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हिंदुत्व, भीमा-कोरेगांव और सावरकर: शिवसेना-कांग्रेस-NCP की इस तिपहिया सरकार की राह में कई रोड़े

News18Hindi
Updated: November 27, 2019, 4:32 PM IST
हिंदुत्व, भीमा-कोरेगांव और सावरकर: शिवसेना-कांग्रेस-NCP की इस तिपहिया सरकार की राह में कई रोड़े
उद्धव ठाकरे की शिवसेना, शरद पवार की एनसीपी और सो‍निया गांधी की कांग्रेस विचारधारा के साथ ही कई मुद्दों पर एकदूसरे की विरोधी रही हैं. बीजेपी को उम्‍मीद है कि मुद्दों पर असहमति के कारण ये गठबंधन जल्‍द टूट जाएगा.

हिंदुत्‍व (Hindutva), भीमा-कोरेगांव (Bhima-Koregaon) और वीर सावरकर (Vir Savarkar) को भारत रत्‍न (Bharat Ratna) के मुद्दे पर महाराष्‍ट्र में गठबंधन करने वाली शिवसेना, कांग्रेस व एनसीपी एकमत नहीं रही हैं. बीजेपी इंतजार करेगी कि ऐसे ही तमाम मुद्दों पर आपसी असहमति में उलझा गठबंधन बिखरे और उसे महाराष्‍ट्र की सत्‍ता में दखल का फिर मौका मिले.

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  • Last Updated: November 27, 2019, 4:32 PM IST
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धवल कुलकर्णी

मुंबई. लोकसभा चुनाव 2014 में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के महाराष्‍ट्र (Maharashtra) में शानदार प्रदर्शन के बाद जुलाई, 2014 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने मुंबई में एक कार्यक्रम किया था. इस कार्यक्रम में बीजेपी के वरिष्‍ठ नेता और पूर्व विधायक मधु चह्वाण ने मांग की थी कि पार्टी को शिवसेना (Shiv Sena) से गठबंधन तोड़कर राज्‍य में अकेले दम विधानसभा चुनाव में उतरना चाहिए. चह्वाण ने शिवसेना के साथ बीजेपी के गठबंधन को 'तीन टांग पर दौड़' करार दिया था. उनका कहना था कि शिवसेना के दबदबे वाले क्षेत्रों में बीजेपी का आधार मजबूत नहीं हो पा रहा है, जो पार्टी के लिए तनाव और चिंता की बात होनी चाहिए. बाद में बीजेपी ने शिवसेना से गठबंधन (Alliance) तोड़ दिया और महाराष्‍ट्र की सत्‍ता पर काबिज हुई.

ठाकरे के नेतृत्‍व में बन रही सरकार के टिकने पर लोगों को संशय
चह्वाण का बयान शिवसेना से बीजेपी के गठबंधन तोड़ने के क्रम में हुई तमाम घटनाओं में एक था. बीजेपी ने शिवसेना से गठबंधन तोड़ा और राज्‍य में अपनी स्थिति बेहतर की. पूरे घटनाक्रम के पांच साल बाद चह्वाण का का मुहावरा शिवसेना को डरा सकता है, क्‍योंकि उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) एनसीपी और कांग्रेस (NCP-Congress) के साथ गठबंधन में सरकार बनाने की तैयारी में हैं. ये तीनों पार्टियां विचारधारा और संस्‍कृति के मामले में एकदूसरे से बिलकुल अलग हैं. कांग्रेस और एनसीपी एकदूसरे की मिरर इमेज हैं. शरद पवार ने 1999 में सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) के विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए कांग्रेस से अलग होकर एनसीपी बनाई थी. वहीं, शिवसेना के तौर-तरीके इन दोनों से अलग हैं. इस कारण लोगों को शिवसेना अध्‍यक्ष उद्धव ठाकरे के नेतृत्‍व में बनने वाली गठबंधन सरकार के स्‍थायित्‍व को लेकर संशय है.

