एक के बाद एक करारी हार के बाद भी भाई-भतीजावाद छोड़ने को तैयार नहीं क्षेत्रीय पार्टियां

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: June 24, 2019, 4:51 PM IST
एक के बाद एक करारी हार के बाद भी भाई-भतीजावाद छोड़ने को तैयार नहीं क्षेत्रीय पार्टियां
बीएसपी सुप्रीमो मायावती पर भी भाई-भतीजावाद का आरोप लग रहा है

दूसरी पार्टियों पर भाई-भतीजावाद के आरोप लगाने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी के दो अहम पद अपने भाई आनंद कुमार और भतीजे आकाश आनंद को दे दिए. इसके साथ ही भाई-भतीजावाद वाली पार्टियों में एक और नाम जुड़ गया.

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दूसरी पार्टियों पर भाई-भतीजावाद के आरोप लगाने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी के दो अहम पद अपने भाई आनंद कुमार और भतीजे आकाश आनंद को दे दिए. इसके साथ ही भाई-भतीजावाद वाली पार्टियों में एक और नाम जुड़ गया. कांशीराम पर 'द लीडर ऑफ दलित्स' नामक किताब लिखने वाले राजनीतिक विश्लेषक बद्री नारायण कहते हैं "मायावती के इस कदम से बहुजन आंदोलन कमजोर होगा. कांशीराम पार्टी में परिवारवाद नहीं चाहते थे इसीलिए उन्होंने अपने परिवार से किसी को आगे नहीं बढ़ाया. लेकिन मायावती कांशीराम के रास्ते से भटक गई हैं."

लोकसभा चुनाव 2019 में क्षेत्रीय पार्टियों की बुरी स्थिति होने के बावजूद किसी भी पार्टी ने अपने परिवार से ऊपर उठकर काम करने का खाका नहीं खींचा. न तो अपने कार्यकर्ताओं को यह भरोसा ही दिलाया कि वे उनके परिवार वालों से ऊपर होंगे. रीजनल पार्टियां इतने झटके खाने के बाद भी संभलने को तैयार नहीं हैं. इन पार्टियों के नेताओं को अब भी अपने परिवार के सदस्यों के अलावा दूसरे पर विश्वास नहीं है. बीएसपी हो या एसपी या फिर आरजेडी और इंडियन नेशनल लोक दल, सभी अपने परिवार के सदस्यों को ही बढ़ाने में जुटे हुए हैं.

मायावती के फैसले को लेकर हैरानी
राजनीतिक विश्लेषकों को सबसे ज्यादा हैरानी मायावती के फैसले को लेकर हुई. क्योंकि वो खुद परिवारवाद को लेकर मुखर रहीं हैं. जानकार बीएसपी प्रमुख के ताजे फैसले को पार्टी और बहुजन आंदोलन के लिए घातक करार दे रहे हैं. मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को उपाध्यक्ष और भतीजे आकाश आनंद को पार्टी का राष्ट्रीय कोर्डिनेटर नियुक्त कर दिया है.

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लगातार गिरता जा रहा है पार्टी का ग्राफ
आपको बता दें कि बीएसपी सुप्रीमो मायावती यह फैसला तब ले रही हैं, जब पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है. 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव के बाद से बीएसपी यूपी की राजनीति में हाशिए पर जा रही थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुल पाया था. वहीं साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी 19 सीटों पर ही सिमट कर रह गई थी. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 10 सीटें मिली थीं.
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गठबंधन ना होता तो नहीं मिलतीं इतनी सीटें
यूपी की राजनीति को करीब से समझने वाले कुछ नेताओं का मानना है कि एसपी से अगर गठबंधन नहीं हुआ होता तो इस बार भी पार्टी का खाता खुलने में काफी दिक्कत होती. सपा की तर्ज पर ही बीएसपी भी परिवार के अलावा किसी और व्यक्ति पर विश्वास नहीं कर रही. बसपा में कांशीराम के समय के लगभग सभी नेता दूसरी पार्टियों में जा चुके हैं या फिर अपनी पार्टी बनाकर सियासत कर रहे हैं.

