नृत्य के साथ जुड़ी अनिवार्य शर्त- गीत, संगीत, लय और ताल की मुकम्मल समझ. और पंडित बिरजू महाराज (Pt Birju Maharaj) ने छुटपन से ही इन चारों अंगों को आत्मसात् कर लिया.

पिता अच्छन (पंडित जगन्नाथ) महाराज तथा चाचा शंभू महाराज और लच्छन महाराज, सब कथक में पारंगत रहे. इसलिए घर में पहले से गाने-बजाने का माहौल मिला. सो, कोई अचरज नहीं कि कच्ची उम्र में ही ‘बिरजू’ (बृजमोहन नाथ मिश्र) की तबले और हारमोनियम से दोस्ती हो गई. यानी लय, ताल और संगीत दोनों से. उस दौर में फिल्मी गीतों से शुरुआत हुई. सबसे पहले मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलते-कूदते फिल्मी गीत गाए. लेकिन इतने सीधे और सधे लहजे में कि लोग खुश होकर इनाम दे दिया करते. फिर 7 साल या उससे कुछ अधिक की उम्र होगी, तब पिताजी से नृत्य की विधिवत् शिक्षा शुरू हुई. ऐसी जो उन्हीं के शब्दों में ‘उम्र की आखिरी सांस तक चलने वाली.’

इसका अगला आयाम गायकी और वादिकी. किसी नर्तक के लिए इन दो विधाओं में शीर्ष पारंगत होना अनिवार्य नहीं माना जाता, अमूमन. लेकिन बात बिरजू महाराज जैसी शख्सियतों की हो तो ये विधाएं उनके लिए और वे इन विधाओं के लिए अनिवार्य हो जाते हैं. सो, बिरजू महाराज भी न सिर्फ हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायकी बल्कि वादिकी में पारंगत हुए. तबला, पखावज, हारमोनियम, जैसे कई साज उन्होंने उतने ही सिद्धहस्त तरीके से बजाए, जितने कि मंझे कलाकार बजाते हैं.

और उनकी गायकी सुननी हो, तो इंटरनेट है ही. थोड़ा खंगालने पर उनकी गाई हुई ‘भैरवी’ का एक वीडियो मिलता है. यही कोई 2 साल पुराना. उस वीडियो को देखने-सुनने के बाद अगर आंख नम न हुई तो बात ही क्या. ठुमरी, दादरा, भजन आदि भी खूब रस से गाया उन्होंने. और नृत्य? वह तो जैसे सोते-जागते, खाते-पीते, चलते-फिरते, हर वक्त ही उनका चलता रहा. किसी को इंटरव्यू देते हुए हर भाव के साथ उनकी भंगिमाएं ऐसी होतीं, जैसे नृत्य चल रहा हो. गाते समय भी हर भाव के साथ भंगिमाएं बताते हुए नृत्य जारी. उठकर घुंघरू बांधने की जरूरत ही नहीं. कोई साज बजा रहे हैं, तब भी नृत्य जारी. कुछ लिख रहे हैं या चित्र बना रहे हैं, तो भी. जी, ‘महाराज जी’ (जानने वालों ने उन्हें यही नाम दिया है) की सिद्ध विधाओं में ये भी शामिल हैं.

‘साहित्यिकी और चित्रिकी’ का ताल-मेल

मतलब नृत्य, गीत, संगीत भले उन्हें पीढ़ियों से विरासत में मिला. लेकिन उसके बाद उनके हाथ में जो आया, वह उनका अर्जन रहा. मसलन- चित्रिकी या चित्रकारी. बचपन में कोयले से घरों और आस-पड़ोस की दीवारों पर चित्र बना देते थे. मार पड़ जाती थी. लेकिन इस डर से यह विधा छोड़ी नहीं. बल्कि कोयले की जगह फिर कूची थाम ली. फिर जैसे मंच पर पैरों को थिरकाते. वैसे ही घर आकर कैनवार (Canvas) पर कूची लहराते. कभी मन करता तो सुंदर कविताएं भी लिखते. मसलन एक बार वृंदावन गए तो कृष्ण की बांसुरी के लिए कुछ पंक्तियां लिख दीं..

‘मैं जंगल की लाकड़ी, नहीं कोऊ है मोल,
अधर लपट घनश्याम के, भई बहुत अनमोल.’

और दूसरी…

‘एक बार बंसी न बाजी घनस्याम सों,
गोपी मुसकात भईं निरखत हैं अचरज सों.
राधा खड़ीं कान्हा की प्रीत भरी स्वांस दई,
बंसी रिसियाई गई बोलत है स्याम सों.
बाजी न बंसी केहि कारन मन बेलि गयो,
कान्हा कर जोरे ठाणे पूछत हैं मुरली सों.
देखि बता कान्हा की बंसी ने मान सही,
बाजी रे बाजी, फिर बाजी, फिर स्याम सों.’

कृष्ण का कथक, कृष्ण का नृत्य और खुद बने दर्शक

महाराज जी के लिए नृत्य कोई करने की विधा नहीं, होने की विधा रही. पैरों में घुंघरू बांधने के बाद वे उससे ऐसे एकाकार हो जाते कि दोनों को एक-दूसरे से अलग करना मुश्किल होता. कथक को श्रीकृष्ण का नृत्य कहा जाता है. शायद इसीलिए नृत्य के लिए तैयार होते ही महाराज जी कहते, ‘प्रभु तुम नाचो, हम देखेंगे.’ और फिर मंच के सामने बैठकर देखने वाले बस, देखते रह जाते.

