लोकसभा चुनाव रिजल्टः एक-एक करके कैसे बिखरते गए राहुल के ‘गढ़’

Lok Sabha Election 2019: कांग्रेसियों के लिए जरूरी है. ऐसे में टिकट बंटवारा सबसे अहम है. लेकिन ऐसा लगा कि कांग्रेस के बजाय उन कांग्रेसियों की फिक्र ज्यादा है, जो टिकट बंटवारे या किसी फैसले से नाराज हो सकते थे.

News18Hindi
Updated: May 23, 2019, 8:52 PM IST
लोकसभा चुनाव रिजल्टः एक-एक करके कैसे बिखरते गए राहुल के ‘गढ़’
Lok Sabha Election 2019: कांग्रेसियों के लिए जरूरी है. ऐसे में टिकट बंटवारा सबसे अहम है. लेकिन ऐसा लगा कि कांग्रेस के बजाय उन कांग्रेसियों की फिक्र ज्यादा है, जो टिकट बंटवारे या किसी फैसले से नाराज हो सकते थे.
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Updated: May 23, 2019, 8:52 PM IST
राहुल गांधी ने एक और ‘उपलब्धि’ अपने नाम कर ली है. ऐसी उपलब्धि, जिसके साथ वो अपना नाम जुड़ते देखना कतई नहीं चाहते होंगे. लेकिन अगर नाम जुड़ा है, तो उसमें वजह और कोई नहीं, खुद राहुल ही हैं. पिछली बार उनके साथ कांग्रेस 44 सीटों पर सिमटी थी, जो पार्टी के लिए इतिहास में सबसे कम सीट थीं. इस बार भी कोई सुधार नहीं है. यहां तक कि वो उस अमेठी सीट से हारते दिख रहे हैं, जो गांधी परिवार का गढ़ कहा जाता है.

यहां से संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और पिछले तीन बार से खुद राहुल गांधी जीत रहे थे. ऐसी सीट से राहुल का हारना क्या, उसके करीब भी पहुंचना धब्बे जैसा है. वही धब्बा उनके नाम के साथ जुड़ा है. इस धब्बे को उनका मजाक उड़ाने वाले ‘उपलब्धि’ ही बताएंगे. अमेठी में हालात यह रहे कि राहुल गांधी के सामने खड़ीं स्मृति ईरानी उन्हें लगातार टक्कर देती रहीं और देर शाम तक ईरानी  45327 वोटों से आगे चल रही थीं. तब तक राहुल को 348743 वोट मिले, वहीं स्मृति ईरानी को 394070 वोट मिले. वहीं दूसरी तरफ केरल के वायनाड की बात की जाए तो यहां पर राहुल का जादू चल गया और वे सीपीआई के पी पी सुन्नीर को 431770 वोटों से आगे थे. राहुल को शाम तक कुल 706367 वोट मिले थे, वहीं सुन्नीर को 274597 वोटों पर संतुष्ट होना पड़ा था.



इसलिए दो सीटों से लड़े
सिर्फ एक बार, 1977 में गांधी परिवार का कोई शख्स यहां से हारा था. तब संजय गांधी को मात मिली थी. लेकिन उस दौर के हालात बहुत अलग थे. इमर्जेंसी के ठीक बाद चुनाव हुए थे. इंदिरा गांधी और संजय गांधी को लेकर लोगों में बहुत गुस्सा था. इस इलाके के लिए संजय नए भी थे. 2019 में ऐसी कोई इमर्जेंसी नहीं थी. इसके बावजूद राहुल मुश्किलों में फंसे. शायद इसीलिए उन्होंने पहले ही यह फैसला कर लिया था कि वो दो सीट से लड़ेंगे. लेकिन ऐसे हालात आए, उसके लिए खुद राहुल ही जिम्मेदार हैं.

राहुल अब भी यह समझ नहीं पाए हैं कि बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ना कोई आम बात नहीं है. उनकी विपक्षी पार्टी ऐसी नहीं है, जिसके खिलाफ वो सामान्य तरीके से चुनाव लड़ सकें. यहां जुनून चाहिए, रणनीति चाहिए, किसी भी हद तक जाने की कूवत चाहिए. खुद को झोंक देना और सही समय पर सही फैसला करना जरूरी है. यह भी देखना जरूरी है कि सही फैसला लिया ही न जाए, उसे अंजाम तक पहुंचाया जाए. इसके बगैर आप मोदी-शाह की जोड़ी से कैसे मुकाबला कर सकते हैं.



