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2019 का रण: छोटी पार्टियों से साथ मिल रहा पर सीटें नहीं, कांग्रेस कैसे कर पाएगी BJP का सामना?

2019 का रण: छोटी पार्टियों से साथ मिल रहा पर सीटें नहीं, कांग्रेस कैसे कर पाएगी BJP का सामना?

राहुल गांधी. (फाइल फोटो)

राहुल गांधी. (फाइल फोटो)

एनडीए ने अपने साथियों के साथ तालमेल पूरा कर लिया है. शिवसेना, जेडीयू और AIADMK जैसे बड़े सहयोगियों से पार्टी ने सीटों का मोलभाव भी पूरा कर औपचारिक ऐलान भी कर दिया है.

2019 के आम चुनावों की तारीखों की घोषणा के लिए उल्टी गिनती शुरू हो गई है. सूत्रों की मानें तो चुनाव आयोग मार्च के पहले सप्ताह में चुनाव की तारीखों का ऐलान कर देगा. ऐसे में गठबंधन, चुनावी समझौते और टिकट वितरण का काम भी अंतिम दौर में है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए ने अपने साथियों के साथ तालमेल पूरा कर लिया है. शिवसेना, जेडीयू और एआईएडीएमके जैसे बड़े सहयोगियों से पार्टी ने सीटों का मोलभाव भी पूरा कर औपचारिक ऐलान भी कर दिया है. लेकिन कांग्रेस अभी तक अपने गठबंधन का स्वरूप तय नहीं कर पाई है.

कैसा है यूपीए कुनबा?
वर्तमान में यूपीए में करीब 22 राजनीतिक दल हैं. अगर राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को जोड़ दे, तो ये संख्या 24 हो जाती है. इन 24 के आंकड़े में अजीत सिंह का राष्ट्रीय लोक दल शामिल है. हालांकि, अभी वह कहां जाएगा तय नहीं है?

यूपीए में भले ही दलों की संख्या 22 हो, लेकिन महाराष्ट्र में एनसीपी, स्वाभिमान पक्ष, बिहार में आरजेडी, उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी, जीतन राम मांझी की हम, तमिलनाडु में डीएमके, झारखंड में जेएमएम, केरल में मुस्लिम लीग और आरपीआई ही है, जिनके पास अपना वोट बैंक है और जिनके साथ वह लोकसभा सीटें शेयर करना चाहेगी.


उत्तर प्रदेश में जिस तरह सपा-बसपा ने कांग्रेस से बात किए बिना आपसी समझौते की घोषणा कर दी है उसके बाद वहां कांग्रेस की नज़र स्थानीय छोटे दलों पर है. पश्चिम बंगाल में भी ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ समझौता करती नजर नहीं आ रही है.

2014 यूपीए का सबसे खराब दौर
बात करें पिछले लोकसभा चुनाव की तो यूपीए में कांग्रेस के साथ 12 और पार्टियां थी. केरल में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस, सोशलिस्‍ट जनता और आरएसपी यानी कुल 4 दलों के साथ गठबंधन किया था. एनसीपी के साथ कांग्रेस का गठबंधन महाराष्ट्र के अलावा गुजरात और गोवा में भी था. बिहार और झारखंड में कांग्रेस और आरजेडी साथ लड़े थे. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने अजीत सिंह वाले राष्ट्रीय लोकदल के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन ये गठबंधन लोकसभा में 100 सीटों का आंकड़ा भी नहीं छू पाया.

यूपीए पर कमजोर होती कांग्रेस की पकड़
2014 से 2019 आते-आते यूपीए में कांग्रेस के साथी भले ही बढ़े हो, लेकिन गठबंधन पर कांग्रेस का नियंत्रण कमजोर होता जा रहा है. दरअसल, कांग्रेस के 2014 के प्रदर्शन के बाद सहयोगी दल कई बार उसे आंख दिखाते नजर आते हैं. प्रधानमंत्री मोदी को सत्ता से हटाने के लिए कांग्रेस को बड़ी कुर्बानी और बड़ा दिल रखने की सलाह देने के बहाने हर सहयोगी कांग्रेस को कम से कम सीटें देना चाहता है.

उत्तर प्रदेश में तो उसके सहयोगी कही जाने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस को सिर्फ दो सीटों के काबिल समझा. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ रहे अजीत सिंह इस बार माया और अखिलेश के साथ खड़े दिख रहे हैं. हालांकि, कांग्रेस यूपी में इस फॉर्मूले को मानने को तैयार नहीं है. बिहार में राजद, झारखंड में झामुमो और महाराष्ट्र में एनसीपी कांग्रेस को कम से कम सीटें देना चाहते हैं.


प्रियंका के आने से कितनी बदलेगी तस्वीर
प्रियंका गांधी वाड्रा के कांग्रेस महासचिव के रुप में आने के बाद सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस बैकफुट से फ्रंटफुट पर आने का दावा कर रही है. लेकिन विपक्ष के साथ-साथ कांग्रेस के सहयोगी होने का दावा करने वाले दल भी इससे सहमत नहीं है. उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा जोरों पर है कि सपा-बसपा गठबंधन कांग्रेस को कुछ ज्यादा सीटें दे सकता है.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रियंका के आने से कांग्रेस उत्तर प्रदेश और बिहार के यूपी से सटे इलाकों में वोट शेयर तो बढ़ेगा, लेकिन ये सीटों में कितना बदल पाएगा इसका अंदाजा लगाना अभी मुश्किल है.

एक बात तो तय है कि 2019 का आम चुनाव कांग्रेस के लिए करो या मरो वाला है. मोदी विरोध के नाम पर पूरा विपक्ष कांग्रेस के साथ खड़ा होना तो चाहता है. लेकिन जब बात सीटों की आती है, तो क्षेत्रीय दल कांग्रेस के लिए सीट छोड़ने को तैयार नहीं है. ऐसे कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वह किस तरह यूपीए का कुनबा बढ़ाने के साथ-साथ अपनी स्थिति सीटों के लिहाज से भी मजबूत करे.

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Tags: BJP, Congress, Lok Sabha Election 2019, NDA, UPA

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