भारत-पाकिस्तान राजनीतिक मजबूरियों से ऊपर उठ वार्ता की पहल करें: महबूबा

भारत-पाकिस्‍तान की ओर बढ़ रही हताहतों की संख्या को देखना दुखद: महबूबा मुफ्ती
भारत-पाकिस्‍तान की ओर बढ़ रही हताहतों की संख्या को देखना दुखद: महबूबा मुफ्ती

Jammu Kashmir: महबूबा मुफ्ती की टिप्पणी पाकिस्तान (Pakistan) द्वारा शुक्रवार को संघर्ष विराम का उल्लंघन करने के बाद दोनों देशों के बीच नियंत्रण रेखा पर हुई भारी गोलाबारी के बाद आई है. नियंत्रण रेखा पर हुई भारी गोलाबारी की वजह से दोनों ओर से जानें गई हैं.

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  • Last Updated: November 14, 2020, 7:27 PM IST
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श्रीनगर. पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी/पीडीपी (PDP) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने शनिवार को कहा कि भारत एवं पाकिस्तान अपनी राजनीतिक मजबूरियों से ऊपर उठें और संवाद की पहल करें. उन्होंने कहा कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) के दोनों ओर बढ़ रही हताहतों की संख्या को देखना दुखद है. महबूबा मुफ्ती की टिप्पणी पाकिस्तान (Pakistan) द्वारा शुक्रवार को संघर्ष विराम का उल्लंघन करने के बाद दोनों देशों के बीच नियंत्रण रेखा पर हुई भारी गोलाबारी के बाद आई है. नियंत्रण रेखा पर हुई भारी गोलाबारी की वजह से दोनों ओर से जानें गई हैं.

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच सीमा पर संघर्ष विराम को लेकर बनी सहमति और कार्यान्वयन को बहाल करना अच्छी शुरुआत हो सकती है. महबूबा मुफ्ती ने ट्वीट किया, 'एलओसी के दोनों ओर हताहतों की बढ़ती संख्या को देखना दुखद है. भारतीय और पाकिस्तानी नेतृत्व राजनीतिक मजबूरियों से ऊपर उठकर संवाद की पहल करें. वाजपेयी जी और मुशर्रफ साहब के बीच संघर्ष विराम पर बनी सहमति और अनुपालन को बहाल किया जाता है तो यह अच्छी शुरुआत होगी.'

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स्वतंत्रता के अधिकार को लेकर उच्चतम न्यायालय की नाराज़गी चयनात्मकः महबूबा मुफ्ती
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने बुधवार को कहा कि वह स्वतंत्रता के अधिकार पर उच्चतम न्यायालय की 'नाराज़गी' से सहमत हैं, लेकिन जब बात कश्मीरियों की होती है तो यह चयनात्मक हो जाती है. मुफ्ती का बयान रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणी के संदर्भ में आया है. पूर्व मुख्यमंत्री ने ट्विटर पर कहा, 'स्वतंत्रता के अधिकार पर उच्चतम न्यायालय की नाराज़गी से सहमत हूं. लेकिन दुख की बात है कि यह नाराज़गी चयनात्मक है क्योंकि बेबुनियाद इल्जामों पर सैकड़ों कश्मीरियों और पत्रकारों को जेलों में बंद कर रखा गया है. इन मामलों में अदालत का फैसला भूल जाइए, उनकी तो सुनवाई तक नहीं होती है. उनकी स्वतंत्रता के लिए तत्कालिकता क्यों नहीं है?"
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