बाबा प्रेम बहुत करते थे, बस जताना उन्हें नहीं आता था : कलापिनी कोमकली

मैं छोटी थी तो आई-बाबा मुझे अपने नहीं लगते और संगीत दुश्मन लगता. आखिर वह संगीत ही तो था, जिसने उन्हें मुझसे दूर कर रखा था. मैं चाहती थी कि बाबा न गाएं और मां तो बिलकुल ही न गाएं. एक बार की बात है, देर रात अचानक मेरी आंख खुली तो बाबा के कमरे से मां के गाने की आवाज सुनाई दी.

News18Hindi
Updated: April 8, 2017, 9:25 AM IST
बाबा प्रेम बहुत करते थे, बस जताना उन्हें नहीं आता था : कलापिनी कोमकली
kumar Gandharva
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Updated: April 8, 2017, 9:25 AM IST
मैं छोटी थी तो आई-बाबा मुझे अपने नहीं लगते और संगीत दुश्‍मन लगता. आखिर वह संगीत ही तो था, जिसने उन्‍हें मुझसे दूर कर रखा था. मैं चाहती थी कि बाबा न गाएं और मां तो बिलकुल ही न गाएं. एक बार की बात है, देर रात अचानक मेरी आंख खुली तो बाबा के कमरे से मां के गाने की आवाज सुनाई दी. मैं दौड़कर उनके कमरे में गई और मां से लिपटकर रोने लगी, "तुम मत गाओ." वे गाते-गाते रुक गईं. संगीत मुझे इस कदर नापसंद था कि बहुत लंबे समय तक मैं उससे दूर ही रही. बाबा ने भी कभी संगीत सीखने पर बहुत जोर नहीं दिया. वह अपनी कोई बात कभी किसी पर थोपते नहीं थे.

(चित्र : पिता कुमार गंधर्व के साथ कलापिनी)

बचपन में हम पर संगीत न थोपने के पीछे मुझे एक और वजह लगती है. वे बाल कलाकार थे. खुद बहुत छुटपन से गा रहे थे. वे घर के बड़े थे और इससे पहले कि उन्हें इस बात का एहसास हो पाता, तमाम जिम्मेदारियां उनके सिर आ पड़ी थीं. गाना हर बार उनके लिए कोई खुशी की बात नहीं होती. उस जमाने में रात-रात भर महफिलें चला करती थीं. कई बार उन्हें नींद से उठाकर गाना गवाया जाता. वे बच्चे ही थे. और बच्चों की तरह उन्हें भी अपनी नींद प्यारी थी. वे रोने लगते, मुझे नहीं गाना. लेकिन बालक कुमार गंधर्व के सामने न गाने और सिर्फ अपनी मर्जी से गाने का विकल्प तो था ही नहीं. ऐसे में कई बार उन्हें डांट पड़ती, मार भी पड़ती. दूसरे बच्चों की तरह खेलना, घूमना, आइसक्रीम, टॉफी खाना, शैतानियां करना उन्हें कभी नसीब न हुआ.



एक उम्र के बाद तो ऐसा हुआ कि वे संगीत के साथ यूं एकाकार हो गए कि मानो वे दो हैं ही नहीं. लेकिन बचपन की ये घटनाएं जरूर कहीं उनके अवचेतन में बैठ गई थीं, इसलिए उन्होंने कभी बचपन में मुझ पर या मुकुल भाई पर संगीत सीखने का कोई दबाव नहीं बनाया. कभी जबर्दस्ती बिठाकर सिखाने की कोशिश नहीं की, कभी नहीं कहा कि ये गाकर सुनाओ, वो गाकर सुनाओ. बाबा डांटते नहीं थे पर बहुत प्रेम भी नहीं दिखाते. आज मैं जानती हूं कि बाबा प्रेम बहुत करते थे, बस जताना उन्‍हें नहीं आता था. हम बाकी बच्चों की तरह खेलते, स्कूल जाते, पढ़ते. संगीत तो देवास के उस घर भानुकुल की रगों में बह रहा था. भागकर जाते भी तो कितनी दूर जा पाते. लौटना तो एक दिन था ही. बाबा किसी भी अर्थ में पारंपरिक लोगों की तरह नहीं थे. न पारंपरिक पिता, न पारंपरिक पति. मेरी मां वसुंधरा कोमकली उनकी शिष्‍या थीं और विवाह के बाद भी वह उस भूमिका से कभी बाहर नहीं आ पाईं. वो कई बार हंसकर कहती भी थीं- मैं कुमार जी की पत्नी नहीं, आज भी उनकी शिष्‍या ही हूं. वे बाबा की हर सुविधा, हर जरूरत का ख्याल रखतीं.

