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दलित का चर्च जाना, उसके एससी सर्टिफिकेट रद्द होने का कारण नहीं हो सकता: मद्रास हाईकोर्ट

दलित का चर्च जाना, उसके एससी सर्टिफिकेट रद्द होने का कारण नहीं हो सकता: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने की मामले की सुनवाई. (File pic)

मद्रास हाईकोर्ट ने की मामले की सुनवाई. (File pic)

Madras High Court: हाईकोर्ट 2016 में रामनाथपुरम जिले की पी मुनीस्वरी द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें जिला कलेक्टर द्वारा उनके सामुदायिक प्रमाण पत्र को रद्द करने के 2013 के आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी.

    चेन्‍नई. मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) ने गुरुवार को एक सुनवाई के दौरान कहा है कि एक दलित द्वारा होली क्रॉस (Holy Cross) और अन्य धार्मिक प्रतीकों व प्रथाओं को प्रदर्शित करने के कारण उसका अनुसूचित जाति समुदाय प्रमाण पत्र रद्द नहीं किया जा सकता है. हाईकोर्ट ने कहा, ‘यह नौकरशाही की संकीर्णता है, जिसे संविधान ने कभी नहीं देखा.’

    मीडिया रिपोर्ट के अनुसार चीफ जस्टिस संजीव बनर्जी और जस्टिस एम दुरईस्वामी की पीठ ने कहा कि केवल इसलिए कि दलित समुदाय के एक सदस्य ने एक ईसाई से शादी की और उसके बच्चों को उसके पति के समुदाय के सदस्यों के रूप में मान्यता दी गई है, ऐसे में उसे जारी किया गया प्रमाण पत्र रद्द नहीं किया जा सकता है.

    हाईकोर्ट 2016 में रामनाथपुरम जिले की पी मुनीस्वरी द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें जिला कलेक्टर द्वारा उनके सामुदायिक प्रमाण पत्र को रद्द करने के 2013 के आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी. पेशे से डॉक्टर मुनीस्वरी का जन्म हिंदू (अनुसूचित जाति) घर में हुआ था और बाद में उन्होंने एक ईसाई से शादी की. अपने बच्चों को भी ईसाई समुदाय के सदस्यों के रूप में पाला. हालांकि इसके चलते उनका एससी सर्टिफिकेट रद्द कर दिया गया.

    जब उन्होंने अदालत में फैसले को चुनौती दी तो अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने उनके क्‍लीनिक का दौरा किया और दीवार पर एक ‘क्रॉस’ लटका हुआ पाया था. इस आधार पर अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि वह ईसाई धर्म अपना चुकी हैं. इस प्रकार उन्हें एससी समुदाय प्रमाण पत्र के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था.

    हालांकि इस तर्क ने हाईकोर्ट को परेशान कर दिया, जिसने कहा कि हलफनामे में ऐसा कोई सुझाव नहीं है कि उन्होंने अपनी आस्‍था छोड़ दी है या उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है.

    हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, ‘यह भी समान रूप से संभव है कि वह एक परिवार के एक हिस्से के रूप में अपने पति और बच्चों के साथ रविवार की प्रार्थना के लिए जा सकती हैं, लेकिन एक तथ्‍य यह भी है कि अगर एक व्यक्ति चर्च जाता है इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसे व्यक्ति ने अपनी उस मूल आस्‍था को पूरी तरह से त्याग दिया है, जहां उसका जन्‍म हुआ.’ अदालत ने आदेश को रद्द करते हुए अधिकारियों से तत्काल प्रभाव से प्रमाण पत्र बहाल करने को कहा है.

    Tags: Christians, Madras high court, SC ST Category

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