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शहीद या पीड़ित : कोठारी बंधु, जिन्‍होंने राम मंदिर के लिए लगा दी पूरी जिंदगी

शहीद या पीड़ित : कोठारी बंधु, जिन्‍होंने राम मंदिर के लिए लगा दी पूरी जिंदगी

शहीद या पीड़ित : कोठारी भाई जिन्‍होंने राम मंदिर के लिए लगा दी पूरी जिंदगी

शहीद या पीड़ित : कोठारी भाई जिन्‍होंने राम मंदिर के लिए लगा दी पूरी जिंदगी

यह भारतीय राजनीति के इतिहास में एक असमान्‍य रूप से घटी सदी थी. किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि अगस्‍त 1990 में शुरू होने वाली घटना इस तरह से सामाजिक परिवर्तन करेगी और आजादी के बाद की स्‍थिति को पूरी तरह से बदलकर रख देगी.

    सुजीत नाथ

    दरवाजे के बाहर खड़े अभी हम किसी के आने का इंतजार ही कर रहे थे कि अंदर से ताला खोले जाने की आवाज आई. अंदर अंधेरा होने के कारण हमें कुछ दिख नहीं रहा था. तभी आवाज आई अंदर आ जाइए. ऊपर से किसी ने आवाज दी कि सीढ़ियों पर बचकर चलिएगा, थोड़ी सकरी हैं. लाल रंग का यह घर काफी पुराना था. इस तरह के मकान सौ साल पहले कोलकाता में व्‍यापारियों से लिए बनाए गए थे.

    बुराबार बाजार कोलकाता में मारवाड़ियों का दूसरा घर माना जाता था. राजस्‍थान के व्‍यापारी समुदाय के लोग सत्रहवीं शताब्‍दी में यहां धागे और कपड़े का कारोबार करने आए थे. अभी हम घर का मुआयना ही कर रहे होते हैं कि एक 40 साल की महिला आती है और कहती है, मैं पूर्णिमा कोठारी हूं. मैं राम और शरद की बहन हूं, जिन्‍होंने रामं मंदिर के निर्माण के लिए अपना जीवन लगा दिया.

    मंडल बनाम कमंडल
    यह भारतीय राजनीति के इतिहास में एक असमान्‍य रूप से घटी सदी थी. किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि अगस्‍त 1990 में शुरू होने वाली घटना इस तरह से सामाजिक परिवर्तन करेगी और आजादी के बाद की स्‍थिति को पूरी तरह से बदलकर रख देगी.

    वीपी सिंह की अगुवाई वाली राष्‍ट्रीय मोर्चा सरकार को एक साल से भी कम समय हुआ था लेकिन लोगों में सरकार के प्रति असंतोष बढ़ता जा रहा था. उधर हरियाणा के मजबूत नेता और उप प्रधानमंत्री देवीलाल की पार्टी जनता दल सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर रही थी. चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया था और इस इंतजार में थे कि कब फिजा उनकी तरफ का रुख करे और वह अपने पत्‍ते सबके सामने खोलें.

    जिस समय वीपी सिंह प्रधानमंत्री थे, उस समय विरोधाभासी फैसलों के चलते उनकी सरकार पर लगातार खतरा मंडरा रहा था. हालांकि एक प्रधानमंत्री के तौर पर वह एक सशक्‍त नेता थे. उनकी सरकार वामपंथियों के समर्थन पर चल रही थी. 1989 के आम चुनावों में बीजेपी अयोध्‍या लहर पर सवार थी और उसने चुनाव में सबसे ज्‍यादा 84 सीटों पर जीत हासिल की थी.

    भीतर और बाहर की चुनौती का सामना करने के लिए उस दौरान वीपी सिंह ने जनता पार्टी सरकार द्वारा गठित  मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया. अगस्त में उन्होंने सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों या ओबीसी के लिए 27% आरक्षण की घोषणा की.

    हिंदू निर्वाचन क्षेत्राेंं  में विभाजन को देखते हुए भाजपा ने राम मंदिर आंदोलन को हवा दी और मतदाताओं को अपनी तरफ करने के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर निर्माण के लिए रथ यात्रा की घोषणा कर दी.

