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Love Story: वो कांग्रेस अध्यक्ष जिनकी शादी से गांधी को था एतराज़

जेबी कृपलानी और सुचेती कृपलानी की शादी से केवल उनके परिवार नहीं बल्कि महात्मा गांधी को भी ऐतराज था.
जेबी कृपलानी और सुचेती कृपलानी की शादी से केवल उनके परिवार नहीं बल्कि महात्मा गांधी को भी ऐतराज था.

जेबी कृपलानी और सुचेती कृपलानी की शादी से केवल उनके परिवार नहीं बल्कि महात्मा गांधी को भी ऐतराज था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 17, 2017, 3:55 PM IST
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वह कांग्रेस अध्यक्ष थे. जीनियस नेताओं में एक. आजादी की लड़ाई में गांधी के बाद शीर्ष नेताओं में एक. उन्हें अपने से 20 छोटी महिला से इश्क हो गया. एक बंगाली और एक सिंधी. इश्क का रंग इतना गहरा कि दोनों को लगा कि अब वे एक-दूसरे के बगैर नहीं रह पाएंगे. उन्होंने जब शादी करने का फैसला किया तो भूचाल आ गया. दोनों परिवारों ने फैसला सुनाया कि उन्हें ये शादी मंजूर नहीं. यहां तक कि महात्मा गांधी ने कह दिया कि ये शादी नहीं हो सकती. इश्क का रंग यकायक नहीं चढ़ा था बल्कि धीरे-धीरे गहरा हुआ था. दोनों ने कहीं महसूस किया था कि उन्हें एक दूसरे की जरूरत है.

हम जेबी कृपलानी यानी जीवतराम भगवानदास कृपलानी और सुचेता मजूमदार के बारे में बात कर रहे हैं. दोनों इतने प्रखर और दृढ़ थे कि उन्हें उनके निश्चय से हिला पाना मुश्किल था. उनकी पहली मुलाकात कहां हुई ये कहना मुश्किल है. लेकिन ये जरूर कहा जा सकता है कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय कहीं न कहीं उनके प्यार की धुरी बना था. बाद में गांधी के साथ काम करते हुए दोनों नजदीक आते गए. लेकिन गांधी यह जानकर हैरान रह गए कि उन्हीं के आश्रम में उन दोनों का प्यार फला-फूला. दोनों कांग्रेस के दिग्गज नेता थे लेकिन आने वाले सालों में उनकी भूमिका ऐसी बदली कि वो विरोधी कैंपों में शामिल हो गए.

शादी शब्द उनकी डिक्शनरी में नहीं था
कृपलानी सिंध के हैदराबाद में पैदा हुए थे. असाधारण तौर पर पढ़ने में बेहद कुशाग्र और कुछ तरह से सोचने वाले शख्स थे. ऐसे शख्स भी जो अपने आपमें रहना ज्यादा पसंद करते थे. उनके बारे में कहा जाता था कि वो बहुत आसानी के साथ अपने प्रिय लोगों से खुद को अलग कर लेते थे. कृपलानी को जो भी जानते हैं वो मानते थे वो बेहद अनुशासित और आदर्शों के पक्के शख्स थे. स्त्रियों से खुद हमेशा दूर रखने वाले. ये माना जाने लगा था कि विवाह उनकी डिक्शनरी में नहीं है. कृपलानी आजादी से पहले लंबे समय तक कांग्रेस के महासचिव रहे और 1947 जब देश आजाद हो रहा था तब वह इस पार्टी के अध्यक्ष थे. हालांकि आजादी के बाद स्थितियां ऐसी बनीं कि कांग्रेस विरोध और विपक्ष की राजनीति करने लगे. आजीवन ऐसा करते रहे. वहीं सुचेता बाद में कांग्रेस में मंत्री भी बनीं और मुख्यमंत्री भी.
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बीएचयू में प्रेम चढ़ा परवान
कृपलानी बीएचयू में इतिहास के प्रोफेसर बनकर आए. हालांकि वह यहां एक ही साल रहे. लेकिन वो एक साल ही उस विश्वविद्यालय पर उनका प्रभाव छोड़ने के लिए काफी था. इसके बाद उन्होंने गांधी के असहयोग आंदोलन के लिए नौकरी छोड़ दी. इसके कुछ साल बाद बीएचयू के इतिहास विभाग में सुचेता मजुमदार प्रोफेसर बनकर आईं. उनके कानों में अक्सर आचार्य कृपलानी की बातें सुनाई पड़ती थीं. खासकर उनके जीनियस टीचर होने की और फिर उनके गांधी के खास सहयोगी बन जाने की. उन्हीं दिनों कृपलानी जब कभी बनारस आते तो बीएचयू के इतिहास विभाग जरूर जाते. उसी दौरान उनकी मुलाकात सुचेता से हुई, जिनमें एक प्रखरता भी थी और आजादी आंदोलन से जुड़ने की तीव्रता भी. कहा जा सकता है कि कृपलानी कहीं न कहीं इस बंगाली युवती से प्रभावित हो गए थे. दोनों में काफी बातें होने लगीं.

