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ताकि खून के बिना किसी की जान न जाए! 21000km पैदल चलेंगे किरन, ब्लड डोनेशन के लिए कर रहे हैं जागरूक

वह जिस भी नए शहर में जाते हैं तो सोशल मीडिया के जरिए जिसे भी पता चलता है वह उनसे संपर्क करता है.

वह जिस भी नए शहर में जाते हैं तो सोशल मीडिया के जरिए जिसे भी पता चलता है वह उनसे संपर्क करता है.

अपनी यात्रा के दौरान किरन ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलने की कोशिश करते हैं. वह लोगों को ब्लड डोनेशन के बारे में बताते ...अधिक पढ़ें

‘दिसंबर 2016. मेरे पास एक कॉल आता है. इसमें बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ के रायपुर के रहने वाले एक शख्स को ब्लड की जरूरत है. शख्स काफी गरीब परिवार से है. ब्लड मिल जाएगा तो उसकी जान बच जाएगी. मैंने तुरंत ब्लड डोनेट किया और मरीज के परिवार से मिला. उनसे बातचीत के दौरान जो बात मुझे पता चली, उसने मुझे पूरी तरह से अचंभित किया और आज जो मैं कर रहा हूं उसके लिए मोटिवेट भी किया. मुझे फोन करने वाले शख्स ने मरीज के परिवार से मेरे ब्लड के बदले 1500 रुपये ले लिए थे. इससे बुरा ये था कि उसकी पत्नी ने प्रॉस्टीट्यूशन करके मेडिकल बिल चुकाया था. इस घटना ने मुझे झकझोर दिया और मैंने Simply Blood की शुरुआत की.’

यह कहना है किरन वर्मा का जिन्होंने ब्लड डोनेशन के लिए अवेयरनेस फैलाने के लिए तिरुवनंतपुरम से 28 दिसंबर 2021 से 21000 किमी की यात्रा शुरू की है. उनकी कोशिश है कि 31 दिसंबर 2025 के बाद किसी भी शख्स की खून के अभाव में मौत न हो.

kiran verma

वह एक दूसरी घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं, 14 साल के एक बच्चे मयंक के लिए मैंने ब्लड डोनेट किया. वह कैंसर से जूझ रहा था. 2 महीने बाद उसके पिता का फोन आता है कि मयंक नहीं रहा. जिस दिन उसकी मौत हुई, उसे प्लेटलेट नहीं मिल पाया था और जान चली गई. दिल्ली में करीब 2 करोड़ लोग रहते हैं. लेकिन, एक भी शख्स वहां प्लेटलेट डोनेट करने नहीं पहुंचा.

पैदल जाएंगे देश के कोने-कोने में
इन घटना को देखते हुए किरन देश को ब्लड डोनेट करने के लिए जागरूक करने निकले हैं. वह करीब 2 साल तक देश के कोने-कोने में पैदल जाएंगे और लोगों को जागरूक करेंगे. उनका मानना है कि अगर किसी को ब्लड की जरूरत है तो चाहें जो भी मेडिकल रीजन हो तो कोई दूसरा मेडिकल अल्टरनेटिव उसके लिए नहीं हो सकता. उसे सिर्फ ब्लड चाहिए और वही उसकी जान बचा सकता है जो ब्लड दे सकता हो.

वह कहते हैं, आर्टिफिशियल ब्लड पर लंबे समय से काम चल रहा है, लेकिन अभी भी ये अपने प्रारंभिक स्तर पर ही है. इस रिसर्च को पूरा होने में भी लंबा समय लगेगा. तब तक लोगों को ब्लड डोनेट करना होगा. चाहें अपने दोस्त को करें, रिश्तेदार को करें या किसी अनजान शख्स को. लेकिन, जान बचाने के लिए ब्लड डोनेट करने का कोई ऑप्शन नहीं है.

जब 7 साल के थे, मां का निधन हो गया
किरन जब 5 साल के थे तो उन्होंने ब्लड डोनेशन के बारे में पहली बार सुना था. उस समय उनकी मां कैंसर से जूझ रही थीं. उन्होंने देखा है कि किस तरह उनके पिता ब्लड के लिए संघर्ष करते थे. जब वह 7 साल की उम्र में थे तो उनकी मां का निधन हो गया. अपने करीबी को खोने का दर्द उस समय जाना. 18 साल की उम्र में उन्होंने ब्लड डोनेट करना शुरू कर दिया. पहली बार अपने एक टीचर को ब्लड डोनेट किया और इसके बाद तो कारवां बढ़ता ही गया.

