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महाराष्‍ट्र में महाभारत: राजनीतिक दलों के लिए विचारधारा नहीं, सिर्फ कुर्सी की लड़ाई

News18Hindi
Updated: November 13, 2019, 1:05 PM IST
महाराष्‍ट्र में महाभारत: राजनीतिक दलों के लिए विचारधारा नहीं, सिर्फ कुर्सी की लड़ाई
बहुत से लोग तब चौंक गए, जब शिवसेना ने बीजेपी से गठबंधन तोड़कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ महाराष्‍ट्र में सरकार बनाने की कवायद शुरू की.

महाराष्‍ट्र (Maharashtra) में राष्‍ट्रपति शासन (President’s Rule) लागू होने के बाद शिवसेना (Shiv Sena) कांग्रेस (Congress) और एनसीपी (NCP) के साथ सरकार बनाने के लिए सहमति बनाने की कोशिशों में जुटी हुई है. इससे पहले शिवसेना और बीजेपी (BJP) ने साथ में विधानसभा चुनाव लड़ा. गठबंधन के चुनाव में जीत के बाद मुख्‍यमंत्री (Chief Minister) की कुर्सी को लेकर दोनों सहयोगी दलों में ठनी रही और आखिर में दोनों ने अलग राह पकड़ ली.

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  • Last Updated: November 13, 2019, 1:05 PM IST
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धवल कुलकर्णी

मुंबई. महाराष्‍ट्र में जारी सियासी उठापटक ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि राजनीति (Politics) में कुछ भी संभव है. महाराष्‍ट्र (Maharashtra) के मौजूदा राजनीतिक हालात से साफ है कि अब तमाम पार्टियों के बीच विचारधारा (Ideology) की लड़ाई नहीं है. सभी दल सिर्फ और सिर्फ कुर्सी के लिए धींगामुश्‍ती कर रहे हैं. बहुत से लोग तब चौंक गए, जब शिवसेना (Shiv Sena) ने बीजेपी (BJP) से गठबंधन तोड़कर कांग्रेस (Congress) और एनसीपी (NCP) के साथ महाराष्‍ट्र में सरकार बनाने की कवायद शुरू की. कुछ महीने पहले तक लोग शिवसेना के इस कदम की कल्‍पना भी नहीं कर सकते थे. लोगों का मानना है कि ये वैचारिक प्रतिबद्धता की कमी के कारण हुआ. इस पूरी कवायद में शिवसेना ने पूरा चक्‍कर काटकर अपने धुर-विरोधियों के साथ सत्‍ता पर काबिज होने की भरपूर कोशिश की. हालांकि, पार्टी की कोशिशें सिरे नहीं चढ़ पाईं. रही बची कसर राष्‍ट्रपति शासन (President’s Rule) लागू होने से पूरी हो गई.

बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन तोड़ने के हैं कई कारण
शिवसेना की स्‍थापना 1966 में हुई. तब माना जाता था कि कांग्रेस ने बॉम्‍बे (अब मुंबई) के कामगारों में वामदलों की पैठ को घटाने के लिए शिवसेना बनाई है. समय के साथ शिवसेना वैचारिक तौर पर बीजेपी के साथ नजर आई. पिछले पांच साल दोनों ने मिलकर महाराष्‍ट्र में सरकार चलाई. इसके बाद दोनों के अलग होने के पीछे कोई एक कारण नहीं है. शिवसेना के कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिश और बीजेपी के साथ गठबंधन टूटने का विश्‍लेषण करने के लिए कई कारणों का आकलन करना होगा. वहीं, बीजेपी के केंद्रीय और राज्‍य नेतृत्‍व की ओर से निवर्तमान मुख्‍यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को हाशिए पर रखने के कारण बाकी दलों को रातों-रात आगे आने का मौका मिला.