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दलित वोटरों पर कमजोर होती मायावती की पकड़
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मायावती की पकड़ कभी पूरे दलित समाज पर मजबूत थी, लेकिन बीजेपी ने इसमें सेंध लगा दी है. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी (सीएसडीएस) के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को सिर्फ 13.9 दलितों ने वोट किया था. जबकि बीजेपी को कुल दलित वोटों का 24 फीसदी हिस्सा मिला था. 2019 के चुनाव में भी बीजेपी की बंपर जीत में दलितों का योगदान कम नहीं है. बीजेपी ने गैर जाटव दलितों के साथ-साथ जाटवों में पैठ बनाने की कोशिश नहीं छोड़ी है. इसीलिए जाटव कम्युनिटी की कांता कर्दम को राज्यसभा सदस्य बनवाया और बेबी रानी मौर्य को राज्यपाल.

तब भाई-भतीजावाद पर ही आनंद को हटाया गया था!
बता दें कि कुछ समय पहले ही मायावती ने अपने भाई को भाई-भतीजावाद के आरोप लगने के बाद उपाध्यक्ष पद से हटा दिया था. मायावती ने तब मीडिया के सामने कहा था कि उनके ऊपर भाई-भतीजावाद का आरोप लगाया जा रहा था, जिसकी वजह से आनंद को उपाध्यक्ष पद से हटा दिया गया. ऐसे में एक बार फिर से सवाल उठ रहा है कि जिस आरोप के बाद मायावती ने अपने भाई को पद से हटा दिया था. अब दोबारा उसी पद पर क्यों नियुक्त कर दिया?

इन पार्टियों का भी परिवार पर ही फोकस!
मायावती अकेली नेता नहीं हैं जो पार्टी में परिवार को बढ़ावा दे रही हैं. समाजवादी पार्टी का गठन भी लोहिया के सिद्धांतों पर किया गया था, लेकिन मुलायम सिंह यादव ने उस सिद्धांत को हाशिये पर रखकर पार्टी को यादव परिवार की निजी कंपनी की तरह चलाया. पार्टी से लेकर सरकार तक में परिवार के ही लोग अहम पदों पर आसीन किए जाते रहे. अखिलेश यादव भी इस मोह से बाहर नहीं निकल पाए हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा प्रत्याशियों की लिस्ट देखकर इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.



वजूद बचाने की लड़ाई लड़ रही है इनेलो
यही हाल हरियाणा में देवीलाल परिवार के साथ हो रही है. देवीलाल की विरासत को अकेले संभालने वाले ओम प्रकाश चौटाला के पोतों में अब लड़ाई शुरू हो गई है. देवीलाल के दो बेटों अजय चौटाला और अभय चौटाला की रस्साकशी में हरियाणा की यह पार्टी अपना वजूद बचाने की लड़ाई लड़ रही है. चौधरी देवीलाल ने जिन सिद्वांतों और नारों के साथ इंडियन नेशनल लोकदल की स्थापना की थी, उनकी तीसरी पीढ़ी ने उन्हें लगभग खत्म कर दिया.

आरजेडी भी है पस्त
बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है. आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने जिस सामाजिक न्याय और गरीबों की आवाज बन कर राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया था वह पार्टी आज एक परिवार की प्राइवेट कंपनी बनती दिख रही है. लालू प्रसाद यादव ने भी पार्टी को अपने परिवार की संपत्ति समझ कर सगे-संबंधियों को भर लिया.

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परिवार मोह की वजह से ही भरोसेमंद और जमीनी स्तर के तमाम नेता एक के बाद पार्टी से नाता तोड़ते चले गए. अगर बात मायावती की करें तो जो भी भरोसेमंद नेता थे, वो अब उनका साथ छोड़ चुके हैं. कांशीराम के वक्त के ये वही नेता थे जिनका बीएसपी को जमीनी स्तर पर काफी मजबूत करने में बड़ा योगदान था. इतना ही नहीं कभी बसपा (BSP) को जिताने के लिए जमीनी तौर पर काम करने वाला बामसेफ (बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एंप्लाई फेडरेशन) भी अब बसपा के साथ नहीं है.
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First published: June 24, 2019, 3:05 PM IST
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