ओम बिड़ला के सामने सोमनाथ चटर्जी जैसी छवि बनाने की चुनौती

सत्ता पक्ष के पास विशाल बहुमत होने के कारण सदन में संतुलन की जिम्मेदारी भी ओम बिरला के कंधों पर ही रहेगी

Raj Shekhar | News18Hindi
Updated: June 19, 2019, 1:09 PM IST
ओम बिड़ला के सामने सोमनाथ चटर्जी जैसी छवि बनाने की चुनौती
ओम बिड़ला के सामने सोमनाथ चटर्जी जैसी छवि बनाने की चुनौती
Raj Shekhar
Raj Shekhar | News18Hindi
Updated: June 19, 2019, 1:09 PM IST
ओम बिड़ला नए लोकसभा अध्यक्ष बन गए हैं. विपक्षी दल कांग्रेस ने भी उनका समर्थन कर दिया है. ओम बिड़ला एक ऐसा नाम हैं, जिसे राजस्थान से बाहर कम ही सुना गया था. आम तौर पर लोकसभा अध्यक्षों के चुनाव में एक सिम्बॉलिसिटी यानी प्रतीकात्मकता होती रही है. मसलन मीरा कुमार का चयन एक दलित और महिला चेहरे को आगे बढ़ाना था, तो पी ए संगमा का चयन नार्थ ईस्ट को मुख्य धारा में दिखाने की कोशिश थी. हालांकि इस प्रतीकात्मकता के बावजूद दोनों की भूमिका कहीं से कमज़ोर और अपनी पार्टी के पक्षधर की नहीं थी.

ओम बिड़ला के चयन में जो प्रतीकात्मकता है वो थोड़ा देर से दिखेगी. वो लो प्रोफाइल नेता रहे हैं. संसद में उनकी भी दूसरी ही पारी है. आप कह सकते हैं कि सबसे बड़ी प्रतीकात्मकता तो वो ‘सरप्राइज़ एलीमेंट’है जो मोदी जी हमेशा देते हैं. लेकिन बीते दो दशकों में बतौर स्पीकर जो किरदार सबसे अधिक याद आता है, वो हैं सोमनाथ चटर्जी. बंगाल के बोलपुर से सीपीएम के धाकड़ सांसद सोमनाथ चटर्जी को कांग्रेस ने यूपीए की पहली पारी में इसलिए स्पीकर बनाया क्योंकि वो बाहर से समर्थन दे रहे लेफ़्ट को कुछ देते हुए दिखना चाहती थी. लेकिन ये चुनाव इतना बेहतरीन था कि इस पर कोई चाहकर भी उंगली नहीं उठा सका. दादा के पास योग्यता भी थी और सर्वदलीय स्वीकार्यता भी. दादा लेफ़्ट के थे लेकिन बीजेपी के दुश्मन नहीं थे. अटल-आडवाणी की जोड़ी से भी उनकी उतनी ही जमती थी, जितनी लालू-मुलायम से. दादा की गहरी आवाज़ वाली हंसी ने सदन को हमेशा तनाव से सहज किया.

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सच कहें तो सोमनाथ चटर्जी उस खिलंदड़े लोकतंत्र के पहरूआ थे जिसमें विरोध के साथ-साथ ये सतर्कता भी शामिल थी कि सरकार को बेवजह असहज स्थिति में न डाल दिया जाए. सदन में पूरी गंभीरता के साथ भी एक चपलता कायम रहे. सांसद एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं, विरोध मुद्दों का है और वही रहना भी चाहिए. इस अर्थ में ए बी वर्धन उनके मुकाबले ज़्यादा सख़्त दिखते हैं जब वो अरुण शौरी के विनिवेश मंत्रालय को बंद करने की वकालत करते हुए ‘भाड़ में जाएं’जैसी भाषा इस्तेमाल कर जाते हैं. ये साल 2004 था.  2004 के साल में ही सोमनाथ दा को यूपीए ने स्पीकर बनाया. हम जैसे हालिया दिल्ली आए और डरते-डराते, सीखते-समझते पत्रकारों के लिए संसद का गलियारा ही चौंकाने वाला था. आज भी याद आती है आरपीआई के रामदास आठवले की वो टिप्पणी, जिसमें उन्होंने कहा था कि  “दादा आप तो अब उस कुर्सी पर बैठ गए. अब देखना है कैसे आप सदन को नियंत्रित करते हैं. अब तक तो आप हम लोगों को वेल में जाने के लिए उकसाते रहे.”  इस बात पर सोमनाथ दा के चेहरे की वो शर्माती हुई मासूम हंसी और उस हंसी की गहरी ध्वनि आज भी भूलती नहीं है. लेकिन सोमनाथ दा इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हैं. ये तो उनके भीतर का शानदार इन्सान था जो सियासत के दांव पेच के बीच भी बचा था, ज़िन्दा था.

