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OPINION: 'देश में क़बीलाई संस्कृति को बढ़ावा देगा बलात्कारियों की लिंचिग का सुझाव'

Yusuf Ansari | News18Hindi
Updated: December 2, 2019, 6:54 PM IST
OPINION: 'देश में क़बीलाई संस्कृति को बढ़ावा देगा बलात्कारियों की लिंचिग का सुझाव'
हैदराबाद में हुई रेप की घटना से पूरा देश हिल गया है.

लिंचिंग (Lynching) के खिलाफ़ क़ानून बनाने की मांग और दूसरी तरफ़ बलात्कारियों (Rapist) के लिए लिंचिंग की मांग परस्पर विरोधी विचार हैं.

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  • Last Updated: December 2, 2019, 6:54 PM IST
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हैदराबाद (Hyderabad Gang Rape)) में वेटनरी डॉक्टर की सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या की जघन्य वारदात सड़क से संसद तक गूंज रही है. इसे लेकर देश ग़ुस्से में उबल रहा है. हैदराबाद से दिल्ली तक लोग इसके ख़िलाफ जुलूस निकाल रहे हैं. मोमबत्ती जलाकर पीड़िता के लिए इंसाफ़ मांग रहे हैं. ये ग़ुस्सा सड़कों से संसद के अंदर तक दिख रहा है. बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सज़ा देने की मांग हो रही है. इस आक्रोश को देखते हुए रक्षामंत्री राजनाथ सिंह (Rajnath Singh) को लोकसभा कहना पड़ा कि सरकार इस मामले में कड़े से कड़ा क़ानून बनाने को तैयर है.

लोकसभा हो या राज्यसभा, सोमवार को दोनों सदनों में सांसदों ने ये मुद्दा उठाया और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की. राज्यसभा में सपा सांसद जया बच्चन (Jaya Bachchan) ने कहा, ‘सरकार को अब कार्रवाई करनी चाहिए. एक दिन पहले ही हैदराबाद में उसी जगह हादसा हुआ था. कुछ देशों में जनता दोषियों को सजा देती है. दोषियों को अब जनता ही सबक सिखाए. पब्लिक में लेकर ऐसे लोगों को लिंच कर देना चाहिए.’

वहीं बीजेपी सांसद रूपा गांगुली ने भी हैदराबाद की घटना पर रोष प्रकट करते हुए कहा, ‘बहुत ही भयावह और दुखद. जितनी भर्त्सना की जाए कम है. सिर्फ कानून बना देने से काम नहीं चलेगा. ऐसे लोगों को चौराहे पर पूरी दुनिया और मीडिया के सामने फांसी पर टांग देना चाहिए.’

राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने भी इस वीभत्स अपराध पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की. उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के लिए ‘बिल’ की नहीं बल्कि राजनीतिक ‘विल’, प्रशासनिक ‘स्किल’ और सामाजिक ‘एविल’ को खत्म करने वाले माइंडसेट की जरूरत है.


हैदराबाद की घटना के चारों आरोपियों की मांओं ने भी उन्हें उसी तरह ज़िंदा जलाने की मांग कर दी है जिस तरह उन्होंने पीड़िता को जलाया था. यह मांग चौतरफ़ा सामाजिक दबाव का नतीजा भी हो सकती है. सोशल मीडिया पर भी ऐसी ही प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. लोग इस घटना के आरोपियों को सरेआम फांसी पर लटकाने, चौराहे पर खड़ा करके गोली मारने और ज़िंदा जला देने जैसी सज़ा देने की मांग कर रहे हैं. कुछ लोग इसके लिए इस्लामी शरीयत का ‘संगसार’ करने यानी पत्थर मार कर जान लेने का सुझाव दे रहे हैं. वहीं कुछ का कहना कि ऐसे लोगों को बधिया करके छोड़ देना चाहिए, ताकि वो सारी ज़िंदगी अपने किए पर पछताते रहें.

ऐसा वीभत्स घटनाओं पर आम लोगों का गुस्से में उबलना और कुछ भी मांग करना एक अलग बात है. लेकिन संसद के अंदर सांसदों का आरोपियों की सरेआम लिंचिंग की मांग करना एकदम अतिवादी क़दम है. एक तरफ देश में पिछले कुछ साल में हुआ लिंचिंग की घटनाओं के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने की मांग हो रही है. सुप्रीम कोर्ट भी इस पर सरकार को नोटिस जारी करके लिंचिंग की घटनाओं को रोकने के लिए ज़रूरी कड़े क़दम उठाने की बात कह चुका है. सुप्रीम कोर्ट का मक़सद लिंचिंग की लगातार बढ़ती घटनाओं को रोकना है. इसे लेकर वो कई बार चिंता जता चुका है.
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एक तरफ़ ऐसे में दो महिला सांसदों का संसद के दर बहस को दौरान बलात्कारियों की लिंचिंग करने की मांग को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता. हालांकि दो सांसदों का मांग को सभी महिला सांसदों की मांग नहीं माना जा सकता और न ही यह कहा जा सकता कि बाक़ी महिला सांसदों को इस मांग पर समर्थन है. लिंचिंग के इस सुझाव से सुझाव देने वाली इन महिला सांसदों की इस मुद्दे पर चिंता तो सामने आती है लेकिन सामाजिक संवेदनशीलता का अभाव दिखता है.


