कोविड-19 से मिल्खा सिंह समेत कई कपल्स ने कुछ ही दिनों में खोया अपना साथी, क्या है कारण

हमारे व्यक्तिगत अनुभव और अध्ययन से यह पता चलता है कि पत्नी की मृत्यु के बाद पति की मृत्यु का खतरा 18 प्रतिशत होता है, जबकि इसकी उलट स्थिति में यह खतरा करीब 16 प्रतिशत होता है.

मनोचिकित्सक ज्योति कपूर ने कहा कि जीवनसाथी के निधन की खबर अक्सर ही उसके साथी को ‘ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम’ से ग्रसित कर देती है. यह हृदय की एक ऐसी अस्थायी स्थिति है हो काफी तनाव और अत्यधिक भावुक होने से पैदा होती है.

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    नई दिल्ली. भारत के महान फर्राटा धावक मिल्खा सिंह की पत्नी निर्मल कौर की कोविड-19 से मृत्यु होने के पांच दिन बाद सिंह का भी निधन हो गया. इस महामारी ने पूरे भारत को अपनी चपेट में लिया, जिसमें कई अन्य दंपती की भी जान चली गई. वे लोग दशकों से एक दूसरे के साथी थे, या शायद साथ में अपने जीवन का सफर शुरू किया था और हफ्तों के अंदर तथा कभी-कभी कुछ दिनों के अंतराल पर दुनिया को अलविदा कह गये.

    मनोचिकित्सकों ने इसके लिए एक शब्दावली-‘ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम’ दी है और महान सिंह दंपती संभवत: इसके प्रतीक हैं. कोविड-19 से 91 वर्ष की आयु में लंबी लड़ाई लड़ने के बाद भारत के महान खेल विभूतियों में शामिल सिंह का निधन शुक्रवार को चंडीगढ़ में हो गया. वहीं, उनकी पत्नी एवं राष्ट्रीय वॉलीबॉल खिलाड़ी रह चुकी निर्मल कौर का 13 जून को निधन हो गया था. उन दोनों का विवाह 58 साल पहले हुआ था और 65 साल पहले वे एक दूसरे से पहली बार मिले थे. उनकी तीन बेटियों और बेटे जीव मिल्खा सिंह ने अपने माता-पिता के सच्चे प्रेम और साहचर्य की सराहना की.

    कोरोना काल में कई दंपत्तियों ने ऐसे ही तोड़ा दम
    परिवार ने एक बयान में कहा, ‘‘उन्होंने बहुत हौसला दिखाया, लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था और शायद यह उनका सच्चा प्रेम और साहचर्य ही था कि दोनों ही लोग, हमारी मां निर्मल जी और अब पिता पांच दिनों के अंतराल पर गुजर गए.’’ इस तरह से निधन होने वाले लोगों में सिर्फ वे ही एकमात्र नहीं हैं.

    राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री के साथ भी हुआ ऐसा ही
    राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया (89) और उनकी पत्नी शांति पहाड़िया (पूर्व विधायक एवं राज्यसभा सदस्य) का निधन भी कुछ ही दिनों के अंतराल पर हुआ. पूर्व मुख्यमंत्री का निधन गुडगांव के अस्पताल में 20 मई को हुआ था, जबकि उनसे दो साल छोटी उनकी पत्नी का निधन उसी अस्पताल में तीन दिन बाद हुआ. उनके बेटे ओम प्रकाश पहाड़िया ने कहा, ‘‘वे दोनों जीवनभर साथ रहें और राजनीतिक रूप से सक्रिय रहें तथा एक साथ दुनिया को अलविदा कह गये.’’

    वरिष्ठ पत्रकार कल्याण बरूआ और नीलाक्षी भट्टाचार्य का भी कोविड से मई में गुड़गांव के अस्पताल में निधन हो गया. उनका भी निधन एक दूसरे से तीन दिन के अंतराल पर हुआ था. लंबे समय तक साथ रहने के बाद राजस्थान के बीकानेर निवासी दंपती ओम प्रकाश और मंजू देवी भी एक दूसरे से अलग नहीं रह सकें. पिछले साल नवंबर में 15 दिनों के अंतराल पर उन उनका निधन हो गया.

    क्या करें ऐसे मामले?
    ऐसे मामलों में, जिनमें किसी दंपती में एक का इलाज के दौरान निधन हो जाता है जबकि दूसरा अब भी रोग से उबर रहा होता है, उस बारे में मेडिकल विशेषज्ञों की यह सलाह है कि निधन की खबर जीवनसाथी की स्थिति खतरे से बाहर होने के बाद ही साझा की जाए. मुंबई के मनोचिकित्सक हरीश शेट्टी के मुताबिक निधन की खबर नहीं मिलने पर रोग से उबरने में मदद मिलती है.

    उन्होंने कहा, ‘‘जब दंपती में एक शारीरिक रूप से बहुत ही कमजोर हो जाता है तब उसे इस तरह की सूचना देने पर उसका मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ जाता है और स्थिति बहुत ही खराब हो जाती है.’’ शेट्टी ने कहा, ‘‘मैं उन टीमों में शामिल रहा हूं, जिसने जीवनसाथी को रोग से उबरने के बाद (दुखद) सूचना दी. परिवार, चिकित्सक और सलाहकार की मौजूदगी जरूरी है.’’

    साथी के निधन पर होता है मानसिक तनाव
    गुड़गांव की मनोचिकित्सक ज्योति कपूर ने कहा कि जीवनसाथी के निधन की खबर अक्सर ही उसके साथी को ‘ब्रोकेन हार्ट सिंड्रोम’ से ग्रसित कर देती है. यह हृदय की एक ऐसी अस्थायी स्थिति है हो काफी तनाव और अत्यधिक भावुक होने से पैदा होती है. उन्होंने कहा कि यह स्वाभाविक है कि दशकों तक साथ रहे दंपती के बीच भावनात्मक निर्भरता हो जाती है, जिसमें किसी एक का निधन हो जाने पर दूसरा काफी तनाव में आ जाता है.

    उन्होंने कहा, ‘‘हमारे व्यक्तिगत अनुभव और अध्ययन से यह पता चलता है कि पत्नी की मृत्यु के बाद पति की मृत्यु का खतरा 18 प्रतिशत होता है, जबकि इसकी उलट स्थिति में यह खतरा करीब 16 प्रतिशत होता है. हालांकि, कोविड-19 से कितनी संख्या में दंपती की मौत हुई है, इस बारे में कोई आंकड़ा नहीं है. लेकिन राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक महमारी के दौरान 3,261 बच्चे अनाथ हो गये.

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