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जल्द ही वह एक वॉलंटियर ग्रुप से जुड़ गए. यह वह दौर था जब सोशल मीडिया उतना एक्टिव नहीं था. उसके जरिए वह लोगों को ब्लड डोनेट किया करते थे. लेकिन, दिसंबर 2016 की घटना ने उन्हें अब इस अभियान को बड़ा करने के लिए प्रेरित किया.

वह कहते हैं, रायपुर वाली फैमिली के बारे में जानने के बाद मैंने अपनी पत्नी को सब कुछ बताया. उसने कहा कि अगर तुम प्रॉब्लम सॉल्व कर सकते हो तो सॉल्व करो. और अगर नहीं कर सकते हो तो रोने का कोई मतलब नहीं है. बस यहीं से मैंने निर्णय लिया कि मैं जॉब छोड़ दूंगा और ब्लड डोनेशन के लिए जागरूकता का काम फुल टाइम करूंगा.

स्थापित किया Simply Blood
किरन ने इसके बाद Simply Blood की स्थापना की. इसके पीछे उनका मकसद ब्लड डोनर्स को जोड़ना, लोगों को जागरूक करना और ऐसा माहौल बनाना जिसमें किसी को भी ब्लड के लिए इंतजार न करना पड़े. इसके लिए उन्होंने बकायदा एक वेबसाइट डिजाइन कराया, मोबाइल ऐप बनाया और वॉट्सऐप ग्रुप क्रिएट किया.

किरन का दावा है कि भारत में हर साल करीब 15 मिलियन यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ती है. हालांकि, वह इसके लिए हमारे सोशल एटिट्यूड को दोषी मानते हैं, जिसमें ब्लड डोनेशन का कल्चर डेवलप नहीं किया गया.

लोगों में डोनेशन को लेकर गलत धारणा है
वह कहते हैं, कोविड-19 के दौर में प्लाज्मा को लेकर किसी तरह की स्थिति बनी थी, किसी से नहीं छिपा है. मुझे खुद हजारों कॉल आए. ढेरों लोग जो कोविड-19 से ठीक हो गए थे और प्लाज्मा डोनेट करने की स्थिति में थे, वह दूसरों को प्लाज्मा देने के लिए अनिच्छुक दिखे क्योंकि उनमें इसे लेकर गलत धारणा है. ऐसे में मैंने तय किया कि अब जमीन पर उतरकर लोगों को जागरूक करने की जरूरत है. इसलिए मैं पूरे भारत में यात्रा करके लोगों को जागरूक करने के लिए निकला हूं.

एक दिन में 30 किमी की यात्रा करते हैं
अपनी यात्रा के दौरान किरन ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलने की कोशिश करते हैं. वह लोगों को ब्लड डोनेशन के बारे में बताते हैं और जागरूक करते हैं. वह एक दिन में करीब 30 किमी की यात्रा करते हैं. उन्हें उम्मीद है कि 2 साल में वह 210000 किमी की यात्रा पूरी कर लेंगे. उनका मानना है कि हमें 5 मिलियन ब्लड डोनर्स की और जरूरत है. अगर मेरी बातों के असर से हर जिले में मुट्ठी भर लोग भी इसमें शामिल होते हैं तो इस गैप को भरा जा सकता है.

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वह कहते हैं, सोशल मीडिया से उन्हें बहुत सपोर्ट मिलता है. वह जिस भी नए शहर में जाते हैं तो सोशल मीडिया के जरिए जिसे भी पता चलता है वह उनसे संपर्क करता है और बहुत ही अच्छे से होस्ट करता है. इस तरह एक सामान्य रूटीन उनका चल रहा है. उनका मानना है कि जिस तरह से हम पोलिया के खिलाफ जीते, उसी तरह एक दिन ऐसा आएगा कि किसी की भी मौत ब्लड की कमी से नहीं होगी.

दिल्ली के रहने वाले किरन अभी तक गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, पुडुचेरी, गोवा, महाराष्ट्र और दमन-दीव की यात्रा कर चुके हैं, फिलहाल वह राजस्थान में हैं.

Tags: Blood Donation, News18 Hindi Originals, Plasma donation

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