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कमजोर आर्थिक हालत के कारण बजट में कमाल दिखाने की गुंजाइश हुई कम

News18Hindi
Updated: January 20, 2020, 7:54 PM IST
कमजोर आर्थिक हालत के कारण बजट में कमाल दिखाने की गुंजाइश हुई कम
इस बार वित्‍त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट से बहुत ज्‍यादा उम्‍मीद करना सरकार के साथ ज्‍यादाती ही होगी.

वित्‍त मंत्री निर्मला सीतारमण (FM Nirmala Sitharaman) जब बजट 2020-21 (Budget 2020-21) पेश करेंगी तो नए बड़े खर्चीले ऐलानों की उम्मीद लगाना सरकार के साथ ज्यादती ही होगी. इतना साफ है कि आर्थिक मोर्चे पर केंद्र की मोदी सरकार (Modi Government) मुश्किल में है. सरकार के पास सीमित विकल्प ही हैं.

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  • Last Updated: January 20, 2020, 7:54 PM IST
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सुधीर जैन

बजट पेश होने में दस दिन बचे हैं. वित्त मंत्रालय (Finance Ministry) ने तैयारी पूरी कर ही ली होगी. आर्थिक गतिविधियों से जुड़े विभिन्न तबकों से सलाह-मशविरे की रस्म भी पूरी होने को है. यह भी उजागर हो चुका है कि इस समय देश की माली हालत अच्छी नहीं है. आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) के आंकड़े ढलान पर हैं. पूरे साल आर्थिक सुस्ती (Economic Slowdown) की बातें होती रहीं. आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए सरकार ने बहुत खर्चा करके देख लिया, लेकिन ज्यादा फर्क नहीं पड़ा. सरकारी खर्च की भी आखिर एक सीमा है. जाहिर है कि इस बार के बजट (Budget) में नए बड़े खर्चीले ऐलानों की उम्मीद लगाना सरकार के साथ ज्यादती ही होगी. लेकिन, इतना साफ है कि आर्थिक मोर्चे पर सरकार मुश्किल में है और उसके पास सीमित विकल्प ही हैं.

क्या हैं सरकार की वास्तविक चुनौतियां
पिछली दो तिमाहियों में आर्थिक वृद्धि के आंकड़े परेशान कर चुके हैं. विषम परिस्थितियां उजागर हैं, मसलन बेरोजगारी (Unemployment), निम्न मध्यवर्ग की बदहाली, मध्यवर्ग की यथास्थिति बनाए रखने की समस्या और उच्च वर्ग के लिए भविष्य की चिंता. वैसे तो आर्थिक सुस्ती में ये सब समस्याएं होती ही हैं, लेकिन एक लक्षण दुर्लभ होता है. आमतौर पर सुस्ती के दौर में महंगाई (Inflation) परेशान नहीं करती, लेकिन इस बार बड़ी समस्याओं में महंगाई भी जुड़ गई है. बाजार में मंदा और महंगाई की इस दुर्लभ समस्या को अंग्रेजी में स्टैगफ्लेशन (Stagflation) कहते हैं. इसे लेकर सरकारी अर्थशास्त्री जरूर चक्कर में होंगे कि क्या करें? क्योंकि आर्थिक सुस्ती से निपटने का पारपंरिक उपाय सरकारी खर्च बढ़ाना माना जाता है. लेकिन, ज्यादा सरकारी खर्च करने से महंगाई बढ़ने लगती है यानी बजट बनाने में इस बार की चुनौती कुछ ज्यादा ही बड़ी है.



