दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे आर्क ब्रिज के निचले हिस्‍से जुड़े, एफिल टावर से ऊंचे ब्रिज की खूबियां

दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे आर्क ब्रिज के निचले हिस्‍से जुड़ गए हैं.

Highest Arch Railway Bridge: जम्मू में रियासी जिले में चिनाब नदी पर बन रहे रेलवे पुल का निचला हिस्‍सा लगभग तैयार हो चुका है. आर्च ब्रिज पर बने नीचे के दोनों हिस्‍से आपस में जुड़ चुके हैं. इसके साथ ही यह हिस्‍सा अब आधे चांद की तरह नजर आ रहा है.

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जम्मू में रियासी जिले में चिनाब नदी पर बन रहे रेलवे पुल का निचला हिस्‍सा लगभग तैयार हो चुका है. आर्च ब्रिज पर बने नीचे के दोनों हिस्‍से आपस में जुड़ चुके हैं. इसके साथ ही यह हिस्‍सा अब आधे चांद की तरह नजर आ रहा है. उम्मीद की जा रही है कि कुछ ही दिनों में इस आर्च का ऊपरी हिस्सा भी आपस में जुड़ जाएगा और फिर इसपर पटरी बिछाने का काम शुरू होगा.

मार्च के अंतिम सप्ताह से अप्रैल के पहले सप्ताह में कभी भी ये काम पूरा हो सकता है और सूत्रों के मुताबिक उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद इस आर्च का मुआयना करने जा सकते हैं. चिनाब ब्रिज़ को अगले साल मार्च तक तैयार कर लिया जाएगा और उम्मीद की जा रही है कि मार्च 2023 तक भारत के बाक़ी हिस्सों से कश्मीर घाटी सीधी रेल लाइन से जुड़ जाएगी. फिलहाल रेलवे की लाइन उधमपुर होते हुए कटरा तक पहुंच चुकी है.

यहां चलने वाली ट्रेनों में सिर्फ AC कोच होंगे
वहीं बनिहाल से बारामुला तक घाटी में रेलवे की ट्रेन चल रही है. लेकिन कटरा से बनिहाल तक क़रीब 110 किलोमीटर तक रेल लाइन बनाने का काम फिलहाल ज़ोरों पर चल रहा है. भौगोलिक रूप से कई चुनौतियों से भरे इस इलाके में रेलवे लाइन का ज़्यादातर हिस्सा सुरंग और पुल से होकर गुज़र रहा है.

सबसे ख़ास बात यह भी है कि इस इलाके में भारी ठंड और बर्फबारी होती है. इसलिए इस रूट पर चलने वाली ट्रेन भी ख़ास होगी. माना जा रहा है कि इस रूट पर केवल AC कोच वाली ट्रेन ही चलाई जा सकेगी. इसके लिए फिलहाल योजना तैयार की जा रही है. ट्रेन में मुसाफिरों को ठंड से बचाने के लिए ख़ास हीटर लगाया जाएगा.

क्यों ख़ास है रेलवे का चिनाब पुल
चिनाब नदी पर बन रहा आर्च ब्रिज़ नदी तल से 359 मीटर ऊंचा है. सीधे शब्दों में कहें तो दिल्ली के कुतुब मीनार से 5 गुना ज़्यादा ऊंचा और फ्रांस के एफ़िल टावर से भी क़रीब 60 मीटर ऊंचा है. 1315 मीटर लंबे इस विशाल ब्रिज़ पर आतंकवादी हमले का भी कोई असर नहीं होगा. इसके लिए भारतीय रेल ने देश और दुनिया की तमाम एजेंसियों से मदद भी ली है. 120 मंज़ीला इमारत की ऊंचाई पर बन रहा रेलवे का यह पुल अपने आप में दुनिया का एक अजूबा भी साबित होने वाला है. क्योंकि ऐसा निर्माण भारत तो क्या दुनिया में कहीं भी नहीं हो पाया है. फिर हिमालय के मुश्किल भूगोल की चुनौतियां भी हर समय यहां देखने को मिल जाती हैं.

यहां तक कि जिन अंग्रेज़ों ने भारत के ज़्यादातर हिस्से में रेल लाइन बिछाई वो भी यहां पहुंचने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. इस विशालकाय पुल को बनाने के लिए सैंकड़ों लोग दिन रात काम में जुटे हुए हैं. इस पुल के निर्माण में 24,000 टन इस्पात का इस्तेमाल किया जा रहा है. यह पुल चीन के बेईपैन नदी पर बने 275 मीटर शुईबाई रेलवे पुल का रिकॉर्ड तोड़ेगा और दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्च ब्रिज होगा.

इंजीनियरिंग का 1.315 किलोमीटर लंबा यह अजूबा चिनाब नदी के बक्कल और कौड़ी दो छोरों को जोड़ेगा. यह पुल उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक परियोजना का हिस्सा है, जो कटरा और बनिहाल के बीच 111 किलोमीटर के इलाके को जोड़ेगा. इतना ही नहीं इंजीरियरिंग का यह नायाब नमूना इलाके में पर्यटकों के आकर्षण का एक केंद्र बन सकता है. इस पुल से राज्य के आर्थिक विकास में भी तेज़ी आएगी और लोगों और सैलानियों को भी ट्रांसपोर्टेशन का एक बेहतर विकल्प मिल पाएगा.

260 किमी तेज हवा को भी झेल लेना ये ब्रिज
चिनाब नदी का आर्च ब्रिज 260 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली हवा को झेल सकता है. इसका निर्माण दुनिया का सबसे चुनौतीपूर्ण भूगोल के बीच हो रहा है. यह इलाका दक्षिण अमेरिका के एंडिज़ और यूरोप के आल्प्स पर्वत से भी ज़्यादा मुश्किलों से भरा है. इसलिए यह भारतीय रेल के लिए अब तक का सबसे चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट है. इस ब्रिज़ पर किसी आतंकी हमले का भी असर नहीं होगा. 1250 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे इस पुल को सुरक्षित करने के लिए डीआरडीओ के साथ मिलकर इसे धमाके से भी महफूज़ बनाया जा रहा है. इस ब्रिज़ को बनाने के लिए भारतीय रेल को करीब 25 किलोमीटर लंबी सड़क बनानी पड़ी और तब जाकर मज़दूर और कंस्ट्रक्शन के सामान यहां तक पहुंचाया जा सका है.

सबसे बड़ी बात यह है कि शुरुआत में तो मज़दूर और इंजिनियरिंग के सामान भी यहां हेलिकॉप्‍टर से पहुंचाये जाते थे. इसी मेहनत का नतीज़ा है आज एक पुल अपने आकार में नज़र आने लगा है. एक बार आर्च के 440 टुकड़े जोड़ लेने के बाद उसपर डेक बनाया जाएगा. फिर इसपर रेल ट्रैक बिछाने का काम शुरू होगा. इस पुल से महज़ 65 किलोमीटर दूर मौजूद एक नापाक पड़ोसी देश पाकिस्तान भी मौजूद है. इलाके में चलने वाली तेज़ हवाओं से भी इसको बचाना ज़रूरी है. इसलिए इसके आकार को इतनी विशालता दी गई है कि वो आंधियों को भी झेल सके.

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