डेटा प्राइवेसी से मुंबई बम ब्लास्ट तक, इस रिटायर्ड जज के काम की कायल रही है हर सरकार

डेटा प्राइवेसी से मुंबई बम ब्लास्ट तक, इस रिटायर्ड जज के काम की कायल रही है हर सरकार
जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा जो दशकों से सरकारों के पसंदीदा बने हुए हैं.

पिछले 26 सालों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें आती रहीं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बीएन श्रीकृष्णा सभी पार्टियों के लिए भरोसेमंद बने रहे.

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देबयन रॉय
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बीएन श्रीकृष्णा को डेटा प्रोटेक्शन कानून का ड्राफ्ट तैयार करने के लिेए नियुक्त किया था. तब यही सोचा गया था कि इस कानून के जरिए सुप्रीम कोर्ट में आधार की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले सभी मामलों और सवालों का समाधान किया जा सकेगा.

पिछले 26 सालों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें आती रहीं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ये पूर्व जज सभी पार्टियों के लिए भरोसेमंद बने रहे.

ये सिलसिला 1993 से शुरू हुआ सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज बीएन श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में जब एक जांच आयोग का गठन किया गया. इस आयोग को 1992, 1993 में हुए दंगों में शामिल सभी तथ्यों की जांच का जिम्मा सौंपा गया. आयोग को इन दंगों में शामिल लोगों और संगठनों की भी जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई.
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51 साल के जस्टिस श्रीकृष्णा ने सबूतों की जांच शुरू की, लेकिन 1995 में शिवसेना-बीजेपी सरकार ने आयोग की जिम्मेदारियों का विस्तार करते हुए उसे 1993 मुबंई ब्लास्ट की जांच का भी जिम्मा सौंप दिया. लेकिन 1996 में बीजेपी-शिवसेना ने ही आयोग को निर्धारित समय में काम पूरा न करने के नाम पर भंग कर दिया. हालांकि ये फैसला ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका, क्योंकि तात्कालिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राज्य सरकार को फिर से आयोग के गठन के लिए चिट्ठी लिखते हुए नर्देश जारी किए.

आज दो दशकों के बाद भी जस्टिस श्रीकृष्णा अहम आयोगों के प्रतिनिधी के तौर पर पहली पसंद बने हुए हैं. 2017 में श्रीकृष्णा कमिटी को डेटा सिक्योरिटी मुद्दों के लिए ड्राफ्ट जारी करने जिम्मेदारी सौंपी गई. कमिटी ने भारत में लगातार बढ़ रहे डिजिटल इकोनॉमी के तहत पर्सनल डेटा की सुरक्षा और निजता को बनाए रखने की विश्वसनीयता को लेकर एक फ्रेमवर्क बनाया.

कांग्रेस और बीजेपी के अलावा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज तेलंगाना मामले में भी एन. चंद्रबाबू नायडू की सरकार द्वारा जस्टिस श्रीकृष्णा की कमिटी को आंध्र प्रदेश की स्थिति का जायजा लेने के लिए नियुक्त किया गया था.

कमिटी ने आंध्र प्रदेश के मुद्दे पर विस्तार से आकलन किया और लगभग हर वर्ग के लोगों से अलग राज्य की मांग पर राय ली गई. कमिटी को करीब एक लाख याचिकाएं, राजनितिक पार्टियों और संगठनों की राय मिली. कमिटी ने आम जनता और राजनीतिक पार्टियों से सलाह करके समाज के हर वर्ग जैसे महिला, बच्चे, छात्रों, ओबीसी, एससी. एसटी पर पड़ने वाले प्रभावों का भी जायजा किया. कमिटी ने अपनी रिपोर्ट 6 जनवरी 2011 को जारी की.

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जस्टिस श्रीकृष्णा ने उस मामले की भी जांच की थी, जब 19 फरवरी 2009 को मद्रास हाईकोर्ट में बार काउंसिल के सदस्यों ने कोर्ट का अनिश्चितकाल के लिए बहिष्कार कर दिया था. दरअसल बार काउंसिल मेंबर्स ने श्रीलंका में हो रहे तमिलों के नरसंहार के विरोध में ऐसा किया था. हालांकि इस मामले में जस्टिस को पुलिस की मदद दी गई थी.

अब इन सबके बाद एक बार फिर जस्टिस श्रीकृष्णा को बीजेपी सरकार ने डेटा प्रोटेक्शन कानून की ड्राफ्ट तैयार करने और आईसीआईसीआई बैंक की मैनेजिंग डायरेक्टर चंदा कोचर के खिलाफ स्वतंत्र जांच के लिए नियुक्त किया है. सुप्रीम कोर्ट के ये पूर्व जज मानवाधिकार और रिफ्यूजी मामलों में दिलचस्पी रखते हैं, लेकिन फाइनेंस और टेक्नोलोजी में भी इनकी पूरी निपुणता है.
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