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मायावती की इस चाह और दलित वोट बैंक के चलते सपा-बसपा ने कांग्रेस से बनाई दूरी

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Updated: January 16, 2019, 11:43 AM IST
मायावती की इस चाह और दलित वोट बैंक के चलते सपा-बसपा ने कांग्रेस से बनाई दूरी
मायावती, सोनिया गांधी और राहुल गांधी (फाइल फोटो)

80 के दशक में जब बीजेपी राष्ट्रीय पार्टी बनकर नहीं उभरी थी तब यूपी में बसपा ने कांग्रेस के पारंपरिक दलित वोट बैंक में सेंध लगाई थी. अगले 10 सालों में यूपी के दलितों का पूरा वोट कांग्रेस से बसपा की तरफ शिफ्ट हो गया, इसका असर पंजाब, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी नजर आया.

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  • Last Updated: January 16, 2019, 11:43 AM IST
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प्रांशु मिश्रा

मायावती और अखिलेश यादव ने 12 जनवरी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐलान कर दिया कि आगामी लोकसभा चुनाव और यूपी का अगला विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी मिलकर लड़ेंगी. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बसपा सुप्रीमो ने कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा जो कि कई लोगों को लिए चौंकाने वाला था. हालांकि अखिलेश काफी संभलकर बोल रहे थे.

इस प्रेस वार्ता के बाद सवाल उठने लग गए कि बीजेपी को हटाने के मकसद से तैयार इस गठबंधन के निशाने पर कांग्रेस कैसे आ गई? इसके पीछे मायावती का एक बड़ा राजनीतिक एजेंडा है जिसमें संभवतः कांग्रेस फिट नहीं होती है. बसपा सुप्रीमो ने अपने जन्मदिन पर आयोजित प्रेसवार्ता में भी कांग्रेस पर जमकर हमला बोला.



बसपा के कांग्रेस विरोध को डि-को़ करना उतना मुश्किल नहीं है. वर्तमान में बीजेपी- विरोधी राजनीति के तहत दोनों पार्टियां भले ही एक तरफ नजर आती हों लेकिन कई मौकों पर कांग्रेस और बसपा के मतभेद सामने आ चुके हैं.



80 के दशक में जब बीजेपी राष्ट्रीय पार्टी बनकर नहीं उभरी थी तब यूपी में बसपा ने कांग्रेस के पारंपरिक दलित वोट बैंक में सेंध लगाई थी. अगले 10 सालों में यूपी के दलितों का पूरा वोट कांग्रेस से बसपा की तरफ शिफ्ट हो गया, इसका असर पंजाब, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी नजर आया.

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वर्तमान में राष्ट्रीय पार्टी बन चुकी बसपा के पास यूपी में सम्मानजनक आधार है लेकिन अन्य राज्यों में इसने जो जगह बनाई थी वह धीरे-धीरे खत्म हो चुकी है और मायावती अभी भी इस हार से उबरने की कोशिश में जुटी है.

पूरे देश की बात करें तो बसपा और कांग्रेस दोनों की नजर दलितों के वोट पर है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान चुनाव में कांग्रेस और बसपा के बीच लंबे वक्त तक चली चर्चा के बाद भी बात नहीं बन पाई थी. कांग्रेस ने सीटों को लेकर बीएसपी की मांग ठुकरा दी थी.

पिछले साल हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जेडीएस और बसपा ने चुनाव पूर्व गठबंधन किया था जिसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा था. आखिर में बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए कांग्रेस ने जेडीएस के साथ गठबंधन की सरकार चलाने का फैसला किया. छत्तीसगढ़ में भी माना जा रहा था कि बसपा और अजीत जोगी की पार्टी के गठबंधन का कांग्रेस को नुकसान होगा, हालांकि ऐसा नहीं हुआ.

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वोटबैंक की लड़ाई में दो पार्टियों का सिर्फ एंटी-आरएसएस और एंटी बीजेपी होना उन्हें एक मंच पर लाने के लिए काफी नहीं है. 2019 की रेस में मायावती ने अपने एंटी-कांग्रेस एजेंडे एक बार फिर जिंदा करने की कोशिश की है.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री पद के लिए मायावती खुद को नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के विकल्प के रूप में पेश करना चाहती हैं. इस वजह से वह कांग्रेस और बीजेपी पर लगातार हमले कर रही हैं. राष्ट्रीय स्तर पर इन हमलों का क्या असर पड़ता है यह तो नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा.

रोचक बात यह है कि कांग्रेस के खिलाफ बिगुल फूंकने के बाद भी सपा-बसपा गठबंधन ने कांग्रेस की पारंपरिक रायबरेली और अमेठी सीटों पर चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है. इन सीटों पर राहुल गांधी और सोनिया गांधी चुनाव लड़ते है. हो सकता है कि एंटी-कांग्रेस एजेंडे के बावजूद मायावती चुनाव के बाद की स्थितियों के लिए भी गुंजाइश बचाए रखना चाहती हैं.

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First published: January 16, 2019, 9:46 AM IST
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