Decoding Long Covid: कोरोना से ठीक होने के बाद मसूड़ों और नाक से खून बहे तो न करें अनदेखा

पोस्ट कोविड मरीजों में खून से जुड़े कई मामले पाए जा रहे हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

Decoding Long Covid-19: डॉक्टर दिव्या बंसल ने कहा कि पोस्ट कोविड होने वाली इन दिक्कतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

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    नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Coronavirus In India) की संक्रमण की दूसरी लहर बहुत ही घातक थी. एक ओर जहां लाखों लोगों की जान गई तो वहीं दूसरी ओर कई लोग जो संक्रमण से तो बच गए लेकिन अब पोस्ट कोविड समस्याओं (Long Covid) का सामना कर रहे हैं. इन सबके एक बीच नई दिक्कत सामने आई है जिसमें मसूड़ों और नाक से खून आने की शिकायत होती है. इस बाबत News18.com ने डॉक्टर दिव्या बंसल से बात की. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित मनिपाल अस्पताल में हेमेटोलॉजिस्ट डॉक्टर बंसल ने कहा कि पोस्ट कोविड में होने वाली इन दिक्कतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. डॉ. बंसल ने कहा कि कोरोना महामारी ने दुनिया भर में अरबों लोगों को प्रभावित किया. बीमारी के दौरान जहां लोगों के जीने का संकट पैदा हो गया तो वहीं बल्कि कई लोग इससे उबरने के बाद भी कई दिक्कतों का सामना करने रहे हैं जिसमें से कई मामले खून से जुड़े हुए हैं.

    डॉक्टर दिव्या बंसल ने कहा, 'वेन्स और आर्टरीज में खून के थक्के निकलने के दौरान कुछ महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकते हैं जिससे ब्लड काउंट में अचानक गिरावट हो जाती है.' हाल में की गई स्टडीज से पता चला है कि कोविड संक्रमण से उबरने के तीन महीने बाद तक आर्टरीज और वेन्स में खून के थक्के जमने का खतरा बढ़ जाता है. इसका खतरा बुजुर्गों में जोखिम अधिक पाया जाता है.



    डॉक्टर ने कहा, 'प्लेटलेट काउंट या थ्रोम्बोसाइटोपेनिया में हल्की कमी के केस केवल कोरोना संक्रमण के दौरान नहीं देखे गए हैं बल्कि डिस्चार्ज होने के छह महीने बाद तक यह दिक्कत जारी रह सकती है. इनमें से अधिकांश रोगियों को किसी भी इलाज की जरूरत नहीं है. कुछ रोगियों में गंभीर रूप से कम प्लेटलेट काउंट और ब्लीडिंग के मामले सामने आ सकते हैं जिसमें त्वचा से खून बहना, नाक से ब्लीडिंग, मसूड़ों, पेशाब या मल में भी खून हो सकता है. इन लक्षण वाले मरीजों को इलाज की आवश्यकता होगी.'

    पोस्ट कोविड इन समस्याओं से परेशान हैं लोग
    डॉ. बंसल ने कहा कि लो व्हाइट सेल काउंट या कम हीमोग्लोबिन या बोन नैरो सप्रेशन जैसी कई अन्य हेमटोलॉजिकल समस्याएं देखी गई हैं. बंसल ने कहा, 'डिस्चार्ज के बाद तीन महीने तक हाई रिस्क रोगियों में एंटीकोआग्यूलेशन जारी रखने से खून के थक्के जमने के मामलों में कमी आ सकती है. ऐसे मामलों में रेगुलर फॉलोअप जरूरी है क्योंकि इन रोगियों में ब्लीडिंग का खतरा होता है.'

    डॉक्टर ने कहा, 'लो प्लेटलेट काउंट वाले अधिकांश रोगियों में प्लेटलेट काउंट में हल्की गिरावट होती है और वे ऐसिम्प्टमैटिक होते हैं. इन रोगियों को निगरानी में रखा जा सकता है और प्लेटलेट काउंट अपने आप ठीक हो सकता है. थ्रोम्बोसाइटोपेनिया और ब्लीडिंग के गंभीर मरीजों को खास इलाज की जरूरत होती है क्योंकि कम प्लेटलेट का सबसे आम कारण प्लेटलेट्स का इम्यूनिटी खत्म हो जाना है. इसमें सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला इलाज इन्ट्रवीनस इम्युनोग्लोबुलिन है क्योंकि यह नॉन-इम्यूनोसप्रेसिव है.'

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