सिर्फ मौजूदा हालात से निपटने का वक़्त


बजट का काम अर्थव्यवस्था की दशा सुधारना और आगे की दिशा तय करना ही माना जाता है. मौजूदा सरकार पिछले कुछ साल से आगे की दिशा के काम में ज्यादा लगी दिखाई दी. इस बार हालात ऐसे हैं कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा दशा तक ही सीमित रहना ठीक होगा. लंबे समय की बड़ी-बड़ी योजनाओं को भविष्‍य के लिए रख छोड़ना अच्‍छा रहेगा. यह समय पहले से चले आ रहे अनुत्पादक कार्यक्रमों (Non-Productive Programs) को निलंबित कर देने का है. उस सरकारी पैसे को उत्पादक कार्यों को बढ़ावा देने पर लगाया जा सकता है. मौजूदा आर्थिक परिस्थितियां कम से कम नई योजनाओं का नया ढेर बनाने की इजाजत तो बिल्कुल भी नहीं दे रही हैं.

बजट अगले साल की अनुमानित आमदनी और खर्च का लेखा जोखा होता है.


सालाना बजट मान कर चलना ही बेहतर
कई साल से देश के सालाना बजट के मौके को चार-चार, पांच-पांच साल की योजनाएं बताने में इस्तेमाल किया जा रहा है. हालांकि, बजट सिर्फ अगले साल की अनुमानित आमदनी और खर्च (Income and Expenses) का लेखा जोखा ही होता है. जब देश की माली हालत संकट में हो, तब तो अगले साल से आगे की बात को टाल देना ही बेहतर है. यह संयम नहीं बरता गया तो कहीं ऐसा न हो कि इस बार भी बजट दस्तावेज महज दृष्टिपत्र बनकर रह जाए. पिछले साल के बजट का विश्लेषण करते समय कुछ ऐसी ही आलोचना की गई थी. बहरहाल, इस सिलसिले में यह विवादास्पद सुझाव दिया जा सकता है कि पैसे की हद से ज्यादा तंगी के समय में कुछ बड़ी योजनाओं को एलानिया तौर पर सुस्त कर दिया जाए. उन चालू योजनाओं को छांट लिया जाए जो फौरी तौर पर आर्थिक वृद्धि का सुस्त पहिया कुछ तेजी से घुमा सकें.

हालांकि, यह भी पूछा जा सकता है कि फिर सरकार कैसी योजनाएं बनाए? अच्छा ये हो कि इस बार निर्यात बढ़ाने वाले कामों पर जोर लगा दें. भारतीय उत्पाद की मांग बढ़ाने का इससे ज्यादा सुरक्षित दूसरा कोई तरीका सामने दिखाई नहीं देता. सरकार को गौर से देखना पड़ेगा कि एक साल की अवधि के वे कौन से काम हो सकते हैं, जो देश में उत्पादित सामान को दूसरे देशों में बिकवा सकते हों.

अब तक के उपायों की समीक्षा की दरकार
आर्थिक सुस्ती से निपटने के अब तक के उपाय कारगर न रहने की पड़ताल बहुत काम की हो सकती है. कम से कम पारंपरिक उपाय के अलावा कुछ नए उपाय करने का ख्‍याल आ सकता है. समझा जाना चाहिए कि पिछले कुछ महीनों में हमने आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए पारंपरिक उपायों को ही अजमाया. उद्योग जगत को हद से ज्यादा राहत दे डाली. बजट के पहले ही कॉरपोरेट टैक्स घटाकर सरकारी खजाना कमजोर कर चुके हैं. रियल एस्टेट उद्यमियों को भी राहत दी. संकट में फंसे बैंकों को ज्यादा कर्ज बांटने लायक बनाने की कोशिश की, लेकिन पिछले दो-तीन महीने के आंकड़े बता रहे हैं कि अर्थव्यवस्था पर उनका कोई फर्क नज़र नहीं आया.

क्यों नहीं पड़ा असर
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारतीय बाजार में उत्पाद की कमी नहीं है बल्कि ग्राहकों की कमी हो रही है. ग्राहकों की माली हालत गिर रही है. इस समय उपभोक्ताओं की जेब सुधारने की जरूरत है. उत्पादकों की क्षमता और उत्पादन के लिए जरूरी आधारभूत ढांचे की कमी का कोई लक्षण सामने नहीं है. जाहिर है कि मान लिया जाना चाहिए कि देश में उपभोक्ताओं की माली हालत कमजोर पड़ने से आर्थिक सुस्ती का संकट आया. इस बजट में कुछ करने का सुझाव बनता है तो वह ये कि औसत ग्राहक का आर्थिक स्वास्थ्य सुधारने के लिए किसी टॉनिक की जरूरत है.

