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कर्नाटक चुनाव: बीजेपी-कांग्रेस के प्रचार पर मायावती की चुप्पी के मायने?

D P Satish | News18Hindi
Updated: April 12, 2018, 12:13 PM IST
कर्नाटक चुनाव: बीजेपी-कांग्रेस के प्रचार पर मायावती की चुप्पी के मायने?
दो महीने पहले मायावती ने राज्य में कम से कम 6 रैलियां करने का वादा किया था. लेकिन, अभी तक एक भी रैली नहीं हुई.

जेडीएस जिसने बीएसपी के साथ गठबंधन का जोरशोर से प्रचार किया था. अब वो भी चुप हो गई है. चुनाव में अब बस एक महीने बचे हैं. लेकिन, राज्य में बीएसपी के ज्यादातर उम्मीदवारों ने अभी तक चुनाव प्रचार शुरू नहीं किया है.

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  • Last Updated: April 12, 2018, 12:13 PM IST
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कर्नाटक में चुनावी सरगर्मियों के बीच करीब दो महीने पहले बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती ने पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल सेक्युलर (JDS) अध्यक्ष एचडी देवगौड़ा से हाथ मिलाया था. बेंगलुरु में दोनों ने एक रैली को संबोधित भी किया. देवगौड़ा ने बीएसपी सुप्रीमो को कुल 224 में से 21 सीटें भी ऑफर की थीं. रैली में मायावती ने कहा था कि कर्नाटक चुनाव में उनकी पार्टी कांग्रेस और बीजेपी को शिकस्त देगी.

बीएसपी के 'हाथी' (चुनाव चिह्न) और जेडीएस के 'सूखी घास लिए महिला' (चुनाव चिह्न) के एक साथ आने को राज्य के मुख्य विपक्षी दल बीजेपी ने स्वीकार किया था. यहां तक की बीजेपी के सीएम उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा ने गुप्त रूप से यह बात स्वीकार की थी कि बीएसपी एंटी-बीजेपी दलित वोट को अपने पक्ष में करने में सक्षम है, जो चुनावी मैदान में बीएसपी के न होने पर कांग्रेस की तरफ जा सकती है. राज्य के कांग्रेस नेताओं ने भी ऐसी आशंका जाहिर की है कि मायावती अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी को फायदा पहुंचा सकती हैं.

कर्नाटक कांग्रेस के इंचार्ज केसी वेणुगोपाल ने खुले तौर पर मायावती पर हमला बोला था और उनकी पार्टी बसपा को बीजेपी की टीम 'बी' करार दिया था. हालांकि, दो महीने बाद राज्य में बसपा की कोई रैली नहीं हुई. दो महीने पहले मायावती ने राज्य में कम से कम 6 रैलियां करने का वादा किया था. लेकिन, अभी तक एक भी रैली नहीं की.


जेडीएस जिसने बसपा के साथ गठबंधन का जोरशोर से प्रचार किया था. अब वो भी चुप हो गई है. चुनाव में अब बस एक महीने बचे हैं. लेकिन, राज्य में बसपा के ज्यादातर उम्मीदवारों ने अभी तक चुनाव प्रचार शुरू नहीं किया है.

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, पिछले महीने गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव नतीजे के बाद लगता है कि मायावती ने अपना विचार बदल दिया हो. दरअसल, गोरखपुर-फूलपुर उपचुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन ने राज्य और केंद्र में सत्ताधारी पार्टी को करारी शिकस्त दी थी. उपचुनाव नतीजों के बाद 'हाथी' की 'साइकिल' पर सवारी की उम्मीद बढ़ी थी.

