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ANALYSIS: चंद्रबाबू नायडू या चंद्रशेखर राव, 'गठबंधन' की रेस में कौन मारेगा बाज़ी?

एन चंद्रबाबू नायडू और के. चंद्रशेखर राव की फाइल फोटो

एन चंद्रबाबू नायडू और के. चंद्रशेखर राव की फाइल फोटो

तेलंगाना में प्रमुख दल के रूप में खुद को और अपनी पार्टी को स्थापित करने का फायदा हासिल कर चुके केसीआर के विपरीत, नायडू ...अधिक पढ़ें

    अनीता कात्याल

    लोकसभा चुनाव 2019 के लिए अभी आखिरी वोट पड़ना बाकी है, उससे पहले दो तेलगु प्रतिद्वंदी विपक्षी गठबंधन के जरिये किंगमेकर की भूमिका में आना चाहते हैं. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना के सीएम के. चंद्रशेखर राव ने कई महीने पहले ही इस पहल शुरू कर दी थी.

    तेलगु देशम पार्टी के मुखिया नायडू और तेलंगाना राष्ट्र समिति के मुखिया केसीआर ने यह भी कोशिश की है कि चुनाव के बाद दोनों विरोधी दल एक मंच पर आ जाएं. हाल ही में नायडू ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की. इसके साथ ही जब वह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में प्रचार करने गए थे तब उन्होंने पार्टी की मुखिया और राज्य की सीएम ममता बनर्जी से भी इस मुद्दे पर चर्चा की. इसके साथ ही वह अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों, डीएमके नेता एमके स्टालिन, बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के संपर्क में हैं.

    केसीआर की स्टालिन से मुलाकात

    दूसरी ओर केसीआर ने जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी से गठबंधन बनाया. इसके साथ ही उन्हें उम्मीद है कि ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के मुखिया नवीन पटनायक भी उनके साथ आ जाएंगे. हाल ही में वह स्टालिन से मुलाकात करने के लिए चेन्नई गए थे. उन्होंने केरल के सीएम पिनराई विजयन से मुलाकात की और ममता बनर्जी और मायावती से मिलने की योजना बना रहे हैं.


    यह बात दीगर है कि राव और नायडू दोनों की एक ही महत्वाकांक्षा है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका निभाएं. दोनों की समानता सिर्फ इस बात तक ही सीमित है.


    क्षेत्रीय दलों की एकजुटता चाहते हैं राव

    राव इस बात के समर्थन में हैं कि क्षेत्रीय दलों की एकजुटता से गैर बीजेपी-गैर कांग्रेस सरकार बने. वह क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश में हैं ताकि 23 मई को मतगणना के बाद वह ताकतवर बने रहें.

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    आंध्र प्रदेश की सीएम एन. चंद्रबाबू नायडू


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    तेलंगाना के सीएम अन्य नेताओं को इस बात के लिए मनाने की कोशिश कर रहे हैं कि देश साल 1996 सरीखी स्थिति की ओर आगे बढ़ रहा है जहां क्षेत्रीय दलों से मिलकर सरकार बनी और उनका अपना प्रधानमंत्री था. यहां तक कि कांग्रेस को भी इस सरकार को बाहर से समर्थन देना पड़ा.

    अविश्वसनीय होने का लगा है तमगा

    अब तक राव के प्रयासों को सिर्फ इतनी ही सफलता मिल सकी है कि वो स्टालिन से मिल सके हैं. साल 2018 के विधानसभा चुनाव में विपक्ष को लगभग खत्म करने देने के बाद राव आत्मविश्वास से लबरेज हैं. हालांकि उन पर अविश्वसनीय होने का तमगा भी लग गया है. राव अचानक एक फेडरल फ्रंट बनाने की बात करने लगे. इस पर राजनीतिक दलों को आशंका है. क्योंकि बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा न होते हुए भी उन्होंने संसद में मोदी सरकार का साथ दिया.