लिंचिंग के खिलाफ़ क़ानून बनाने की मांग और दूसरी तरफ़ बलात्कारियों लिंचिंग की मांग परस्पर विरोधी विचार हैं. अगर हम लिंचिंग को ग़लत, असभ्य और असंवैधानिक मानते हैं तो वो सबके लिए ग़लत है. चाहे वो गाय और गौमांस के नाम पर हो या फिर बलात्कार के नाम पर इसे किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है. ऐसी सज़ाएं उस दौर में हुआ करती था जब देशों मे लिखित संविधान और उन पर आधारित क़ानून नहीं थे. आज दुनिया में हर देश में लिखित संविधान और उन के आधार पर क़ानून बने हैं. समय-समय पर असभ्यकाल की सज़ाओं को नए ज़माने के हिसाब से सभ्यता और मानवाधिकारों के दायरे में लाया गया है.

बलात्कारियों को फांसी की सज़ा देने की मांग बहुत पुरानी है. जब भी यह मांग ज़ोर पकड़ती है तो महिला संगठनों की तरफ से ही इसका विरोध भी सामने आता है. इस बारे में कुछ साल पहले तक महिला संगठनों का तर्क हुआ करता था कि बलात्कार की सज़ा फांसी होने पर बलात्कार के ज़्यातार मामलों में हत्या भी हुआ करेगी. यह आशंका साल दर साल सही साबित हो रही है. दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बाद जितने भी ऐसे में मामले सामने आए हैं, उनमें से ज़्यादातर में बलात्कार के बाद पीड़िता की हत्या करने की कोशिश की गई है.

कुछ मामलों में हैदराबाद की तरह पीड़िता की क्षत-विक्षत या जली हुई लाश मिलती है या फिर पीड़िता निर्भया की तरह ऐसी हालत में पाई गईं है कि कुछ दिन ज़िंदगी की लड़ाई लड़ते हुए अस्पताल में मौत से हार जाती हैं. ऐसे मामलों में जनआक्रोश सड़कों पर दिखता है तो फिर ऐसी दर्दनाक सज़ा की मांग भी होती हैं. दरअसल इसके पीछे बलात्कार के ज़्यादातर मामलों में आरोपियों को सज़ा नहीं मिलना या फिर सज़ा मिलने में ग़ैर ज़रूरी देरी होना है. इससे जनाक्रोश को बढ़ावा मिलता है.


हैदराबाद की इस घटना के बाद दिल्ली के निर्भया कांड की पीड़ित की मां का ग़ुस्सा भी फूट पड़ा है. उन्होंने भी कहा है कि उनकी बेटी को रौंदने के बाद मौत मे मुंह मे धकेलने वालों को आख़िर फांसी कब मिलेगी? ग़ौरतलब है कि उस कांड के चार दोषियों को फांसी की सज़ा हुई है लेकिन उनकी दया याचिका अभी लंबित है. इनमें से एक की दया याचिका खारिज करने की आज ही दिल्ली सरकार ने सिफारिश की है. चार दिन पहले ही निर्भया ने परिवार वालों ने कोर्ट में अर्ज़ी लगाकर दोषियों को जल्द फांसी दिए जाने की मांग की थी.

जब इस तरह की बातें सामने हैं कि बलात्कार के दोषियों के सज़ा मिलने मे देरी हो रही हो तो सिस्टम के प्रति ग़ुस्सा उबलता है. इस गुस्से में ही दोषियों को फौरन सज़ा देने की मांग उठती है. कई बार मांग अव्याहारिक होती हैं. लोकिन जब तक केंद्र और राज्य सरकारें यह सुनिश्चित नहीं करेंगी कि बलात्कार के सभी मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हों, तब तक ऐसी मांगें आती रहेंगी. दो साल की तय समयसीमा में निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट में फैसला हो. अगर दोषियों फांसी की सज़ा होती हो तो छह महीने दया याचिका पर फैसले के लिए और दिए जा सकते हैं. देश भर में आम आदमी से लेकर सासंदों और विधायकों तक की इस पर सहमति है. ज़रूरत सरकारों के इच्छा शक्ति दिखाने की है.

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First published: December 2, 2019, 6:21 PM IST
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