जेडीयू के पूर्व उपाध्यक्ष और चौधरी चरण सिंह के बेहद करीबी प्रोफेसर नरसिम्हाप्पा के मुताबिक, "यूपी उपचुनाव जीतने के बाद बसपा और सपा की उम्मीद बढ़ी है. मायावती को इसका एहसास हुआ है कि उनकी पार्टी बीजेपी को हरा सकती है. बसपा की मुख्य दुश्मनी बीजेपी से है. कांग्रेस से नहीं. इसलिए मायावती गैर-बीजेपी दलित वोट को अपने पक्ष में करने में दिलचस्पी नहीं ले रहीं. अगर राज्य में कांग्रेस को जीत मिल भी जाती है, तो इससे बसपा को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. इसलिए मायावती ने चुप्पी साध रखी है."

जब इस संबंध में कर्नाटक के बसपा नेताओं से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. इनमें से एक बसपा नेता ने कहा कि NEWS18 को बताया कि जेडीएस के साथ गठबंधन स्थानीय यूनिट ने नहीं किया था. ये गठबंधन लखनऊ में किया गया था. उन्होंने कहा, "हमें इसपर कुछ भी कहने की इजाजत नहीं है. वास्तव में हमें यह भी नहीं मालूम कि क्या चल रहा है. बहन मायवती कर्नाटक दौरे पर आने वाली थीं. अब तक तो ऐसी ही खबरें मिल रही हैं. हमें नहीं पता कि जेडीएस के साथ बसपा का गठबंधन जारी है या फिर टूट गया."जेडीएस के एक अन्य नेता का कहना है कि मौजूदा हालत को देखते हुए अगर मायावती ने चुप्पी साधने और तटस्थ का फैसला लिया है, तो ये बसपा का एक विवेकपूर्ण कदम माना जाएगा.

ऐसा नहीं है कि कर्नाटक चुनाव को लेकर सिर्फ मायावती ही चुप हैं, एमआईएम चीफ और हैदराबाद के सांसद अससुद्दीन ओवैसी और एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने भी चुप्पी साध रखी है. दोनों नेताओं ने पहले देवगौड़ा पर हमला बोला था. लेकिन, अब सीटों के बंटवारों और चुनाव प्रचार को लेकर कुछ भी नहीं बोल रहे.

एमआईएम पहले नॉर्थ कर्नाटक क्षेत्र के 50 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की योजना बना रही थी. जेडीएस सूत्रों के मुताबिक, सीटों के बंटवारे को लेकर यहां तक कि ओवैसी ने देवगौड़ा से संपर्क भी किया था, जिसे पूर्व पीएम देवगौड़ा ने ठुकरा दिया था.

जेडीएस ने फरवरी में एनसीपी को बेलगाम और बीजापुर जिले की 7 सीटें देने की पेशकश की थी. लेकिन, इसके बाद देवगौड़ा ने शरद पवार पर एंटी-कर्नाटक एकीकरण समिति (MES) के विधायकों के साथ जोड़-तोड़ करने का आरोप लगाया था. ऐसे में दो हफ्ते के अंदर ही जेडीएस-एनसीपी का गठबंधन टूट गया. सूत्रों का कहना है कि एनसीपी कभी भी चुनाव नहीं लड़ेगी, क्योंकि वो नहीं चाहती कि बीजेपी को किसी भी रूप में फायदा पहुंचे.


हालांकि, अभी भी जेडीएस का कहना है कि बसपा के साथ गठबंधन जारी रहेगा. देवगौड़ा का कहना है कि ओरिजनल प्लान में अभी किसी तरह का कोई बदलाव नहीं है. लेकिन, आगे इसे नहीं बढ़ाया जाएगा.

ऐसे में बीजेपी को उम्मीद है कि चुनाव में गैर-कांग्रेसियों से उसे फायदा पहुंच सकता है. गैर-बीजेपी गठबंधन जेडीएस भी अपनी चुनावी रणनीति पर तेजी से काम कर रही है. वहीं, दूसरी ओर कांग्रेस भी राहत महसूस कर रही है. पार्टी को उम्मीद है कि चुनाव में उसके वोटों का बंटवारा नहीं होगा.

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First published: April 12, 2018, 9:39 AM IST
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