(चित्र : पत्‍नी वसुंधरा, बेटी कलापिनी और पोते भुवनेश के साथ कुमार जी)

बाबा की नींद बहुत कच्ची थी और मां एक पैर पर खड़ी रहतीं कि कहीं बच्चों की आवाज से उनकी नींद में खलल न पड़ जाए. पिता आम पुरुषों की तरह नहीं थे. कह सकते हैं कि बिलकुल रोमांटिक नहीं थे. मजाल है, जो वे कभी मां की साड़ी या गजरे की तारीफ कर दें या कह दें कि तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो. हां वो मां को प्रेम बहुत करते थे. प्रेम जताने के उनके तरीके अलग थे. वे शब्दों में नहीं, संगीत में कहते. मां की तबीयत, आराम, सुख-दुख के प्रति संवेदनशील बहुत थे. उनका तरीका अनोखा था. ख्याल रखते पर जताते नहीं. ऐसे छिपाते कि कहीं कोई जान न ले. आई-बाबा को साथ गाते देखना ईश्‍वरीय साक्षात्कार की तरह था. वह संगत, वह संतुलन, वह शिखर, जहां दोनों साथ पहुंचते. बाबा का गाना तो ऐसा था कि अगले क्षण उनके सुर कहां पहुंच जाएंगे, खुद बाबा भी नहीं जानते थे. वे किसी राग में बंधकर नहीं गाते. किसी यायावर की तरह बस अनंत की खोज में निकल पड़ते. मजाल है, जो मां का तानपुरा कभी उनके सुरों की बेचैन भटकन में भटक गया हो. सुर कहीं से कहीं का रुख कर लें, तानपुरा उससे पहले उन सुरों को पकड़ लेता. यह अलौकिक बात थी.

(चित्र : कुमार जी का साधाना कक्ष, भानुकुल देवास)
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कुल मिलाकर बात ये कि कुमार गंधर्व और वसुंधरा कोमकली का दांपत्य पारंपरिक पति-पत्नी की तरह नहीं था, लेकिन दोनों इस कदर एक-दूसरे में एकाकार हो चुके थे कि दो लगते ही नहीं थे. संवाद के लिए उन्हें शब्दों की जरूरत नहीं थी. बिना कहे वे एक-दूसरे की बात समझ जाते. बाबा बच्चों से भी लाड़ जताने, साथ खेलने, स्कूल ले जाने और होमवर्क कराने वाले पिता नहीं थे. लेकिन कभी संगीत, तो कभी किताबों के जरिए जीवन के दार्शनिक सवालों पर बात करते. कभी मुझे कोई किताब पढ़ने के लिए कहते, मैं कोई किताब पढ़ रही होती तो बीच-बीच में पूछते, कहां पहुंची. रवींद्र बाबू का जिक्र आया क्या. मैंने उन्हें पूरी महाभारत पढ़कर सुनाई थी. फिर जब मैंने संगीत सीखना शुरू किया तो वह सानिध्य भी कई बार बहुत अलौकिक होता था. यह अनुभूति तब होती है, जब आपकी आत्मा संगीत के संग रमने लगे.

बाबा कठोर नहीं थे, बलपूर्वक रियाज नहीं करवाते, वे सुरों को, सुरों की आत्मा को समझने की बात करते, उसे देखने की, उसमें रमने की. कहते, "यह कोशिश करने से नहीं होगा, समर्पण से होगा. खुद को सुरों को दे देने से होगा."

(चित्र : बड़े भाई मुकुल शिवपुत्र के साथ कलापिनी)

यह सच है कि मेरा बचपन मेरे स्कूल और आसपास की दूसरी सहेलियों की तरह नहीं था. मैं अपनी दुनिया में बहुत अकेली थी. धीरे-धीरे जब बड़ी हो रही थी, तब भी. जीवन अनेक बदलावों से गुजर रहा था, मन में सौ उलझनें थीं, जिज्ञासाएं थीं, सवाल थे, लेकिन उनका जवाब देने वाला कोई नहीं था. मेरे आई-बाबा तो संगीत को अपना समूचा जीवन समर्पित कर चुके थे. तब मैं उनसे नाराज थी, अकेली थी, तब मैं नहीं जानती थी कि वे साधक हैं. मैं ये भी नहीं जानती थी कि साधना क्या है. उस भावना, उस अवस्था का मुझे कोई एहसास नहीं था.

कई बार वक्त गुजर जाने के बाद जब आप अपनी स्मृतियों में उससे होकर गुजरते हैं तो गुजरा हुआ एक नए रूप, नए अर्थ में खुलता है. अब मैं वो छोटी बच्ची नहीं रही. वक्त के साथ जीवन देखा और जिया है. गाते हुए खुद कई बार मैं आराधक की में अवस्था में पहुंच चुकी हूं. आज मैं जानती हूं कि साधना क्या होती है, साधक किस परम सुख की खातिर अपना सर्वस्व लुटाकर खुद को समर्पित कर देता है.

(चित्र : पत्‍नी वसुंधरा के साथ कुमार जी)

मेरी स्मृतियों में पिता अब किसी दूर के अजनबी की तरह नहीं आते. वे आते हैं बगीचे में टहलते हुए, मोगरे के फूल चुनते हुए. अपने एकांत में प्रकृति से, पेड़ों से संवाद करते हुए. बड़े मनन से सुबह-सुबह उठकर मोगरे के फूल बीन रहे हैं, उनकी पत्तियां और डंठल काट रहे हैं, उनकी माला गूंथ रहे हैं. और यह सब करते हुए उनके भीतर कोई राग, कोई बंदिश चल रही है. बात करते-करते अचानक कहीं खो जाते हैं, मानों किसी शून्‍य में चले गए हों. अचानक गाने लगते हैं, अचानक मौन हो जाते हैं. कोई पहर, कोई घड़ी ऐसी नहीं, जब उनके भीतर संगीत न बज रहा हो. भानुकुल के उनके साधना कक्ष में मैं आज भी उस संगीत को महसूस करती हूं.

(जैसा कलापिनी कोमकली ने मनीषा पांडेय को बताया)

(सभी चित्र राजहंस प्रकाशन एवं वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्‍तक  'कालजयी कुमार गंधर्व 'से साभार)
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