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Opinion| मायावती ने बताई बस कांग्रेस की ख़ामी, पर महागठबंधन पर नहीं फेरा पानी

News18.com
Updated: October 4, 2018, 6:39 PM IST
Opinion| मायावती ने बताई बस कांग्रेस की ख़ामी, पर महागठबंधन पर नहीं फेरा पानी
मायावती (फाइल फोटो)

मायावती की उन राज्यों में हार और जीत के बीच का अंतर बन सकती है, जहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच मार्जिन कम है. कांग्रेस की राज्य इकाइयां जहां मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ गठबंधन को लेकर उत्सुक थीं, जबकि राजस्थान के स्थानीय नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

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भवदीप कांग
चुनाव से पहले गठबंधन का आधार डर हो सकता है, लेकिन मायावती इसका सामना करने के लिए समर्थ दिखती हैं. बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों के मुकाबले कांग्रेस को ज्यादा डरा दिया है, जोकि बसपा सुप्रीमो मायावती के गेम प्लान और राहुल गांधी की अल्पकालिक रणनीति के बीच के विरोधाभास को बताती है.

मायावती उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए 'बुआ भतीजा' सपा-बसपा गठबंधन के लिए कड़ी मेहनत करने की स्थिति में हैं, लेकिन मुहरबंद नहीं. अपने राज्य के बाहर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन लंबे समय तक फायदे के लिए उचित नहीं उठराया जा सकता.

मायावती के झटके में भी यह फायदा देख रही है कांग्रेस

कांग्रेस और बीएसपी स्वाभाविक सहयोगी नहीं हैं, क्योंकि वे एक समान सामाजिक समूहों से समर्थन हासिल करना चाहती हैं. इससे अलग एसपी और बीएसपी का अलग वोट बैंक आधार है, जिस कारण उनका गठबंधन ज्यादा आसान लगता है. अल्पसंख्यक वोटबैंक पर उन्होंने छेड़छाड़ जरूर की, लेकिन उसमें विजेता रहे.

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मायावती ने देशभर में चुनाव लड़कर छोटे छोटे वोट बैंक के जरिये महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया है. एक विशेष समुह है, जिसमें उनका वोटबैंक फिक्स है. ऐसे में जिन राज्यों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर है, वहां वह निर्णायक साबित हो सकती हैं.मायावती की उन राज्यों में हार और जीत के बीच का अंतर बन सकती है, जहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच मार्जिन कम है. कांग्रेस की राज्य इकाइयां जहां मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ गठबंधन को लेकर उत्सुक थीं, जबकि राजस्थान के स्थानीय नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

मायावती फिलहाल बड़ी पार्टियों की जगह राज्य के क्षेत्रीय खिलाड़ियों को तरजीह दे रही हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये गठबंधन उन्हें कांग्रेस के गठबंधन से ज़्यादा फायदा पहुंचाने वाला है. उन्होंने छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की जनता कांग्रेस और राजस्थान में आईएनएलडी के साथ करार किया है, कर्नाटक में उनका जेडी (यू) के साथ गठबंधन है और महाराष्ट्र में वह एनसीपी के साथ बातचीत कर रही हैं.

मध्य प्रदेश में उनका 6.3% वोट प्रतिशत दिखने से कहीं ज्यादा बड़ा है, क्योंकि यह भौगोलिक रूप से केंद्रित है और इसी की वजह से वह 2013 में 4 सीटें जीतने में सफल हो पाई थीं. और जो सबसे ज़रूरी बात है कि इनमें सिर्फ राज्य में 15 फीसदी आबादी वाली अनुसूचित जातियां ही नहीं, बल्कि ओबीसी वोटर्स भी शामिल हैं. उसके पास राज्य में विकास करने की संभावना है और वह इसे बखूबी जानती हैं.

कांग्रेस जो कि मान कर चल रही थी कि 2013 में बसपा के साथ गठबंधन के बाद उसने 41 सीटें जीत लीं थीं, उसी तरह उसे इन चुनावों में भी फायदा मिलने वाला है. पार्टी के नेताओं ने स्वीकार किया कि वे 15 सीटों से अधिक सीटें लाने के इच्छुक थे, मायावती ने भी इस ऑफर को लेकर दावा किया था. आखिरी मिनट तक, एमपी कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ उनकी 22 उम्मीदवारों की अपनी पूर्व-सूची को खारिज करते रहे और दावा कर रहे थे कि एक-एक सीट पर बातचीत चल रही है.

वैसे ही छत्तीसगढ़ में जहां दलितों की 11.6 प्रतिशत जनसंख्या है, वहां भी मायावती के हिस्से में 4.3 वोट शेयर (और एक विधायक) हैं. 2013 में कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन ने भाजपा की सीटें कम करके 11 कर दी थीं और बीजेपी को सरकार बनाने से रोक दिया था.

कांग्रेस को रोना रोना है. यह भी कहा जा रहा है कि महीनों से लगातार जांच एजेंसियों के उनके परिवार की संपत्तियों पर हो रही जांच के कारण मायावती बीजेपी के दबाव में हैं. सिर्फ दिग्विजय सिंह ने अब तक यह बात कहने की हिम्मत की है. मायावती ने कांग्रेस के जातिवादी मानसिकता पर भी वार किया है कि अभी भी पार्टी ऊपरी जातियों के अधीन है.

जो भी हो ऐसा साफ समझ आ रहा है कि मायावती राजनीतिक कारणों की वजह से पहले ही इस फैसले को लेकर अपना मन बना चुकी थीं. साथ ही, वह बीएसपी के साथ-साथ सोनिया और राहुल गांधी के 'ईमानदार' इरादों के बारे में अच्छी बातें कहकर अपने दांव पर बचकर खेल रही थीं.

विधानसभा चुनावों के विरोध में लोकसभा में कांग्रेस के साथ सहयोग करने के लिए मायावती अधिक खुल सकती हैं. उनके यूपी में पार्टी को समायोजित करने की संभावना है, इसी आधार पर वह भाजपा के ऊंची जाति के वोटों में काट पाएंगी. इसके अलावा, चुनाव के बाद राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की संभावना नज़र आ रही है.

मतदान की गिनती उतनी भी आसान नहीं है जितनी कि दिख रही है. गठबंधन का आधार है कि वह एक उम्मीदवार के पीछे कई पार्टियों के वोट इकट्ठा करता है और सीट जीतने की संभावना को बढ़ाता है.

लेकिन, जैसा ही ऊपर कहा गया है ऐसा हमेशा नहीं हो सकता कि वोट शिफ्ट हो पाएं. एक छोटी पार्टी बड़ी पार्टी के समर्थन से बहुदलीय पार्टियों प्रतियोगिता में ज़्यादा सीटें जीत सकती है, लेकिन ऐसे लाभ अल्पकालिक ही होंगे यह एक तथ्य बीएसपी नेताओं को अच्छी तरह से पता है.

मायावती की लोकसभा और विधानसभा चुनावों को लेकर रणनीति बिल्कुल अलग है. ऐसे में बीजेपी के लिए विपक्षी एकता में हो रही गिरावट का जश्न मनाने के लिए बहुत जल्दी है.

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है. यहां व्यक्त विचार उनके निजी है.

 

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First published: October 4, 2018, 6:38 PM IST
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