    यह यात्रा 15 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ मंदिर से  शुरू की गई । इस  यात्रा को अगले 45 दिनों तक देश के अलग-अलग कोने से होते हुए 30 अक्‍टूबर को अयोध्‍या पहुंचना था.

    मंदिर आंदोलन का समर्थन करने के लिए आडवाणी ने फैसला किया था कि वह प्रतिदिन 300 किलोमीटर की यात्रा करेंगे, जिसमें छह सार्वजनिक सभाओं को संबोधित किया जाएगा.
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    दो भाई और उनका अधूरा वादा
    राम और शरद कोठारी नियमित रूप से बुराबार की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखा में जाया करते थे. 22 और 20 साल की उम्र के इन दोनों भाइयों ने आरएसएस की तीन साल की होने वाली ट्रेनिंग के दो साल बहुत ही बेहतरीन तरीके से पूरे किए थे. कई आरएसएस कार्यकर्ताओं की तरह ही राम और शरद ने भी विहिप के कारसेवकों के तरह ही अयोध्‍या में राममंदिर के निर्माण में अपनी सेवा देने का फैसला किया. 20 अक्‍टूबर 1990 को उन्‍होंने अपने पिता हीरालाल कोठारी को अयोध्‍या यात्रा की योजना के बारे में बताया.

    उनके पिता उन्‍हें इस यात्रा में भेजने के इच्‍छुक नहीं थे क्‍योंकि उनकी बेटी पूर्णिमा का विवाह दिसंबर में था. वो चाहते थे कि कम से कम एक भाई तो शादी समारोह में शामिल रहे. उस समय दोनों ही भाई अपने फैसले पर कायम रहे और उन्‍होंने यात्रा में जाने का फैसला किया.

    ‘मेरे पिता एक शर्त पर सहमत हुए कि दोनों भाई उन्‍हें हर दिन पत्र जरूर लिखेंगे. अयोध्या जाने से पहले, उन्होंने कई पोस्टकार्ड खरीदे ताकि वे पत्र लिख सकें; मैंने रोना शुरू कर दिया जब मैंने सुना कि मेरे दोनों भाई अयोध्या जाने वाले हैं.  पूर्णिमा कहती हैं, उन्होंने मुझसे वादा किया था कि वे वापस आकर मेरी शादी में शामिल होंगे. ’ 22 अक्टूबर को  राम और शरद अयोध्या के लिए एक ट्रेन में सवार हो गए.
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    बाबरी मस्‍जिद पर केसरिया झंडा
    अपने दोस्‍त राजेश अग्रवाल के साथ कोठारी भाई ट्रेन से वाराणसी तक ही जा सकते थे. अक्‍तूबर के तीसरे सप्‍ताह तक उत्‍तर प्रदेश सरकार ने अयोध्‍या में कार सेवकों को जुटने से रोकने के लिए ट्रेन पर रोक लगा दी थी. यही कारण है कि युवा कार सेवकों ने टैक्‍सी का सहारा लिया. लेकिन जल्‍द ही पुलिस ने उन्‍हें रोक लिया और वापस जाने को कहा. तीनों सेवक 30 अक्‍टूबर को 200 किलोमीटर की पैदल यात्राकर अयोध्‍या पहुंचे.  दोपहर तक अयोध्‍या में वाल्‍मीकि भवन के सामने मणि राम दास जी की चॉनी सड़क पर भीड़ तेज हो गई थी. पुलिस की चेतावनी के बावजूद कोठारी भाइयों का जत्‍था लगातार आगे बढ़ रहा था और उसने विवादित ढांचे के ऊपर चढ़कर भगवा ध्‍वज को ऊपर उठाने का फैसला कर लिया था.राजेश अग्रवाल याद करते हुए कहते है कि कोठारी भगवा ध्‍वज लिए मस्‍जिद के ठीक सामने खड़े थे. अयोध्‍या आंदोलन पर उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री मुलायम सिंह यादव की चेतावनी को यह एक सीधी चुनौती थी. क्‍योंकि यूपी के मुख्‍यमंत्री ने कहा था कि ‘वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता’.

