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बदलना होगा मर्दों का नजरिया और पुलिस का चरित्र

News18Hindi
Updated: December 1, 2019, 9:21 PM IST
बदलना होगा मर्दों का नजरिया और पुलिस का चरित्र
2011 में देश में रेप के 24206 और दहेज हत्या के 8618 मामले दर्ज हुए.

हैदराबाद की डॉक्टर (Veterinary Doctor Rape case) के साथ जो बर्बरता की गई, उसे सोच कर ही मन कांप जाता है. ऐसे अपराधियों के खिलाफ इन दिनों फिर कानून में बलात्कारी के लिए फांसी की सजा की मांग तेजी से उठ रही है. जो लोग ऐसी मांग कर रहे हैं उनका मानना है कि फांसी की सजा के प्रावधान के बाद ऐसी वारदात में कमी आएगी.

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  • Last Updated: December 1, 2019, 9:21 PM IST
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रांची, हैदराबाद (Hyderabad) और दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में बलात्कार (Rape) के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं. हाल ही में रांची (Ranchi gang rape case) के कांके स्थित एक बस स्टैंड से लॉ की स्टूडेंट को अगवा कर लिया गया. उसके साथ गैंगरेप की वारदात हुई. उसका गुनाह क्या था? महज यह कि वह अपने सहपाठी के साथ बैठी थी? इसी तरह हैदराबाद की डॉक्टर (Veterinary Doctor Rape case) के साथ जो बर्बरता की गई, उसे सोच कर ही मन कांप जाता है. ऐसे अपराधियों के खिलाफ इन दिनों फिर कानून में बलात्कारी के लिए फांसी की सजा की मांग तेजी से उठ रही है. जो लोग ऐसी मांग कर रहे हैं उनका मानना है कि फांसी की सजा के प्रावधान के बाद ऐसी वारदात में कमी आएगी.

दरअसल यह भावुक सोच है. इतिहास देखने की जरूरत है कि जिन अपराधों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है, क्या वैसे अपराध होने बंद हो गए? जवाब ‘ना’में ही मिलेगा. समाज शास्त्र के नजरिये से विचार करें तो यह समझा जा सकता है कि समाज को जागरूक कर इस तरह के अपराध में कमी तो लाई जा सकती है पर किसी भी समाज को अपराधमुक्त नहीं बनाया जा सकता. रेप के मामले में फांसी की सजा के प्रावधान से एक खतरा यह होगा कि बलात्कारी अपने ‘शिकार’ को जिंदा नहीं छोड़ेगा. अपराध मनोविज्ञान बताता है कि अपराधी अपने अपराध छुपाने के लिए साक्ष्यों को मिटाने की हरसंभव कोशिश करता है. अभी तक के अधिकतर केसों में बलात्कारी अपने ‘शिकार’ को डरा-धमका कर चुप रहने की हिदायत देता हुआ नजर आता है, पर जब रेप मामले में फांसी की सजा का प्रावधान होगा तो उसकी पहली कोशिश होगी कि कोई साक्ष्य न रहे और इसके लिए वह अपने ‘शिकार’ की जान लेने से भी गुरेज नहीं करेगा.

मानसिकता बदलने की जरूरत
बलात्कार जघन्य अपराध है, इसमें कोई दो राय नहीं. पर इस पुरुष प्रधान समाज के नजरिये से नहीं. दरअसल, इस समाज के अधितकर पुरुष इस अपराध को जघन्य इसलिए मानते हैं कि वह इस स्त्री अपराध को यौन शुचिता से जोड़कर देखते हैं. सीधे तौर पर यह अपराध पुरुषों को पुरुषविशेष के अधिकार पर किसी ‘गैरपुरुष’ द्वारा किए गए हमले की तरह दिखता है. इसलिए वह मानता है कि चाहे जो शारीरिक क्षति झेलनी हो स्त्री झेले, लेकिन वह इस अपराध के खिलाफ संघर्ष कर नाकाम कर दे. और जब कोई स्त्री शारीरिक अपंगता झेल कर इस अपराध को नाकाम कर देती है, उसे वह ‘देवी’, ‘साहसी’, ‘बहादुर’ और न जाने क्या-क्या विशेषण से विभूषित करता है. ठीक इसके उलट अगर स्त्री बलात्कारी के मंसूबे को नाकाम नहीं कर पाती तो उसके चरित्र पर ऊंगली उठाने में इस पुरुषप्रधान समाज को वक्त नहीं लगता.