    स्टालिन से मुलाकात के बाद राव की इस छवि को तोड़ने की कोशिश की गई कि वह बीजेपी की टीम बी हैं. उन्होंने इस दौरान यह भी कहा, 'एक क्षेत्रीय दल का प्रधानमंत्री बनाने के लिए कांग्रेस भी इस फेडरल फ्रंट का समर्थन कर सकती है. उनका भी स्वागत है.'

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    राव ने अभी तक अपने विकल्प खुले रखे हैं. अगर कांग्रेस इस स्थिति में आती है कि वह सरकार बनाने के साथ ही एंटी बीजेपी गठबंधन का भरोसा बन सकती है तो वह उस पक्ष से बाहर रहने की कोशिश नहीं करेंगे जहां से उन्हें केंद्र में बुलावा आ सकता है.


    नायडू चाहते हैं बीजेपी विरोधी मोर्चा 

    केसीआर के विपरीत, नायडू बीजेपी विरोधी मोर्चे के साथ मिलकर काम करने के लिए जोर-शोर से काम कर रहे हैं क्योंकि आंध्र प्रदेश को विशेष श्रेणी का दर्जा देने की उनकी मांग को खारिज किए जाने के बाद वह केंद्र का विरोध करने के लिए NDA से बाहर आ गए. नायडू कांग्रेस को बाहर रखने के पक्ष में नहीं हैं और समय-समय पर यह कहते रहे हैं कि एक विपक्षी गठबंधन तब तक व्यवहार्य नहीं होगा जब तक कि उसमें कोई राष्ट्रीय पार्टी न हो.

    तेलंगाना में प्रमुख दल के रूप में खुद को और अपनी पार्टी को स्थापित करने का फायदा हासिल कर चुके केसीआर के विपरीत, नायडू की आंध्र प्रदेश में स्थिति डांवाडोल है क्योंकि उन्हें वाईएसआर कांग्रेस से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. नतीजतन, राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में होना उनके लिए अनिवार्य हो गया है ताकि नायडू राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहें.

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    स्टालिन और राव की मुलाकात की फाइल फोटो


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    1996 में संयुक्त मोर्चा गठन में नायडू की थी अहम भूमिका 

    लेकिन टीआरएस प्रमुख के विपरीत नायडू को यह फायदा हुआ कि में विपक्षी ताकतों के बीच एकता स्थापित करने में उनकी भूमिका रही है. साल 1996 में नायडू ने संयुक्त मोर्चा के गठन में दिवंगत सीपीएम महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत की मदद की थी और साल 2004 तक रही पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ काम किया था.

    वह स्पष्ट रूप से उम्मीद कर रहे है कि सीपीएम के दिग्गजों से सीखे गए सबक और वर्षों से पहली पंक्ति के विपक्षी नेताओं के साथ उन्होंने जो दोस्ती की है वह इस बार काम आएगी. अगर नायडू इन प्रयासों में सफल नहीं होते हैं और वाईएसआर कांग्रेस से हार जाते हैं तो उन्हें राजनीतिक रूप से हाशिए पर रहने का जोखिम उठाना होगा.

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    चुनाव परिणाम की घोषणा के लिए एक सप्ताह से भी कम समय बचा है. इन सबके बीच यह देखना है कि नायडू या केसीआर में से कौन किंगमेकर बनेगा. या फिर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उन्हें पराजित कर सकती हैं जो लोकसभा में जरूरी संख्याओं के पक्ष में होने पर एकजुट प्रदर्शन करने के उद्देश्य से विपक्षी नेताओं के पास पहुंच गई हैं.

    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह निजी विचार हैं.)
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    Tags: Andhra Pradesh, BJP, Congress, K Chandrashekhar Rao, Lok Sabha Election 2019, N Chandrababu Naidu, Narendra modi, Rahul gandhi, Telangana

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