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सोनिया गांधी से मुलाकात होगा पहला कदम! 'बड़ी भूमिका' के लिए ये है ममता बनर्जी की रणनीति

राजनीति की बेहतर समझ के बावजूद ममता बनर्जी के लिए उत्तर भारत की राजनीति पर पकड़ बनाना आसान नहीं होगा. (फाइल फोटो: PTI)

राजनीति की बेहतर समझ के बावजूद ममता बनर्जी के लिए उत्तर भारत की राजनीति पर पकड़ बनाना आसान नहीं होगा. (फाइल फोटो: PTI)

Mamata Banerjee in Delhi: राज्य स्तर का चुनाव सीएम बनर्जी के लिए सियासी से ज्यादा निजी हो गया है. बंगाल जीतने के बाद भी वे अभी उस उग्र झगड़े से उबर नहीं पाई हैं, जिसका उन्होंने सामना किया है. बनर्जी के करीबियों ने बीजेपी (BJP) को सबक सिखाने के लिए उनकी बेचैनी देखी है.

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    (पल्लवी घोष)

    नई दिल्ली. पश्चिम बंगाल (West Bengal) की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दिल्ली में हैं. उनकी इस यात्रा को 2024 के लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है. इसके अलावा खुद बनर्जी भी आगामी चुनाव को लेकर खासी सक्रिय नजर आ रही हैं. दरअसल, इसके दो कारण नजर आते हैं और इन कारणों के तार हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Election) से जुड़े हैं. जहां पर चुनाव आयोग और पार्टियों के लिए जंग भले ही पूरी हो गई हो, लेकिन ममता के लिए रण जारी है.

    राज्य स्तर का चुनाव सीएम बनर्जी के लिए सियासी से ज्यादा निजी हो गया है. बंगाल जीतने के बाद भी वे अभी उस उग्र झगड़े से उबर नहीं पाई हैं, जिसका उन्होंने सामना किया है. बनर्जी के करीबियों ने बीजेपी को सबक सिखाने के लिए उनकी बेचैनी देखी है. निजी कारण अब उनकी राजनीतिक समझ से बड़ा हो गया है.

    उनके लिए यह लगभग करो या मरो की स्थिति है, जैसी बंगाल में 2011 के वामपंथ के खिलाफ थी. लेकिन बनर्जी इस बात को जानती हैं कि हर चीज उनके पक्ष में नहीं है. जो भी यह कहते हैं कि मोदी जैसा सीएम अगर पीएम बन सकता है, तो वे क्यों नहीं? इसमें कुछ बुनियादी अंतर हैं.

    पहला, तो वे बीजेपी जैसी किसी बड़ी पार्टी से नहीं आती हैं. दूसरा, वे भाषा से जुड़ी परेशानियों का सामना करती हैं और किसी गैर-उत्तर भारतीय के लिए प्रधानमंत्री बनना दुर्लभ सी बात है. देव गौड़ा, नरसिम्हा राव का नाम इनमें है, लेकिन वे अलग थे. उनके पास दूसरी पार्टियों का समर्थन था या वे राव के मामले में कांग्रेस जैसे बड़े दल से आते थे.

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    बनर्जी इस बात को जानती हैं. इसी के चलते कांग्रेस से संबंध खराब होने के बावजूद उन्होंने पार्टी से संपर्क बनाने का फैसला किया है. लगभग 6 सालों के बाद सोनिया गांधी के साथ मुलाकात इस क्रम को तोड़ सकती है. सोनिया से पहले बंगाल की सीएम कमलनाथ, आनंद शर्मा और अभिषेक मनु सिंघवी से मिल चुकी हैं. यूथ कांग्रेस में नाथ और शर्मा उनके साथी रह चुके हैं. बनर्जी भी उन्हें यह बता चुकी हैं कि कांग्रेस अब मुख्य भूमिका नहीं निभा सकती.

    बनर्जी 2004 की सोनिया गांधी बनना चाहती हैं, जिन्होंने एनसीपी और डीएमके जैसी पार्टियों के साथ गठबंधन बनाया था. लेकिन यहां एक बात का फर्क है. एक ओर गांधी को पीएम बनने की कोई महत्वकांक्षा नहीं थी. वहीं, बनर्जी पीएम बनना चाहती हैं. सूत्र बताते हैं कि वे खुद को राष्ट्रीय भूमिका देने की दिशा में तैयार कर रही हैं. पहला कदम बगैर सांसद हुए भी तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल प्रमुख के अध्यक्ष के तौर पर उनकी नियुक्ति थी. वे दिल्ली की राह सुनिश्चित करना चाहती थीं.

    वहीं, बंगाल सीएम के हाथों से समय निकला जा रहा है और नवंबर में उनका विधायक चुना जाना जरूरी है. बनर्जी यह जानती हैं कि बंगाल के बाहर उन्हें खुद के ऊपर से बाहरी का टैग हटाना होगा. अन्य राज्यों में चुनाव लड़ने की कोशिशों के बावजूद टीएमसी बंगाल का दल होने का टैग दूर नहीं कर पाई है.

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    इधर, बनर्जी राष्ट्र के मामले में अपनी समझ बढ़ाने और खुद को प्रदर्शित करने के लिए यूपी और दक्षिण के दौरे पर विचार कर रही हैं. इसके अलावा सूत्र बताते हैं कि बनर्जी अपनी हिंदी पर काम कर रही हैं. दिल्ली में मीडिया को संबोधित करते हुए वे हिंदी का खास ध्यान रख रही थीं. यह बड़ी भूमिका के लिए उनकी छवि तैयार करने के प्रयासों का एक हिस्सा है, लेकिन यह भी सच है कि रास्ता आसान नहीं होगा.

    राजनीति की बेहतर समझ के बावजूद बनर्जी के लिए उत्तर भारत की राजनीति पर पकड़ बनाना आसान नहीं होगा. मनमोहन सिंह के पीएम रहते हुए भी बनर्जी ने मुलायम सिंह यादव का भरोसा कर डॉक्टर सिंह को यूपीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर दिखाया था. इसके बाद जब यादव ने यू-टर्न लेकर प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने पर सहमति दी, तो वे गुस्से से लाल हो गई थीं.

    कोलकाता से दिल्ली तक की सड़क काफी लंबी, धूलभरी और आश्चर्यों से भरी हुई है. इसके लिए बनर्जी को शायद बहुत तैयारी करने की जरूरत पड़ेगी.

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