शिवसेना का हिंदूवादी रुख कांग्रेस के लिए राष्‍ट्रीय स्‍तर पर चुनौती
शिवसेना को एक समय तक कांग्रेस की ही 'बी टीम' माना जाता था. कहा जाता है कि शिवसेना ने अपने शुरुआती दौर में कांग्रेस के लिए मुंबई के कामगारों के बीच वामदलों की पैठ खत्‍म करने का काम किया था. हालांकि, तब से अब तक मुंबई के तटों पर समंदर का बहुत पानी टकराकर लौट चुका है. समय के साथ शिवसेना का सियासी व सामाजिक आधार बढ़ता गया, लेकिन पार्टी खुद को किसी एक विचारधारा के पैरोकार के तौर पर स्‍थापित नहीं कर पाई. इसके बाद 1980 के दशक में शिवसेना ने हिंदुत्‍व की विचारधारा को लेकर आगे बढ़ना शुरू कर दिया. अब शिवसेना का यही हिंदुत्‍व का चेहरा राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कांग्रेस को परेशानी में डाल सकता है. कांग्रेस जब-जब अल्‍पसंख्‍यकों के मुद्दों पर आवाज उठाएगी, तब-तब महाराष्‍ट्र में भगवा पार्टी के साथ सत्‍ता में रहना पार्टी के सामने कई सवाल खड़ा कर देगा.

शिवसेना और एनसीपी महाराष्‍ट्र के कई इलाकों में धुर-विरोधी
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महाराष्‍ट्र में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां शिवसेना और एनसीपी एकदूसरे के धुर-विरोधी के तौर पर स्‍थापित हैं. ऐसे में किसी भी एक पार्टी को दूसरे को नुकसान पहुंचाकर ही उन इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी. इस बार के विधानसभा चुनाव में 57 सीटों पर शिवसेना और एनसीपी का सीधा मुकाबला था. एनसीपी प्रमुख शरद पवार (Sharad Pawar) ये अच्‍छी तरह से जानते हैं कि उनकी पार्टी को मिले वोटों में बड़ा हिस्‍सा सत्‍ता-विरोधी मतों का था. इसमें भी कुछ हिस्‍सा शिवसेना के विरोध के कारण एनसीपी की झोली में गिरा था. स्‍पष्‍ट है कि तीनों सहयोगियों के बीच राजनीतिक महत्‍वाकांक्षाओं को हर हाल में पूरा करने की इच्‍छा के चलते ही हुआ है. तीनों ही दल देश के सबसे शहरी और औद्योगिक राज्‍य की सत्‍ता पर किसी भी कीमत पर काबिज होना चा‍हते थे. साथ ही तीनों पार्टियों पर बीजेपी को हर हाल में सत्‍ता से दूर रखने का दबाव भी था.

जख्‍मी बीजेपी चोट पहुंचाने का नहीं गंवाएगी कोई भी मौका
महाराष्‍ट्र की सियासत में तेजी से बदले घटनाक्रम से जख्‍मी बीजेपी भी शिवसेना को चोट पहुंचाने का कोई मौका नहीं गंवाना चाहेगी. बीजेपी को ऐसा मौका सांप्रदायिक मुद्दों और तीनों दलों की वैचारिक असहमति से कभी भी मिल सकता है. इनमें विनायक दामोदर सावरकर (Savarkar) को भारत रत्‍न का पुराना मुद्दा भी शामिल है. इसके अलावा शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी का नजरिया भीमा-कोरेगांव हिंसा (Bhima-Koregaon Violence) के मुद्दे पर एकदूसरे के उलट है. साथ ही मुस्लिम समुदाय को आरक्षण की मांग पर भी तीनों दल एकमत नहीं हैं. ये सभी मुद्दे तीनों दलों के बीच कभी भी खटास पैदा कर बीजेपी को हमलावर होने का मौका दे सकते हैं. शिवसेना के कुछ नेताओं ने स्‍वीकार किया कि पार्टी हिंदुत्‍व के मुद्दे को लेकर एनसीपी-कांग्रेस के साथ नहीं चल पाएगी. ऐसे में इस मुद्दे को ठंडे बस्‍ते में डाला जाएगा. बीजेपी को उम्‍मीद है कि ऐसे ही कई मुद्दों पर असहमति के कारण शिवसेना, कांग्रेस, एनसीपी गठबंधन टूटेगा और उसे सत्‍ता में दखल का मौका मिलेगा.

(लेखक पत्रकार और 'द कजिंस ठाकरे: उद्धव, राज एंड द शैडो ऑफ देयर सेनाज' के लेखक हैं. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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First published: November 27, 2019, 1:02 PM IST
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