प्रेम ने उनके मन पर दस्तक दी
जब कुछ मुलाकातों के बाद सुचेता ने उनसे गांधी से जुड़ने की इच्छा जाहिर की तो कृपलानी इसमें सहायक भी बने. हालांकि वह उन्हें राजनीति में आने से लगातार हतोत्साहित भी करते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि महिलाओं को राजनीति में दामन साफ बचाकर रखना मुश्किल होता था. इसलिए वह उनसे लगातार कहते भी थे अपना दामन साफ रखना. आचार्य कृपलानी उनके मार्गदर्शक और विश्वस्त बन गए. समय के साथ जब दोनों का काफी समय एक दूसरे के साथ बीतने लगा तो वो करीब आने लगे, हालांकि किसी को भी अंदाजा नहीं था कि कृपलानी जैसे शख्स के जीवन में भी प्रेम दस्तक दे सकता है और दबे पांव उनके मन के घर पर कब्जा कर सकता है.

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परिवारवालों ने सुना तो गुस्से से भर गए
कृपलानी लंबे कद के सुदर्शन व्यक्तित्व के धनी थे तो सुचेता साधारण कद काठी वाली. लेकिन कुछ तो था उनके व्यक्तित्व में जिसने कृपलानी जैसी शख्सियत को उनके प्यार में बांध लिया था. दोनों जब एक दूसरे के प्यार में पड़े तो उन्हें कभी उम्र का लंबा फासला अपने बीच महसूस नहीं हुआ. हां लेकिन जब उन्होंने आपस में शादी करने की इच्छा अपने परिवारों के सामने जाहिर की तो तूफान आ गया. अपने घरों में उन्हें गुस्से और विरोध का सामना करना पड़ा.

गांधी ने शादी का विरोध किया
सुचेता ने अपनी किताब सुचेता एन अनफिनिश्ड ऑटोबॉयोग्राफी में लिखा, गांधी ने उनके विवाह का विरोध किया था, उन्हें लगता था कि पारिवारिक जिम्मेदारियां उन्हें आजादी की लड़ाई से विमुख कर देंगी. गांधी ने कृपलानी से कहा, अगर तुम उससे शादी करोगे तो मेरा दायां हाथ तोड़ दोगे. तब सुचेता ने उनसे कहा, वह ऐसा क्यों सोचते हैं बल्कि उन्हें तो ये सोचना चाहिए कि उन्हें आजादी की लड़ाई में एक की बजाए दो कार्यकर्ता मिल जाएंगे.

गांधी चाहते थे कि सुचेता किसी और से शादी कर लें
कृपलानी इस बात से नाखुश तो बहुत थे कि गांधी उनके व्यक्तिगत मामलों में दखल दे रहे हैं लेकिन इसके बाद भी उन्होंने उनकी बात करीब-करीब मान ही ली, सुचेता भी इस पर सहमत हो गईं. लेकिन इसके बाद गांधी ने जो कुछ किया, उसने उनके आपस मे शादी करने के विचार को मजबूत कर दिया. सुचेता अपनी बॉयोग्राफी में लिखती हैं, गांधी चाहते थे कि वह किसी और से शादी कर लें. उन्होंने इसके लिए दबाव भी डाला. मैने इसे एकसिरे से खारिज कर दिया. मैने उनसे कहा, जो प्रस्ताव वह दे रहे हैं वो अन्यायपूर्ण भी है और अनैतिक भी.

