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अयोध्या में राममंदिर की चर्चा थमी, BJP ने जातीय समीकरणों से निपटने को चला राष्ट्रवाद का दांव

Pranshu Mishra | News18Hindi
Updated: May 2, 2019, 1:22 PM IST
अयोध्या में राममंदिर की चर्चा थमी, BJP ने जातीय समीकरणों से निपटने को चला राष्ट्रवाद का दांव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या के बजाय अंबेडकरनगर में की चुनावी रैली.

चाहे-अनचाहे राम मंदिर भाजपा और आरएसएस के लिए चुनावी मुद्दा नहीं रह गया है. मंदिर आंदोलन के दिग्गज पर्दे के पीछे खड़े कर दिए गए हैं. अब मंच से राष्ट्रवाद का दांव चला जा रहा है.

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''ये रामलला का प्रस्तावित मंदिर है...जब काम शुरू होगा तो ऐसा ही मंदिर बनेगा.'' अयोध्या की तपती दोपहर में एक स्थानीय गाइड ने गुजरात से आए श्रद्धालुओं के एक ग्रुप को विश्व हिंदू परिषद (VHP) की मंदिर कार्यशाला में ले जाकर यही बताया. तापमान 40 डिग्री से ज्यादा है. चिलचिलाती धूप में गर्म हवाओं के थपेड़े परेशान कर रहे हैं. फिर भी देश भर से आने वाले श्रद्धालु कार्यशाला और मंदिर के प्रस्तावित मॉडल को देखने जरूर आते हैं.

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राम मंदिर निर्माण के लिए तत्काल अध्यादेश लाने की मांग करने वाले और करो या मरो की बात करने वाले लोगों ने आश्चर्यजनक तरीके से चुप्पी साध ली है. इस चुनाव में राम मंदिर और अयोध्या सियासी मुद्दे नहीं रह गए हैं. भाजपा और आरएसएस ने राष्ट्रवाद का रुख कर लिया है. अयोध्या फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र में आता है. हाल में यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया था. जिला बनने के बाद अयोध्या के भौगोलिक परिदृश्य में परिवर्तन आया है. हालांकि, अभी भी लोकसभा क्षेत्र फैजाबाद ही है. फैजाबाद में 6 मई को मतदान होना है.

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फैजाबाद संसदीय क्षेत्र में दरियाबाद, रुदौली, मिल्कीपुर, बीकापुर और अयोध्या पांच विधानसभा क्षेत्र हैं. फैजाबाद लोकसभ सीट कभी बीजेपी का गढ़ नहीं रही है. इस संसदीय क्षेत्र ने लोकसभा चुनावों में अलग-अलग पार्टियों के प्रत्याशियों को संसद पहुंचाया है. लोकसभा चुनाव 2014 में बीजेपी के लल्लू सिंह इस सीट से जीते थे, जबकि 2009 में यहां से कांग्रेस और 2004 में बसपा प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी. सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नतीजा 1991 में आया था. तब मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था. उस समय फैजाबाद सीट से भाकपा के मित्रसेन यादव जीते थे.

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1991 में भाकपा, 1999 में सपा और 2004 में बसपा के इस सीट पर जीत हासिल करने में एक बात समान थी. तीनों ही बार तीनों पार्टियों के प्रत्याशी मित्रसेन यादव ही थे. मित्रसेन की व्यक्तिगत छवि और जातीय समीकरणों के सामने बीजेपी की हिंदुत्व की सियासत की एक नहीं चली. इस बार मित्रसेन के बेटे आनंदसेन यादव इस सीट पर गठबंधन के प्रत्याशी हैं. वहीं, बीजेपी ने मौजूदा सांसद लल्लू सिंह पर ही भरोसा जताया है, जबकि कांग्रेस ने पूर्व सांसद निर्मल खत्री पर दांव खेला है.
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फैजाबाद संसदीय क्षेत्र में यादव मतदाताओं की संख्या करीब 13 फीसदी है, जबकि ओबीसी मतदाता करीब 26 फीसदी हैं. वहीं, क्षेत्र में मुस्लिम 15 फीसदी, दलित 4 फीसदी और अगड़े करीब 29 फीसदी हैं. बीजेपी की नजर अगड़े मतदाताओं पर है. साथ ही बीजेपी गैर-यादव ओबीसी और दलित मतदाताओं के बड़े हिस्से को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटी है. वहीं, कांग्रेस को भरोसा है कि प्रत्याशी की छवि और न्याय योजना के चलते जातीय समीकरण फेल हो जाएंगे.

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First published: May 2, 2019, 1:19 PM IST
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