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जितना डर बंगाल के प्रणब मुखर्जी से लगता था उतना ही सोमनाथ दा के आगे सहज महसूस होता था. मुझे याद नहीं कि प्रणब दा से कब मिले और उन्होंने डांट कर अपनी बांग्ला एक्सेंट वाली अंग्रेज़ी में ये न कहा हो
“इभेन दैट टाइम यू भेयर नॉट बॉर्न....ट्राई टू अंडरस्टैंड द मैटर” एक बाइट के लिए उनके तालकटोरा रोड वाले बंगले पर गया था. उनकी फ़टकार शायद और जारी रहती. मेरी किस्मत अच्छी थी कि तभी सलमान ख़ुर्शीद मलेशियाई शर्ट पहने पीछे अवतरित हो गए, और प्रणब दा का मूड उन्हें देख कर बदल गया.
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“कम कम सलमान...कम इन” लेकिन सोमनाथ दा इस मायने में ग़ज़ब थे. वो हो हो कर हंसते हुए आपके कंधे पर हाथ रख कर पूछ सकते थे,की...की...की होलो...बात क्या हाय.  अब दो सबसे अहम बातें जो लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को इतिहास में ले जाएंगी. पहली स्पीकर पद की निरपेक्ष गरिमा को अंत तक बनाए रखना.

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प्रकाश करात ने अपनी किताबी ज़िद में और अमेरिका विरोध के नाम पर यूपीए से समर्थन वापस ले लिया था. वो चाहते थे सोमनाथ दा स्पीकर की कुर्सी छोड़ दें और उनके साथ खड़े दिखें. सोमनाथ दा ने वक्त की नज़ाकत को समझा और अपनी दल निरपेक्षता पर अड़े रह कर ईमानदार स्पीकर बने रहे. इसका ख़मियाज़ा उन्होंने ही नहीं फिर सीपीएम ने भी भुगता और बंगाल बनाम केरल का द्वंद सतह पर आ गया. बंगाल में ज्योति बाबू के बाद वो अनिल बिस्वास और विमान बोस की कतार में खड़े होते थे. बंगाल में तो पार्टी ने प्रकाश के विरोध के बाद भी उन्हें अपने मंचों पर बुलाना जारी रखा लेकिन सबसे अहम बात जिसका ज़िक्र किए बग़ैर सोमनाथ दा को याद करना भी क्या याद करना! संसद की गरिमा को हर चीज़ से ऊपर रखना.

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दादा ने इस मामले में सीधे सुप्रीम कोर्ट से टक्कर ली. सांसदों के बारे में, सदन में जो कुछ भी हुआ उसके बारे में अदालत फैसला नहीं ले सकती. ये दादा की ज़िद थी और इस पर वो अड़े रहे. संसदीय प्रणाली की एक गरिमा है और संसद को कोई डिक्टेट नहीं कर सकता ये सोमनाथ दा का नज़रिया था और अंत तक रहा.  उनकी आख़िरी तस्वीर मुझे न वुडलैंड अस्पताल वाली याद आती है न उनकी जीवनी के कवर पेज पर छपी वाली, आती है तो वो जब हरकिशन सिंह सुरजीत के शव की प्रतीक्षा करते पोलित ब्यूरो के लोग अस्पताल की मोर्चरी के बाहर बैठे हैं. प्रकाश करात भी हैं, बृंदा भी और सीताराम येचुरी भी. सोमनाथ दा किसी से कुछ बोल नहीं रहे थे, दरअसल कोई सोमनाथ दा से भी बोल नहीं रहा था. सोमनाथ दा अपनी नैतिक प्रतिबद्धता के साथ वहां मौजूद थे. आधी बांह की कमीज़ में अपनी बांहों पर हाथ फेरे जा रहे थे जैसे हाथ से कुछ फिसल गया हो. ख़ैर बात ओम बिड़ला से निकली थी, उम्मीद है वो भी सियासत और इंसानियत की ऐसी ही बड़ी मिसाल पेश करेंगे.

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First published: June 19, 2019, 10:33 AM IST
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