कैसे बिखरा गांधी परिवार का गढ़
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पहले अमेठी की बात. राहुल दिल्ली में रहे और स्मृति ईरानी बार-बार लगातार अमेठी जाकर उनके गढ़ में सेंध लगाती रहीं. सेंध लगती रही और न तो खुद राहुल को समझ आया और न ही पार्टी ने उन्हें समझाने की कोशिश की. जब समझ आया, तब चुनाव आ गए थे. इसीलिए वायनाड जाने का फैसला किया गया. फैसला कांग्रेस की हार का प्रतीक बना.

अब जरा सीटों के बारे में देखें. इससे बीजेपी और कांग्रेस के बीच का फर्क समझ आ जाएगा. बीजेपी ने तय किया की 75 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को टिकट नहीं देंगे. ऐसे में सुमित्रा महाजन जैसी प्रत्याशी का भी टिकट कटा. उन्हें मनाया गया. लेकिन टिकट नहीं दिया गया. इसी तरह पिछली बार भी मुरली मनोहर जोशी को वाराणसी से कानपुर भेज दिया गया था. यह जानते हुए भी कि वो वरिष्ठ नेता हैं, नाराज हो सकते हैं.

राहुल गांधी या कांग्रेस जिन हालात में है, उनमें उसकी चिंता करना कांग्रेसियों के लिए जरूरी है. ऐसे में टिकट बंटवारा सबसे अहम है. लेकिन ऐसा लगा कि कांग्रेस के बजाय उन कांग्रेसियों की फिक्र ज्यादा है, जो टिकट बंटवारे या किसी फैसले से नाराज हो सकते थे. ऐसा न होता, तो राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट, दो शक्ति के केंद्र न होते.

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जमीन बनाने में नाकामी
विधानसभा चुनाव जीतने के बाद राजस्थान में अपनी जमीन मजबूत करने से बेहतर मौका नहीं मिल सकता था. लेकिन उस ओर काम करने के बजाय राहुल ने गहलोत और पायलट को साधने की कोशिश की और नतीजा सिफर है. एक समय राजस्थान में बीजेपी के लोग भी मान रहे थ कि कांग्रेस को 12-13 सीट मिल सकती है. हाथ कुछ नहीं आया. न गहलोत के, न पायलट के और न ही राहुल गांधी के. अपने बेटे को जिताने में भी गहलोत नाकाम रहे.



इसी तरह, मध्य प्रदेश है. यहां सत्ता का त्रिकोण है. कमलनाथ, राहुल के प्रिय मित्र ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह. यहां भी विधानसभा चुनाव जीता था. उसके बावजूद आज मध्य प्रदेश में कांग्रेस जीरो नहीं, तो उसके आसपास जरूर है. कांग्रेस के लिए आधे यूपी की जिम्मेदारी संभाल रहे ज्योतिरादित्य खुद ही नहीं संभल पाए. न दिग्विजय संभल पाए. कमलनाथ जरूर अपने बेटे को जिताने में कामयाब रहे. छत्तीसगढ़ का हाल भी यही रहा. जब अपनी सरकार के साथ आप हालात नहीं सुधार सकते, तो फिर ऐसी जगह क्या कर पाएंगे, जहां बीजेपी सरकार है.

गठबंधन करने की कला बीजेपी से सीखें राहुल
राहुल ने गठबंधन को लेकर भी जिस तरह का रुख दिखाया, वो बीजेपी के सामने भारी नुकसान करने वाला ही साबित हुआ. बीजेपी एडवांटेज की स्थिति में थी. उसके बावजूद उन्होंने बिहार में कम सीटों पर खड़े होने का फैसला करते हुए गठबंधन किया. राजस्थान में हनुमान बेनीवाल के साथ समझौता किया. जिन पार्टियों की ताकत बमुश्किल 1-2 सीट जीतने की थी, उन्हें भी नहीं जाने दिया. दूसरी तरफ, राहुल गांधी या कांग्रेस के लिए समझौते की ज्यादातर कोशिशें नाकाम ही होती गईं.

इस चुनाव ने एक और बात साबित की है कि परिवारवाद लोगों को अभी पसंद नहीं आ रहा है. यह बात कई उम्मीदवारों के कम होते जीत प्रतिशत ने साबित की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘नामदार बनाम कामदार’ का फॉर्मूला लोगों के जेहन में डालने में कामयाब हुए. इस चुनाव में नाम या परिवार के सहारे जीतने की कोशिश में तमाम लोग नाकाम रहे.
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