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EXPLAINED: कितने समय के लिए निलंबित हो सकते हैं विधायक, जानें क्या कहते हैं नियम

EXPLAINED: कितने समय के लिए निलंबित हो सकते हैं विधायक, जानें क्या कहते हैं नियम

जस्टिस एएम खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी औऱ सीटी रविकुमार की बेंच में निलंबन की अवधि को लेकर ही सुनवाई हुई. (फाइल फोटो)

जस्टिस एएम खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी औऱ सीटी रविकुमार की बेंच में निलंबन की अवधि को लेकर ही सुनवाई हुई. (फाइल फोटो)

12 BJP MLAs suspended: इसके अलावा द रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट 1951 की धारा 151(A) में कहा गया है कि पद रिक्त होने के 6 महीनों के भीतर उपचुनाव कराए जाने चाहिए. इससे पता चलता है कि इस धारा में शामिल अपवादों को छोड़कर कोई भी क्षेत्र 6 महीने से ज्यादा समय के लिए बगैर प्रतिनिधि के नहीं रह सकता. शीर्ष अदालत ने कहा था कि एक साल का निलंबन प्रथम दृष्टया असंवैधानिक है, क्योंकि इसने 6 महीने की सीमा पार कर ली है. साथ ही इसे 'केवल सदस्य ही नहीं, बल्कि पूरे निर्वाचन क्षेत्र को सजा देने' की तरह माना गया था.

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नई दिल्ली. महाराष्ट्र विधानसभा (Maharashtra Assembly) से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के 12 विधायकों को एक साल के लिए निलंबित करने को सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया असंवैधानिक बताया था. साथ ही कहा था कि यह ‘निष्कासन’ से भी ज्यादा बुरा है. मामले पर आगली सुनवाई 18 जनवरी को होनी है. निलंबित हुए विधायकों ने बीते साल शीर्ष अदालत में एक रिट याचिका दाखिल की थी, जिसमें निलंबन को खत्म करने की अपील की गई थी. अब सवाल उठता है कि एक विधायक को आखिर कितने समय के लिए निलंबित किया जा सकता है. इसे विस्तार से समझते हैं-

मंगलवार को हुई सुनवाई में जस्टिस एएम खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी औऱ सीटी रविकुमार की बेंच में निलंबन की अवधि को लेकर ही सुनवाई हुई. बेंच का कहना है कि अगर चुने हुए विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों को विधानसभा में पूरे साल प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो इससे संविधान के मूल ढांचे पर असर होगा. बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 190 (4) का जिक्र किया. इसमें कहा गया है, ‘अगर राज्य के विधानमंडल का कोई सदस्य सदन की अनुमति के बगैर 60 दिनों की अवधि के लिए सभी बैठकों से अनुपस्थित रहता है, तो सदन उसकी सीट को खाली घोषित कर सकती है.’

इसके अलावा द रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट 1951 की धारा 151(A) में कहा गया है कि पद रिक्त होने के 6 महीनों के भीतर उपचुनाव कराए जाने चाहिए. इससे पता चलता है कि इस धारा में शामिल अपवादों को छोड़कर कोई भी क्षेत्र 6 महीने से ज्यादा समय के लिए बगैर प्रतिनिधि के नहीं रह सकता. शीर्ष अदालत ने कहा था कि एक साल का निलंबन प्रथम दृष्टया असंवैधानिक है, क्योंकि इसने 6 महीने की सीमा पार कर ली है. साथ ही इसे ‘केवल सदस्य ही नहीं, बल्कि पूरे निर्वाचन क्षेत्र को सजा देने’ की तरह माना गया था.

यह भी पढ़ें: महाराष्ट्र विधानसभा से 12 BJP विधायकों के एक साल के निलंबन पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

कह कहते हैं नियम
Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha के नियम 373, 374 और 374A में ‘बेहद अव्यवस्थित’ आचरण वाले सदस्य को हाटने और सदन के नियमों का उल्लंघन करने और जानबूझकर काम में बाधा डालने वाले के निलंबन का प्रावधान है. इन नियमों के मुताबिक, अधिकतम निलंबन 5 लगातार बैठकें या बचे हुए सत्र तक हो सकता है.

नियम 255 और 256 के तहत राज्यसभा में अधिकतम निलंबन सत्र के बचे हुए समय से ज्यादा नहीं होना चाहिए. इसी तरह के नियम विधानसभाओं और परिषदों के लिए भी लागू हैं, जिनमें अधिकतम निलंबन सत्र के बचे हुए समय से ज्यादा नहीं होना चाहिए.

क्या था मामला
5 जुलाई 2021 को दो दिनों के मानसून सत्र के दौरान राज्य मंत्री छगन भुजवल (एनसीपी) ने पटल पर एक प्रस्ताव रखने का प्रयास किया, जिसपर विपक्ष के नता देवेंद्र फडणवीस (भाजपा) ने आपत्ति जताई. इसके बाद से सदन में हंगामा हो गया. भाजपा के कई विधायकों ने सदन में जमकर हंगामा किया. इस दौरान उन्होंने माइक भी उखाड़ दिए. पीठासीन अधिकारी और शिवसेना विधायक भास्कर जाधव ने 10 मिनट के लिए सदन को स्थगित कर दिया था. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके बाद कुछ भाजपा विधायक कथित रूप से उनके कमरे में पहुंचे और उन्हें धमकाया और बुरा बर्ताव किया.

इसके बाद महाराष्ट्र के संसदीय कार्यमंत्री अनिल परब ने 12 भाजपा विधायकों को निलंबित करने का प्रस्ताव पेश किया. निलंबित किए गए 12 सदस्य संजय कुटे, आशीष शेलार, अभिमन्यु पवार, गिरीश महाजन, अतुल भातखलकर, पराग अलवानी, हरीश पिंपले, योगेश सागर, जय कुमार रावल, नारायण कुचे, राम सतपुते और बंटी भांगड़िया हैं.

Tags: BJP, Supreme Court

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