अंतर्विरोधों से घिरे हैं बंगाल के नौजवान, संघ और TMC दोनों के लिए करते हैं काम

राज्य भर में ऐसे बहुत से बेरोज़गार नौजवान हैं जो टीएमसी के सदस्य हैं और उनका संबंध संघ परिवार से भी है.

News18.com
Updated: April 27, 2019, 5:32 PM IST
अंतर्विरोधों से घिरे हैं बंगाल के नौजवान, संघ और TMC दोनों के लिए करते हैं काम
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर
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Updated: April 27, 2019, 5:32 PM IST
(अनिरुद्ध घोषाल)

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिला के 25 साल के एक नौजवान के बजरंग दल और तृणमूल कांग्रेस (टीएससी) दोनों से रिश्ते हैं और उसका मानना है कि इसमें कोई विरोधाभास भी नहीं है. वो कहते हैं, 'एक राजनीतिक और दूसरा सांस्कृतिक संगठन है.' इस तरह का अंतर्विरोध यहां सामान्य बात है. पिछले एक महीने में न्यूज़18 ने पाया कि राज्य भर में ऐसे बहुत से बेरोज़गार नौजवान हैं जो टीएमसी के सदस्य हैं और उनका संबंध संघ परिवार से भी है. कमोबेश सभी की एक जैसी ही सोच है कि उनका राजनीतिक और सामाजिक जीवन उनके धर्म, संस्कृति और निजी ज़िंदगी से अलग है.

नाम न बताने की शर्त पर 25 वर्षीय इस नौजवान ने समझाया कि वह बीजेपी में तो नहीं जा रहे हैं, लेकिन ये सोच कई बार उनके ज़ेहन में आई है. बीटेक डिग्री होने के बावजूद बेरोज़गार इस नौजवान ने कहा कि 2011 से वह टीएमसी के लिए काम कर रहा है जबसे पार्टी सत्ता में आई. पंचायत और वामपंथी संगठन  फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्य के बेटे, इस युवक का कहना है कि उनका बजरंग दल के सदस्य के तौर पर जीवन बिल्कुल अलग है. वह राम नवमी जैसे धार्मिक त्योहारों में मदद करते हैं और मानते हैं कि विरोधाभास क्यों होना चाहिए?

इस बीच बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार बीजेपी और आरएसएस पर निशाना साधते हुए उन पर दंगा फैलाने का आरोप लगाती रही हैं. शुक्रवार को उन्होंने बीजेपी सांसद बाबुल सुप्रीयो पर हमला बोलते हुए कहा कि वो आरएसएस नेताओं से पैसे लेते हैं. ममता ने कहा, 'ना हिंदू ना ही मुस्लिम दंगे भड़काते हैं. केवल आरएसएस ये काम करती है.'

19वीं सदी के बंगाल में हिंदू राष्ट्रवाद के बीज बोए गए जो बाद में महाराष्ट्र में अंकुरित हुआ और फिर 1925 में आरएसएस का जन्म हुआ. दशकों तक हर रोज़ आरएसएस की सभाओं में स्वामी विवेकानंद और बंकिम चंद्र चटर्जी के उपदेशों को दोहराया जाता रहा. आरएसएस के संस्थापक केबी हेडगेवार और उनके उत्तराधिकारी एमएस गोवलकर का राजनीतिक कद बड़ा करने में बंगाल ने अहम भूमिका निभाई.

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लेकिन, 1999 में बीजेपी के ममता के साथ गठबंधन और इसके बाद लोकसभा चुनावों में बीजेपी की जीत के बाद आरएसएस लेफ्ट के गढ़ में अपने पैर पसारने लगी. एक वरिष्ठ बीजेपी नेता के मुताबिक पारंपरिक तौर पर आरएसएस के साथ सवर्ण हिंदू, पूर्वी बंगाल से आए हिंदू शरणार्थी, मारवाड़ी बिज़नेसमैन और हिंदी भाषी गैर-बंगाली शामिल हैं.
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2014 में नरेंद्र मोदी की जीत के साथ आरएसएस और उससे जुड़ी संस्थाओं की बंगाल में पैठ बढ़ी. पिछले साल तक दक्षिण बंगाल की 650 जगहों पर आरएसएस की 910 शाखाएं चल रही थीं. वहीं उत्तर बंगाल की 373 जगहों पर 452 शाखाएं चल रही हैं. कोलकाता से 25 किलोमीटर की दूरी पर हावड़ा में स्थित धुलागढ़ शहर में 2016 में दो दिनों तक दंगे चले जिसमें आगज़नी और लूटपाट हुई.

बंगाल के बीजेपी मुख्यालय में लोकसभा चुनावों की तैयारी में जुटे राज्य कमेटी के एक सदस्य का कहना था कि वो इस विरोधाभास से आश्चर्यचकित नहीं हैं. उनका कहना है कि बंगाल की राजनीतिक व्यवस्था देश के बाकी राज्यों से अलग है. उनके मुताबिक जिस राजनीतिक पार्टी का आप समर्थन करते हैं वह आपकी पहचान से इस तरह जुड़ा होता है जो बहुत विरोधाभासी है. आप उसका समर्थन तो करते हैं लेकिन ज़रूरी नहीं है कि हर बार आप उनकी नीतियों का समर्थन करें.

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जलपाईगुड़ी के 23 साल के एक युवक का भी यही कहना है. वह कहते हैं कि टीएमसी को समर्थन देने के पीछे स्वार्थ है. आप उनका समर्थन करते हैं. आपको काम मिलता है. इसके बदले में आप उनके लिए राजनीतिक काम कर देते हैं. उनके मुताबिक बीजेपी बंगाल में अब जाकर एक ताकत के रूप में उभरी है, लेकिन आरएसएस के साथ उनका संबंध बहुत पुराना है, स्कूल के दिनों से है.

हाल के सालों में दंगा झेल चुके बशीरहाट के 31 साल के युवक का कहना है स्थानीय टीएमसी का नेतृत्व लेफ्ट की तरह हो गया है. इकलौता कारण है कि ज्यादातर लोग दीदी के कारण इस पार्टी से जुड़े हैं. वह कहता है कि इससे क्या फर्क पड़ता है किहवो वीएचपी का सदस्य है. वह पूजा आयोजित करने में और ज़रूरत पड़ने पर मदद भी करते हैं.

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First published: April 27, 2019, 5:02 PM IST
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