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गांधी के पास कोई जवाब नहीं था
सुचेता जो खुशवंत सिंह के कहने पर इलैस्ट्रेटेड वीकली मैगजीन में अपनी आत्मकथा लिखने पर राजी हो गईं थीं. बाद में यही उनकी आत्मकथा के रूप में अहमदाबाद के नवजीवन पब्लिशिंग हाउस ने वर्ष 1978 में प्रकाशित की. इसमें उन्होंने लिखा, जब गांधी ने मेरे सामने ऐसा प्रस्ताव रखा तो मैं उनकी ओर पलटी, उनसे कहा कि जो वो कह रहे हैं वह गलत है. गांधी के पास इसका कोई जवाब नहीं था. हमारी बात वहीं खत्म हो गई. जवाहरलाल नेहरू की सहानुभूति हमारे साथ थी. उन्होंने गांधी से हमारी शादी के बारे में बात की.

तब कृपलानी 48 के थे और सुचेता 28 की
1936 में गांधी ने सुचेता और आचार्य कृपलानी को बुलवा भेजा. गांधी ने उनसे कहा कि उन्हें उनकी शादी से कोई दिक्कत नहीं है लेकिन वह उन्हें आर्शीवाद नहीं दे सकेंगे. गांधी ने कहा कि वह उनके लिए प्रार्थना करेंगे. सुचेता ने अपनी किताब में लिखा, हम उनकी प्रार्थना भर से संतुष्ट थे. अप्रैल 1936 में सुचेता और आचार्य कृपलानी ने शादी कर ली. उस समय कृपलानी 48 साल के थे तो सुचेता 28 कीं.

दोनों संसद में एक दूसरे के खिलाफ लाठी भांजते थे
बाद में हालात ने ऐसी करवट ली कि दोनों विरोधी दलों में शामिल हो गए. रहते दोनों साथ थे लेकिन एक कांग्रेस में रहा तो दूसरा आजीवन कांग्रेस विरोध की राजनीति करता रहा. वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी कहते हैं, तब आचार्य कृपलानी अक्सर मजाक में कहा करते थे कि कांग्रेसी इतने बदमाश हैं कि वो मेरी पत्नी ही भगा ले गए. चतुर्वेदी के अनुसार बेशक दोनों पति-पत्नी थे लेकिन उनमें दोस्ती का भाव ज्यादा था. सुचेता आजादी के आंदोलन में शामिल उन तीन बांग्ला महिलाओं में थीं, जो उच्च शिक्षित थीं और जिन्होंने पूरे जोर-शोर आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और तीनों ने अपना कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश को बनाया. तीनों ने धर्म जाति की परवाह नहीं करते हुए अपने जीवनसाथी चुने.

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कृपलानी विरोध की राजनीति करते रहे
आजादी के बाद बदले हालात में आचार्य कृपलानी ने जहां कांग्रेस से अलग होकर पहले अपनी किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई और फिर लोहिया के साथ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की. सुचेता ने 1950 में दिल्ली से लोकसभा चुनाव किसान मजदूर पार्टी से लड़ा. चुनाव जीता. लेकिन इसके बाद वह कांग्रेस में चली गईं और बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनीं. 1971 में जब तक वह राजनीति में सक्रिय रहीं तब तक कांग्रेस में शामिल रहीं.

पत्नी के रूप में पूरी भूमिका अदा की
वर्ष 1971 में राजनीति से रिटायर होने के बाद वह आचार्य कृपलानी के साथ दिल्ली के अपने बंगले में रहने लगीं. एक पत्नी के नाते उन्होंने अपने पति का पूरा ख्याल रखा. वर्ष 1974 जब वह 66 साल की थीं तब उनका निधन हो गया.
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