हर सरकार मध्यवर्ग को ही औसत ग्राहक मानकर चलती है. हालांकि, मध्यवर्ग का दायरा साफ-साफ परिभाषित नहीं हो पाता.


कौन है औसत ग्राहक
मौजूद ही नहीं, हर सरकार मध्यवर्ग को ही औसत ग्राहक मानकर चलती है. हालांकि, मध्यवर्ग का दायरा साफ-साफ परिभाषित नहीं हो पाता. फिर भी आयकर देने वाले मध्यवर्ग को राहत देकर यह मान लिया जाता है कि देश के अधिसंख्य नागरिकों की जेब में पैसा पहुंच गया, जबकि सबको पता है कि यह वर्ग आबादी में पांच फीसद से ज्यादा नहीं है. हां, ये जरूर हो सकता है कि आयकर देने वाला मध्यवर्ग राजनीतिक रूप से ज्यादा मुखर हो. बहरहाल मौजूदा आर्थिक हालात के मद्देनजर देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों की जेब में राहत पहुंचाने का योग बनाया जाना चाहिए. बजट की नजर सिर्फ मध्यवर्ग पर ही न होकर, निम्न मध्यवर्ग पर पड़ने की दरकार है. वैसे गांव के मजदूरों और किसानों को हम निम्न मध्यवर्ग का सबसे निर्विवाद प्रतिनिधि मानकर चल सकते हैं.

गरीब तक कैसे पहुंचाएंगे पैसा
गरीब यानी आर्थिक निम्न मघ्यवर्ग या निम्न वर्ग तक राहत पहुंचाना आसान काम नहीं है. पिछले साल पूर्ण बजट के पहले और चुनाव के ऐन पहले प्रति किसान परिवार तक 500 रुपये पहुंचाने का ऐलान किया गया था. सबको पता है कि यह रकम पहुंचाने के काम में कितनी अड़चन आई. सरकार एक साल में 90 हजार करोड़ खर्च करने के अपने संकल्प को पूरी तौर पर साल भर बाद भी पूरा नहीं कर पाई. वैसे सालाना कोई 27 लाख करोड़ के बजट वाले देश में 15 करोड गरीब किसानों की जेब में मदद डालने के दूसरे तरीके भी हो सकते हैं. किसानों के उत्पाद के दाम पर नज़र डाली जा सकती है. यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि देश का गरीब अप्रत्यक्ष रूप से टैक्स देता है. रोजमर्रा के सामान की बिक्री में अप्रत्यक्ष टैक्स लगता ही है. इस टैक्स को कम करके भी राहत पहुंचाई जा सकती है. हालांकि, मौजूदा हालात में यह काम भी उतना आसान नहीं है क्योंकि झंझट सरकार के राजस्व में कमी आने की है. किसी भी सरकार को रोजमर्रा के कामकाज और जरूरी रखरखाव के लिए न्यूनतम राजस्व तो चाहिए ही होता है.