    पुलिस ने 16 लोगों को मौत के घाट उतारा
     तीन दिन बाद, कार्तिक पूर्णिमा को दिन कारसेवक हनुमानगढ़ी के पास इकट्ठा हुए और उन्‍होंने विवादित ढांचे को दूर हटाने का फैसला किया. "राम और शरद कोठारी के नेतृत्व में हनुमानगढ़ी में सैकड़ों कार सेवक इकट्ठे हुए, तब  पुलिस बल ने उन पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी. राजेश अग्रवाल ने कहा कि 45 मिनट का वह मंजर मैं कभी भूल नहीं सकता क्‍योंकि पुलिस द्वारा इस तरह की हिंसा को मैंने पहले कभी नहीं देखा था. उस समय मेरा राम और शरद के साथ संपर्क टूट गया था.

    हिंदी दैनिक जनसत्‍ता के पत्रकार त्रियुग नारायण तिवारी जो उस समय इस पूरी घटना को कवर कर रहे थे वह बताते हैं कि जिला मजिस्‍ट्रेट राम शरण श्रीवास्‍तव ने जब कारसेवकों को विवादित स्‍थल की ओर जाने से रोक दिया तो वे सब पुलिस के विरोध में सड़क पर बैठ गए और उन्‍होंने भजन गाना शुरू कर दिया. उन्‍होंने बताया कि वह सभी धीरे-धीरे आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे लेकिन अचानक कुछ कारसेवक तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे.तिवारी ने कहा कि उसके बाद मुझे नहीं पता कि पुलिस ने गोलीबारी कब शुरू कर दी और गोलीबारी शुरू होने के बाद क्या हुआ. आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक पुलिस गोलीबारी में 16 लोगों की मौत हो गई. बाद में शरद और राम कोठारी का शव हनुमानगढ़ी के किनारे पड़ा मिला.

    जब लालू यादव ने आडवाणी की गिरफ्तारी के आदेश दिए
    23 अक्टूबर को, समस्तीपुर में आडवाणी के रथ को रोक दिया गया था और उस समय बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव के आदेश पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था.

    अब तक, उत्तर और पश्चिम भारत में मंडल विरोधी आंदोलन ने एक निश्चित आकार ले लिया था. जनता दल के नेता लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रहे थे. रामविलास पासवान, शरद यादव के साथ साथ दो युवा यादव नेता लालू और मुलायम सिंह  आसपास के हिंदी-राज्यों में अपने पैर जमाने में लगे हुए थे. जानकार बताते हैं कि जैसे ही आडवाणी की यात्रा पश्‍चिम से पूर्वी मार्ग की ओर बढ़ी वैसे ही स्‍थिति पूरी तरह से बदल गई.

    आडवाणी की यात्रा को बिहार में प्रवेश करने में अभी एक सप्‍ताह का समय बचा था. उसी समय दिल्‍ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने खुद को आग लगा ली. राजीव वीपी सिंह सरकार के फैसले का विरोध कर रहे थे . गोस्‍वामी इस हादसे में 80 प्रतिशत तक जल चुके थे लेकिन उन्‍हें बचा लिया गया था. बाद में वह दिल्‍ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष बने.  करीब 15 साल बाद पीलिया हो जाने के कारण उनकी मौत हो गई लेकिन तब इस ओर किसी का ध्‍यान तक नहीं गया.

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    राजनीति में एक नया युग
    आडवाणी की गिरफ्तारी के चलते   वीपी सिंह सरकार से 84 सांसदों वाली भाजपा ने अपने हाथ पीछे खींच लिए.

    दिल्ली में दूसरा गैर-कांग्रेसी  प्रयोग केवल 11 महीने तक चला.  चंद्रशेखर अपनी पार्टी का शुभारंभ करने के लिए जनता दल से अलग हो गए और राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई.

