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मिशन 2019: चुनावी मैदान में महागठबंधन के यॉर्कर से कैसे निपटेगी BJP!

मिशन 2019: चुनावी मैदान में महागठबंधन के यॉर्कर से कैसे निपटेगी BJP!

 एक के बाद एक हारते उपचुनाव बीजेपी के गढ़ में सेंध लगने का संकेत दे रहे हैं. एनडीए के समर्थक दल अब आलोचक बन चुके हैं.

एक के बाद एक हारते उपचुनाव बीजेपी के गढ़ में सेंध लगने का संकेत दे रहे हैं. एनडीए के समर्थक दल अब आलोचक बन चुके हैं.

एक के बाद एक हारते उपचुनाव बीजेपी के गढ़ में सेंध लगने का संकेत दे रहे हैं. एनडीए के समर्थक दल अब आलोचक बन चुके हैं.

    चार लोकसभा समेत 10 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव और कर्नाटक की एक विधानसभा सीट पर हुए चुनाव के नतीजे सबके सामने हैं. क्रिकेट की भाषा में कहें तो स्लॉग ओवर्स शुरू हो चुके हैं. बीजेपी बैकफुट पर है. 2019 लोकसभा चुनाव से पहले मोमेन्टम विपक्ष के साथ जाता दिख रहा है. विपक्ष के यॉर्कर्स का सत्ता पक्ष के पास कोई जवाब दिखाई नहीं दे रहा. एक के बाद एक हारते उपचुनाव बीजेपी के गढ़ में सेंध लगने का संकेत दे रहे हैं. एनडीए के समर्थक दल अब आलोचक बन चुके हैं.

    बीजेपी सरकार के चार साल का जश्न शुरू करती, उससे पहले ही इन उपचुनावों ने महौल फीका कर दिया है. ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि आखिर बीजेपी विपक्ष के बाउंसर्स का कैसे सामना करेगी. क्या विपक्ष महागठबंधन की एकता सही लाइन लेंथ पर बनाए रख पाएगा. कैराना से लेकर भंडारा-गोंदिया तक और पालघर से लेकर जोकीहाट तक बीजेपी और विपक्ष के लिए इन चुनाव के परिणाम की सबक दे रहे हैं.

    कैसे छिनी बीजेपी की जीती हुई सीट?
    सबसे पहले बात करते हैं यूपी की, जो सबसे बड़ा रणक्षेत्र है. 'मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम...!' 1993 में कांशीराम-मुलायम सिंह की दोस्ती के बाद यह नारा लगा था. नजीता यह हुआ था कि दलित और पिछड़ी जातियों की गोलबंदी से सपा-बसपा गठबंधन की सरकार बनी. यही फॉर्मूला गोरखपुर, फूलपुर में अपनाया गया और इसी का इस्तेमाल कैराना भी किया गया. सपा, आरएलडी और कांग्रेस को बसपा का मौन समर्थन मिला. नतीजा जीत में बदला. गठबंधन ने बीजेपी से उसकी महत्वपूर्ण सीट छीन ली.



    जाट-मुस्लिम आए एक साथ
    मुजफ्फरनगर दंगे के बाद पश्चिमी यूपी में जाट-मुस्लिम वोटरों की गोलबंदी खत्म हो चुकी थी. दोनों के अलग होने का भरपूर सियासी लाभ बीजेपी ने 2014 और 2017 में उठाया. ऐसे में इस बार ये भी कसौटी थी कि पश्चिमी यूपी में जाट और मुस्लिम एक साथ आएंगे या नहीं. वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री के मुताबिक पश्चिमी यूपी में जाट-मुसलमान वोटर एक साथ आ रहे हैं.

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    अग्निहोत्री कहते हैं "इस चुनाव में भौगोलिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है. गोरखपुर ठेठ पूरब, फूलपुर मध्य और कैराना ठेठ पश्चिम है. तीनों ने बीजेपी को एक सा परिणाम दिया है. यानी ये किसी एक भौगोलिक क्षेत्र का मामला नहीं है. दो अलग-अलग छोर और मध्य ने ये बताया कि एंटी बीजेपी लहर गति पकड़ रही है. केवल पूरब या केवल पश्चिम में हारते तो उसकी व्याख्या अलग हो सकती थी. लेकिन, अब तो आपका इम्तिहान पूरे यूपी में हो चुका है. इसलिए ये परिणाम बीजेपी के लिए चिंता का विषय होने चाहिए."