सरकारी आमदनी मुश्किल में
सरकारी आमदनी यानी राजस्व उगाही के मोर्चे पर हालात कुछ ज्यादा ही मुश्किल में हैं. गुजरे साल सरकार का राजस्व हद से ज्यादा घट जाने का अंदेशा है. पिछली बार के बजट के बाद ही कॉरपोरेट टैक्स को कम किया गया था. इससे सीधे-सीधे सरकार का राजस्व डेढ लाख करोड़ घट जाने का अंदेशा है. वस्‍तु व सेवा कर (GST) भी उम्मीद के मुताबिक राजस्व नहीं जुटा पाया. विदेशी निवेश भी उम्मीद के मुताबिक नहीं आया. विनिवेश यानी सरकारी संपत्तियां भी उस मात्रा में नहीं बिक पाईं. उधर, उद्योग धंधों को कई फुटकर राहतों के बाद भी हजारों करोड़ रुपये सरकारी खजाने से जा चुके हैं. वो तो रिजर्व बैंक की रिजर्व रकम के सहारे काम चल गया वरना अगले साल के लिए न्यूनतम खर्च के लिए भी गुंजाइश न बचती. बहरहाल, अनुमान ये है कि राजकोषीय घाटे को काबू में रखने का संकल्प टूटने को है. इधर, इस साल भी आमदनी से ज्यादा खर्च करने के अलावा कोई चारा बचा नहीं दिख रहा है.

राजस्व उगाही के मोर्चे पर हालात कुछ ज्यादा ही मुश्किल में हैं. जीएसटी भी उम्मीद के मुताबिक राजस्व नहीं जुटा पाया.


आमदनी से ज्यादा खर्च करने की हद
राजकोषीय घाटे को 3.3 फीसद तक सीमित रखने का लक्ष्य पहले ही छूट चुका है. मोटा अनुमान है कि यह घाटा अनुमान से 25 फीसदी ज्यादा निकलकर आएगा. ऐसे में अगले साल का खर्च बढ़ाने के लिए राजकोषीय घाटे को बढ़ाने के अलावा फिलहाल कोई विकल्प नहीं है. खासतौर पर विदेशी निवेश और सरकारी उपक्रमों को बेचकर रकम जुटाने की तमाम कोशिशें कामयाब नहीं रहीं. अब अगर सुस्त अर्थव्यवस्था को धक्का देकर तेज करना है तो आमदनी से बहुत ज्यादा खर्च करने के अलावा दूसरा कोई विकल्‍प नहीं है. वैसे राजकोषीय घाटे का विकल्प ऐसे मौकों के लिए बनाकर रखा गया है, लेकिन इस बार इस विकल्प के इस्तेमाल में भी भारी झंझट है.

सरकारी खर्च बढ़ाने से महंगाई बढ़ती है
नियंत्रित महंगाई को अच्छा भी माना जाता है. यहां तक कि कुछ विशेषज्ञ नियंत्रित महंगाई को विकास का संकेतक भी मानते हैं, लेकिन मुश्किल यह है कि बजट के ऐन पहले देश में अनियंत्रित महंगाई के आंकड़े उजागर हो रहे हैं. अपनी मौजूदा सरकार ही क्या, इस समय कोई भी सरकार होती तो वह इन हालात में महंगाई की कीमत पर आमदनी से ज्यादा खर्च करने का जाखिम नहीं उठा पाती. हालांकि, जोखिम उठाना ही हो तो एक उपाय जरूर है. वह ये कि नागरिकों को पहले से तैयार किया जा सकता है. प्रचार के जरिये जनता को समझाया जा सकता है कि महंगाई बढ़ने की चिंता मत कीजिए क्योंकि हम आपकी जेब में उससे निपटने लायक पैसा पहंचा रहे हैं. मौजूदा सरकार अपने विपक्ष के दिनों में महंगाई के खिलाफ तब की सरकारों को इतना ज्यादा घेर चुकी है कि उसे यह तर्क देने में भारी अड़चन आएगी.

जाहिर है कि इस बार आमदनी से ज्यादा खर्च करने का कोई नायाब तर्क सरकार को ढ़ंढ कर लाना पड़ेगा या कोई दूसरी जादूगिरी करनी पड़ेगी. ऐसा नहीं हुआ तो एक तर्क तो उपलब्ध है ही कि किफायत और आर्थिक संयम ही कल्याणकारी है. मुश्किल माली हालात सरकार को बस यही बात मान लेने को मजबूर कर रहे हैं.
(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं.)

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First published: January 20, 2020, 7:10 PM IST
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