फाइल-कथा जैसे प्रयोग हमेशा, सीखने और सिखाने में भी

संपूर्ण रूप से किसी विधा को आत्मसात् जो कर ले, उसे भला किसी का क्या डर. क्या संकोच. इसीलिए पंडित बिरजू महाराज (Pt. Birju Maharaj) महज 13 साल की उम्र से ही नृत्य सिखाना शुरू कर देते हैं, बिना घबराए. संगीत नाटक अकादमी के कथक केंद्र में नृत्य गुरु के तौर पर सरकार को भी सेवा दी. उसी दौरान नृत्य में एक प्रयोग किया. शीर्षक दिया, ‘फाइल कथा’. मतलब सरकारी फाइलों की कथा. मंच पर घुंघरुओं से बताया कि सरकारी फाइलों का मसौदा कैसे तैयार होता है. तबले के बोल पर टाइपराइटर सुनाई दिया और दफ्तर में होने वाली हड़तालों के नारे भी. ऐसे ही सिखाते वक्त किसी शिष्य से कोई तिहाई या टुकड़ा नहीं बन रहा है. परेशान है तो उसे बताया, ‘सोचो, नाव चलाते वक्त खेवैया किस लय में शरीर हिला-डुला रहा होता है. फिर करो.’ और बस, चंद मिनटों में शिष्य की वह तिहाई तैयार.

फिल्मों में अमजद खान को भी नाचना सिखा दिया

बात 1977 की है. सत्यजीत रे (Satyajit Ray) ने एक फिल्म बनाई ‘शतरंज के खिलाड़ी.’ अक्सर खलनायक की भूमिका निभाने वाले अमजद खान इसमें अवध के नवाब वाजिद अली (Nawab Wazid Ali) बने. नवाब वाजिद अली (Nawab Wazid Ali) को ही यह श्रेय जाता है कि वे अपने दौर में पंडित बिरजू महाराज (Pt. Birju Maharaj) के पूर्वज दुर्गा प्रसाद ठाकुर को हंड़िया, इलाहाबाद (अब Prayagraj) से लखनऊ लाए. दरबार में नर्तक के तौर पर प्रश्रय दिया. लिहाजा, सत्यजीत रे ने फिल्म के नृत्य निर्देशन (Choreography) का जिम्मा पंडित बिरजू महाराज (Pt. Birju Maharaj) को सौंपना बेहतर समझा. महाराज जी ने भी निराश नहीं किया. फिल्म में अपनी शिष्या शाश्वती से तो नृत्य कराया ही, अमजद खान (Amjad Khan) को भी नाचना सिखा दिया क्योंकि नवाब वाजिद अली (Nawab Wazid Ali) नृत्य के भी शौकीन रहे हैं. यही नहीं, महाराज जी ने फिल्म में पहली बार नृत्य-निर्देशन (Choreography) के साथ अपनी गायकी का भी हुनर दिखाया.

हीरोइन पूरे कपड़े पहनेगी तो सिखाएंगे और माधुरी दीक्षित पसंदीदा हो गईं

कई फिल्म निर्देशकों ने पंडित बिरजू महाराज (Pt. Birju Maharaj) को अपनी फिल्मों के लिए साथ जोड़ने की कोशिश की. लेकिन महाराज जी ठहरे घरानेदार (कथक का कालका-बिंदादीन घराना). उनकी पहली शर्त होती, ‘हीरोइन पूरे कपड़े पहनेगी, आंखों से बात करेगी. अच्छा अभिनय करेगी. तो ही सिखाएंगे.’ और इन पैमानों पर आगे चलकर माधुरी दीक्षित (Madhuri Dixit) उनकी पसंदीदा अभिनेत्री हो गईं. क्योंकि वे कथक की बारीकियां भी जानती हैं. ‘बाजीराव मस्तानी’ (Bajirao Mastani) में जब दीपिका पादुकोण (Dipika Padukon) एक गीत के लिए उनसे नृत्य सीखने आईं तो उन्हें भी महाराज जी ने अपनी ऐसी ही शर्तों पर सिखाया.

खेल के लिए अंताक्षरी और आधुनिक गैजेट्स भी

पंडित बिरजू महाराज (Pt. Birju Maharaj) के खेल भी दिलचस्प रहे. बाजार में नए आने वाले मोबाइल, आईपैड जैसे तमाम गैजेट्स (Gadgets) से वे खिलौनों की तरह खेलते रहे. उन्हें इस्तेमाल करते हुए और उन्हें डी-कोड करते हुए भी. फिर वक्त मिलता तो अंताक्षरी उनका पसंदीदा खेल रहा. उसमें प्रयोग से नहीं चूकते. फिल्मी गीत की धुन पर अपनी लिखी हुए कविता को गाकर अक्सर साथ वालों का दिमाग चकरा देते. और सुना है, अभी-अभी फिर अंताक्षरी खेलते-खेलते ही सबका दिमाग चकराया छोड़कर चले गए हैं. जंगल की लाकड़ी, घनश्याम के अधरों से लगकर अनमोल हुई और उन्हीं में समा गई है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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