    लालू यादव बिहार में मुसलमानों और पिछड़े वर्ग के मसीहा बन गए.  समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिहं यादव नए अवतार के रूप में उभरे और उन्‍होंने मौलाना मुलायम के रूप में अपनी अलग छवि बनाई.कई सालों बाद मुलायम सिंह यादव ने कहा कि उनकी कार्रवाई आवश्‍यक थी, उन्‍होंने दोहराया, मुस्‍लिम समुदाय की आस्‍था को बनाए रखने और देश की एकता की रक्षा के लिए यह जरूरी था.

    क्या मेरे भाइयों के मारने वाले मर गए?

    "मेरे भाइयों ने मातृभूमि के लिए अपने जीवन का बलिदान किया. राम लल्ला के लिए उन्होंने खुशी से  मौत का गले लगा लिया. लेकिन दुर्भाग्य से इतने सालों में  लोग हमें भूल गए.

    पूर्णिमा कोठारी कहती हैं कि कुछ समय से मैं अपने आप से सवाल कर रही हूं कि क्‍या उनकी मौत बर्बाद हो गई."यदि नहीं, तो फिर हम अयोध्या में एक 'भव्य राम मंदिर' का इंतजार क्यों कर रहे हैं? "

    पूर्णिमा  बताती है कि,  मेरी मां सुमित्रा देवी और पिता हीरालाल का निधन हो गया. वह चाहते थे कि उनके बेटों ने जिस राम मंदिर के लिए जान दे दी उसे एक बार बनता हुआ देखें, अफसोस ऐसा नहीं हो सका. हमारे लिए, राम और शरद दोनों शहीद हैं और लोग हमेशा राम जन्मभूमि आंदोलन में उनके योगदान को याद करेंगे."

    आज भी मुझे वो पोस्‍टकार्ड याद है
    दिसंबर 1990 के पहले सप्ताह में,  कोठारी भाइयों की मृत्यु के एक महीने बाद, एक डाकिया आया और उसने मुख्‍य दरवाजे से एक पोस्‍टकार्ड अंदर सरका दिया. पूर्णिमा ने बताया कि यह खत शरद ने अपनी मौत से पहले ही लिख दिया था. "मैंने पत्र खोला और उसे पढ़ने के बाद पूरी तरह से टूट गई. उन्होंने मुझे, मां और बाबा का ख्याल रखने के लिए कहा था और मुझे चिंता नहीं करने के लिए कहा था क्योंकि वे मेरी शादी में शामिल होंगे."

    एक पखवाड़े बाद में, पूर्णिमा कोठारी की एक साधारण समारोह में शादी संपन्‍न हुई. उनकी मां, सुमित्रा देवी ने , 1999 में एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित एक लेख में कहा, "कार सेवा आंदोलन में शामिल कोई नेता ईमानदार नहीं था. उस समय आम लोगों को उनके राजनीतिक हित के लिए इस्तेमाल किया जाता था.

    "वीएचपी इंटरनेशनल के संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन कहते हैं, "किसी का बलिदान व्‍यर्थ नहीं जाएगा. न केवल राम और शरद कोठारी, लेकिन यह सभी कार सेवकों का मामला है. मैं उनसे वादा कर सकता हूं कि राम मंदिर का निर्माण अक्टूबर 2018 से शुरू होगा. इसे 'धर्म संसद' में घोषित किया गया था और अब कोई इसे रोक नहीं सकता है.

    पूर्णिमा और राजेश अग्रवाल अब राम-शरद कोठारी स्मृति समिति नामक संगठन चलाते हैं.  पूर्णिमा भी अपने परिवार के व्यवसाय की देखभाल करती हैं और अपनी बेटी के साथ रहती हैं.

    राजेश सवाल करते है कि "हर दिन हम एक नए चेहरे को देख रहे हैं जो राम जन्मभूमि आंदोलन के नेता होने का दावा कर रहे हैं. मैं उन सभी लोगों से पूछना चाहता हूं जहां अयोध्या में गोलीबारी हुई थी क्‍या वो वहां थे. "

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