राममंदिर आंदोलन के समय हुआ बीजेपी-शिवसेना गठबंधन
महाराष्‍ट्र में बीजेपी और शिवसेना के बीच 1989 में गठबंधन (Alliance) हुआ था. तब बीजेपी ने राममंदिर आंदोलन (Ram Mandir Movement) शुरू किया था. उस समय शिवसेना के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष बाल ठाकरे (Bal Thackeray) ने खुद को हिंदुत्‍व के सिपाही के तौर पर पेश किया. बाल ठाकरे चाहते थे कि राममंदिर आंदोलन के जरिये उनकी पार्टी की पहुंच मुंबई (Mumbai) के बाहर भी बढ़े. तब तक उनकी पार्टी का एजेंडा मराठी मानुष (Marathi Manush) और भाषा ही था. शिवसेना भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से अनजान नहीं थी. कथित तौर पर शिवसेना कई बार सांप्रदायिक झगड़ों में शामिल रही थी. हालांकि, हिंदुत्‍व की राजनीति का रुख करने का मतलब थ कि शिवसेना को मराठी एजेंडा छोड़ना पड़ता. मुंबई में कई बार सामाजिक, आर्थिक और सांस्‍कृतिक आधार पर उथलपुथल होती रही है. मराठी एजेंडा छोड़ने के कारण शिवसेना के दबदबे वाले कई विधानसभा क्षेत्रों में हलचल मच गई. बाद के दिनों में राज ठाकरे की महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना ने मराठी एजेंडा अपनाया.

राज ठाकरे का करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व शिवसेना के लिए हमेशा खतरा बना रहेगा.

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हिंदूत्‍व को छोड़ मराठी एजेंडा पर जोर दे सकती है शिवसेना
महाराष्‍ट्र में राज ठाकरे (Raj Thackeray) की मनसे का प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा है. बावजूद इसके राज ठाकरे का करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व शिवसेना के लिए हमेशा खतरा बना रहेगा. वहीं, बीजेपी ने भी शिवसेना के मतदाताओं में ही सेंध लगाई. अब बीजेपी से अलग होने के बाद माना जा रहा है कि शिवसेना हिंदुत्‍व के मुद्दे को पीछे रखकर फिर मराठी एजेंडा पर जोर दे सकती है. इसका मतलब यह नहीं है कि शिवसेना हिंदुत्‍व के मुद्दे से पूरी तरह अलग हो जाएगी. सेना मुस्लिमों और बौद्ध जैसे तबकों को अपने साथ लाकर महाराष्‍ट्र में ताकतवर क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर फिर पहचान हासिल कर सकती है. बता दें कि हिंदू राष्‍ट्रवाद की विचारधारा का जन्‍म महाराष्‍ट्र में ही माना जाता है. यह देश का इकलौता राज्‍य है, जहां दो प्रमुख दल हिंदुत्‍व के मुद्दे पर ही चुनाव लड़ते हैं.

पहली बार शिवसेना ने किसी ठाकरे को चुनाव में उतारा
महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव 2019 (Maharashtra Assembly Election 2019) के दौरान शिवसेना ने बहुत बड़ा बदलाव करते हुए पहली बार ठाकरे परिवार से किसी व्‍यक्ति को चुनाव में उतारा. शिवसेना ने अपने मुखिया उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के बड़े बेटे आदित्‍य ठाकरे (Aditya Thackeray) को वर्ली विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा. आदित्‍य ठाकरे के जरिये शिवसेना महाराष्‍ट्र के युवाओं में अपनी पकड़ को मजबूत करना चाहती है. शिवसेना ने आदित्‍य ठाकरे को मुख्‍यमंत्री प्रत्‍याशी के तौर पर पेश किया. पार्टी ने दावा किया बीजेपी के साथ ढाई-ढाई साल मुख्‍यमंत्री पर सहमति बन गई है. इस समझौते से फडणवीस के इनकार करने के बाद महाराष्‍ट्र में सियासी उठापटक का दौर शुरू हो गया. शिवसेना ने एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने के विकल्‍प पर काम करना शुरू कर दिया. इस योजना को धरातल पर उतारने का जिम्‍मा शिवसेना के राज्‍यसभा सदस्‍य संजय राउत को दिया गया.