    पालघर का अलग है समीकरण
    रही बात महाराष्ट्र की तो लोकसभा में 48 सांसदों को भेजने वाले इस राज्य में मुख्य लड़ाई बीजेपी, शिवसेना, कांग्रेस, एनसीपी के बीच है. शिवसेना बीजेपी की सबसे पुराने सहयोगियों में से एक है. लेकिन, इस बार उसने अलग होकर पालघर सीट पर चुनाव लड़ा. उसे सीट गंवानी पड़ी. दरअसल, दोनों का कोर वोटर कट्टर हिंदू माना जाता है. ऐसे में माना जाता है कि बीजेपी महाराष्ट्र में शिवसेना का वोटबैंक अपनी तरफ शिफ्ट कर रही है. इसका नुकसान शिवसेना को हो रहा है.

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    शिवसेना लगातार बीजेपी पर मुखर है. उसने 2019 का चुनाव बीजेपी से अलग लड़ने का ऐलान किया हुआ है. चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि अगर वो कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ती है, तो कट्टर हिंदू वोट बीजेपी के साथ चला जाएगा और इसका शिवसेना को बड़ा नुकसान होगा.

    हार से उद्धव ठाकरे का इनकार
    पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे का कहना है "सभी पार्टियों को मिलकर इलेक्शन कमीशन पर केस करना चाहिए, ताकि चुनाव सिस्टम बदले. इलेक्शन कमीशन भ्रष्ट है. पालघर चुनाव में चुनाव अधिकारी कौन थे इस पर भी शक है. चुनाव अधिकारी अगर सरकार के मेहमान बनेगे तो ऐसे लोकतंत्र पर कैसे भरोसा करें. मैं हार मानने को तैयार नहीं. मैं यह कहूंगा बस यह हार जाहिर हुई है. यह हार हमारी हार नहीं है, हमने वहां की जनता की भावना देखी है वो भावना बीजेपी के खिलाफ है." उद्धव ठाकरे कुछ भी कहें लेकिन ये तो तय है कि बीजेपी ने पालघर में शिवसेना को हराया है.



    बीजेपी के दूसरे महत्वपूर्ण साथी शिरोमणि अकाली दल ने हरियाणा के विधानसभा चुनाव में सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का ऐलान किया है. बिहार में उसकी गठबंधन सहयोगी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के आरजेडी के साथ जाने की चर्चा जारी है. नीतीश कुमार फिर बीजेपी के खिलाफ बयान देने लगे हैं. टीडीपी उससे अलग हो चुकी है.

    नीतीश के फैसले पर जनता ने नहीं मारी मुहर
    बिहार की करें तो वहां नीतीश कुमार और बीजेपी की सरकार है. नीतीश के पाला बदलने के बाद दो उप चुनाव हारना और लालू प्रसाद की पार्टी का बड़े मार्जिन से जीतना नीतीश के लिए खतरे की घंटी है. ये परिणाम बता रहे हैं कि नीतीश के फैसले पर जनता की मुहर नहीं लगी.

    रही बात झारखंड की तो वहां रघुवर दास सबसे ज्यादा प्रचार करने वाले सीएम हैं. वहां दो सीटों पर इलेक्शन हुआ और शिबू सोरेन की पार्टी जीत गई. ये भी बीजेपी के लिए कम चिंता का विषय नहीं है.


    हालांकि, विपक्ष एक मंच पर आकर बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोलेगा यह अब भी बड़ा सवाल है. सपा प्रवक्ता घनश्याम तिवारी ने 'न्यूज18 हिंदी' के इनपुट एडिटर अफसर अहमद और डीएनई रवि दुबे के साथ फेसबुक लाइव में कहा "विपक्ष का नेता जनादेश तय करेगा. अगर विपक्ष अलग-थलग रहेगा तो बीजेपी उसका लाभ उठाएगी. इसलिए हम 2019 में यह प्रयास करेंगे कि मजबूत विपक्ष और जनता के लिए एक मजबूत विकल्प तैयार हो."

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    ...तो क्या महागठबंधन एक हकीकत बनने वाला है? कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण में मौजूद विपक्षी नेताओं की भीड़ के क्या मायने हैं? आखिर मोदी बनाम कौन होगा? यह विपक्ष तय नहीं कर पाया है. तिवारी ने कहा, 'मोदी बनाम जनता होगा. हम तो जनता की आवाज को सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिनिधत्व दे रहे हैं. हम जनता के गुस्से को आवाज देंगे.'

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