स्त्री की यौन शुचिता का पुरुषवादी आग्रह जैसे-जैसे कम होगा, इस अपराध को अपने अधिकार पर हुए हमले के नजरिये से वह जब देखना बंद करेगा, स्त्री के जेहन पड़ा एक गैरजरूरी दबाव कम होता जाएगा. पर इसके साथ ही यह साफ करने की जरूरत है कि रेप जघन्य अपराध है. जघन्य इसलिए कि वह स्त्री के अधिकार का हनन करता है. उसकी निजता का हनन करता है. स्त्री के शरीर पर सिर्फ स्त्री का ही अधिकार है – यह बात पुरुषों को समझने की जरूरत है.

2011 में देश में रेप के 24206 और दहेज हत्या के 8618 मामले दर्ज हुए
स्त्री के साथ होने वाले अपराधों की संख्या के बारे में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो बतलाता है कि 2011 में देश में रेप के 24206 और दहेज हत्या के 8618 मामले दर्ज हुए, जबकि महिलाओं के साथ होने वाले अपराध (इंडियन पिनल कोड और स्पेशल एंड लोकल लॉ) के तहत 2,28,650 मामले दर्ज हुए हैं. इस तरह अगर देखें तो महज एक साल में देश भर में महिलाओं के साथ हुए अपराध के 2,61,474 मामले दर्ज हुए थे. एनसीआरबी के मुताबिक ही दिल्ली में 2011 में रेप के कुल 572 मामले दर्ज किए गए, जबकि मध्य प्रदेश में 3,406, वेस्ट बंगाल में 2,363, उत्तर प्रदेश में 2,042, आंध्र प्रदेश में 1,442, राजस्थान में 1,800, महाराष्ट्र में 1,701 और असम में 1,700 मामले दर्ज किए गए थे.

अपने देश में बलात्कार मामले में सजा दर बेहद कम है. खबरों में आते रहे छिटपुट आंकड़ों पर अगर भरोसा करें तो 2010 में ऑस्ट्रेलिया में रेप के 91.9 फीसदी मुलजिम दोषी करार दिए गए थे, इसी साल स्वीडन में 63.5, अमेरिका में 27.3, ब्रिटेन में 28.8, नार्वे में 19.2, बांग्लादेश में 10.13, रूस और स्पेन में 3.4 और कनाडा में 1.7 फीसदी रेप के आरोपी मुजरिम करार दिए गए थे. इन देशों के मुकाबले भारत में बलात्कार मामले के 1.8 प्रतिशत मुलजिमों को दोषी साबित किया जा सका था. अभियोजन निदेशालय, दिल्ली सरकार का आंकड़ा बताता है कि 2011 में दिल्ली की जिला अदालतों में रेप के कुल 650 मामले निबटाए गए, जिनमें महज 199 को दोषी करार दिया जा सका.

कई मामले पुलिस के व्यवहार और कोर्ट के चक्कर लगाने के डर से दर्ज ही नहीं कराए जाते
गवाहों का मुकरना, समझौता कर लेना, जांच में लापरवाही बरते जाने जैसी कई बातें हैं जो मुजरिम को सजा से बचा लेती हैं. अपने देश में जितने मामले रेप के दर्ज होते हैं, उससे ज्यादा मामले तो लोकलाज की वजह से या पुलिस के व्यवहार और कोर्ट के चक्कर लगाने के डर से दर्ज ही नहीं कराए जाते. पुलिस महकमे में काम कर रहे पुरुष कर्मचारी अपनी ‘पुलिसिया ताकत’ के लिए बदनाम रहे हैं. हाल का ही मामला है कि सिमडेगा पुलिस केंद्र में महिला सिपाहियों का यौन शोषण होता रहा. इसकी शिकायत जब एसपी से की गई तो उन्होंने वर्दी के इस दाग को छुपाने की कोशिश की. तब पीड़ित महिला पुलिसकर्मियों ने इसकी शिकायत मुख्यमंत्री जन संवाद केंद्र से की और इस मामले की जांच शुरू हुई. खबर के छपने के बाद एसपी ने रिपोर्टर के खिलाफ दो घंटे के भीतर मामला दर्ज कर लिया, जबकि महिला पुलिसकर्मियों के यौनशोषण की शिकायत उनके टेबल पर तीन महीने धूल फांकती रही थी.

अगर देश की पुलिस अपने चरित्र में बदलाव करे, अपनी जिम्मेवारियां ईमानदारी से पूरी करे तो न तो रेप केस में फांसी की सजा की मांग का भावुक गुबार फूटेगा, न तो देश भर में ऐसे किसी प्रदर्शन की जरूरत पड़ेगी और न ही अदालतों में सजा दर कम होंगी.

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First published: December 1, 2019, 9:21 PM IST
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