शरद पवार को इन कारणों से भी मिला उभरने का मौका
संजय राउत की एनसीपी प्रमुख शरद पवार से नजदीकी और बीजेपी से कड़वाहट किसी से छुपी नहीं है. लोगों का मानना है कि बीजेपी ने फडणवीस को गैर-मराठा और ब्राह्मण के साथ ही ज्‍यादा अनुभव नहीं होने के बाद भी मुख्‍यमंत्री सिर्फ इसलिए बनाया था ताकि एकनाथ खडसे और पंकजा मुंडे जैसे 'बहुजन' नेताओं को हाशिए पर रखा जा सके. मराठा-कुनविस में फडणवीस को राज्‍य की सत्‍ता के शीर्ष पर बैठाने को लेकर खासी नाराजगी भी थी. इसी कारण शरद पवार के नेतृत्‍व में एनसीपी को फिर उभरने का मौका मिल गया. इसके अलावा शरद पवार को प्रवर्तन निदेशालय के नोटिस और फिर उन्‍हें पूछताछ के लिए कार्यालय बुलाने से जन-संवदेनाएं उनके पक्ष में चली गईं. वहीं, पवार ने सातारा में भारी बारिश के बाद भी एनसीपी नेता के पक्ष में जनसभा की. इसका मतदाताओं पर काफी असर पड़ा.

बाल ठाकरे की पूर्व मुख्‍यमंत्री वसंतराव नाइक से करीबी के कारण तब शिवसेना को 'वसंत सेना' कहा जाता था.


अलग-अलग दलों को समर्थन देती रही है शिवसेना
शिवसेना ने महाराष्‍ट्र में सरकार बनाने के लिए एनसीपी और कांग्रेस से बातचीत कर समय का एक चक्‍कर पूरा कर लिया है. दरअसल, अक्‍टूबर, 1966 में शिवसेना की शिवाजी पार्क में हुई रैली के दौरान कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता रामराव अदिक मंच पर मौजूद थे. बाल ठाकरे की तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री वसंतराव नाइक से करीबी के कारण तब शिवसेना को 'वसंत सेना' कहा जाता था. शिवसेना समय-समय पर अलग-अलग दलों के साथ खड़ी होती रही है. शिवसेना ने सियासी फायदे के लिए समय-समय पर मुस्लिम लीग, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया और कांग्रेस का साथ दिया है. जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल की घोषणा की तो शिवसेना ने इसका विरोध किया. वहीं, 1980 में रायगढ़ जिले से विधानसभा चुनाव के लिए मैदान में उतरे अब्‍दुल रहमान अंतुले का समर्थन किया. बाद में अंतुले महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री बने.

बीजेपी के मुताबिक, ज्‍यादा दिन नहीं चलेगा साथ
अब शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी के साथ सहमति बनाकर महाराष्‍ट्र की सत्‍ता पर काबिज होने की कोशिश में जुटी है. हालांकि, बीजेपी नेताओं का कहना है कि ये गठबंधन वैचारिक मतभेदों के कारण ज्‍यादा दिन नहीं चल पाएगा. शरद पवार जानते हैं कि बीजेपी और शिवसेना की सियासी जमीन महाराष्‍ट्र से दरक रही है. इससे एनसीपी को विस्‍तार और मजबूत क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर उभरने का सीधा मौका मिलेगा. एनसीपी को सरकार के कामकाज से नाराज मतदाताओं का फायदा मिला. शिवसेना और एनसीपी का राज्‍य के 57 विधानसभा क्षेत्रों में सीधा मुकाबला रहा. दोनों ही दल राज्‍य में अपनी साख मजबूत करने की कवायद में हैं. ऐसे में दोनों दलों का आपस में बातचीत करने का उद्देश्‍य बीजेपी को सत्‍ता से दूर रखना भर है. कांग्रेस का मानना है कि शिवसेना के साथ जाने पर अल्‍पसंख्‍यक समुदाय में उसके कोर वोट पर असर पड़ेगा, जहां असदुद्दीन ओवैसी की एमआईएम जैसी पार्टी भी सेंध लगाने की कोशिश में है.
(लेखक पत्रकार और 'द कजिंस ठाकरे: उद्धव, राज एंड द शैडो ऑफ देयर सेनाज' के लेखक हैं. इस किताब को मराठी में 'ठाकरे विरुद्ध ठाकरे' नाम से प्रकाशित किया गया है. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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First published: November 13, 2019, 12:55 PM IST
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