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MSP लागू हुई तो टैक्सदाताओं पर बढ़ेगा बोझ, गरीब किसान का नहीं होगा भला, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष ने चेताया

MSP लागू हुई तो टैक्सदाताओं पर बढ़ेगा बोझ, गरीब किसान का नहीं होगा भला, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष ने चेताया

किसानों को जो दाम उनके खाते में स्थानांतरित किया जाता है वह बाजार मूल्य और लागू एमएसपी के बीच का अंतर है.

किसानों को जो दाम उनके खाते में स्थानांतरित किया जाता है वह बाजार मूल्य और लागू एमएसपी के बीच का अंतर है.

गौर करने वाली बात यह है कि किसान अपनी फसल का बहुत थोड़ा हिस्सा ही बाज़ार को देते हैं, उसमें से ज्यादातर वह खुद के उपयोग के लिए रखते हैं. सरकार जितने पर एमएसपी देती है वो पूरी फसल का एक छोटा सा हिस्सा है 2018-19 के आंकड़ों के मुताबिक सरकार ने कुल पैदावार का 23.9 फीसद चावल और 20.8 फीसद गेंहू ही खरीदा था.

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    नई दिल्ली. सरकार ने कृषि कानून वापस लिया तो लगा कि शायद अब किसान वापस अपने खेतों में लौट जाएंगे. लेकिन हुआ इसका उल्टा, किसान अब न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कानूनी रूप देने पर अड़ गए हैं. विशेषज्ञ इसे एक बुरे विचार की तरह देख रहे हैं. कोलंबिया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया का मानना है कि सबसे पहले तो अगर एमएसपी को लागू किया जाता है तो देश के तमाम टैक्सदाताओं पर आने वाले एक दशक तक अरबों रुपये का बोझ बढ़ेगा. सिर्फ गेंहू और चावल के एमएसपी भुगतान की बात करें तो यह ही अच्छा खासा होगा. जबकि किसान सभी 23 फसलों पर एमएसपी लागू करने की मांग पर अड़े हुए हैं.

    सभी फसलों पर एमएसपी लागू हुई तो होगा बड़ा नुकसान
    गौर करने वाली बात यह है कि किसान अपनी फसल का बहुत थोड़ा हिस्सा ही बाज़ार को देते हैं, उसमें से ज्यादातर वह खुद के उपयोग के लिए रखते हैं. सरकार जितने पर एमएसपी देती है वो पूरी फसल का एक छोटा सा हिस्सा है 2018-19 के आंकड़ों के मुताबिक सरकार ने कुल पैदावार का 23.9 फीसद चावल और 20.8 फीसद गेंहू ही खरीदा था. खास बात यह है कि इतने के लिए भी संग्रहण एक बहुत बड़ी समस्या है. अगर ऐसे में सभी फसलों पर एमएसपी लागू कर दिया जाता है तो उससे कितना बड़ा नुकसान होगा. किसानों को जो दाम उनके खाते में स्थानांतरित किया जाता है वह बाजार मूल्य और लागू एमएसपी के बीच का अंतर है.

    दाम अब इस बात पर तय होगा कि किसान ने फसल के लिए कितने हेक्टेयर जमीन दी, एमएसपी और प्रति हेक्टेयर औसत उपज के अनुमान और गेंहू और चावल का बाजार मूल्य क्या है. साफ है कि पूरी एमएसपी कवरेज के तहत जो बाजार में बेचते हैं उसके साथ साथ जो वह खुद के इस्तेमाल के लिए रखते हैं उसका भी भुगतान होगा. इसका मतलब यह हुआ कि 2018 में जो असल कवरेज हुई उसकी तुलना में पूरी एमएसपी कवरेज की लागत 4.2 से 4.8 गुना ज्यादा होगी.

    बढ़ेंगे फलों और सब्जियों के दाम
    दूसरी समस्या इसके साथ यह है कि एमएसपी विस्तार के साथ जो फसलें कवरेज में आती हैं और जो इसके बगैर हैं उनमें बदलाव होगा. जिसका परिणाम यह होगा कि वक्त के साथ फलों औऱ सब्जियों के दामों में बढ़ोतरी होगी और इसके खाद्य प्रसंस्करण को बड़ा झटका लगेगा.

    होगा WTO के नियमों का उल्लंघन
    तीसरा भारत का एमएसपी का भुगतान पहले ही विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों का उल्लंघन करता है, दरअसल खाद्य सुरक्षा पर सार्वजनिक भंडारण के लिए बनी एक अस्थायी शांति धारा की वजह से भारत अब तक इस उल्लंघन के खिलाफ अपने व्यापारिक भागादीरों की जवाबी कार्रवाई से बचा हुआ है. लेकिन शांति क्लॉज इसे कमी के भुगतान की सुविधा नहीं देता है जब तक खाद्य सुरक्षा के लिए इसका भंडारण नहीं किया गया हो. इसके अलावा शांति की धारा के तहत जिस सार्वजनिक वितरण प्रणाली की बात की जाती है, बाकी फसलें उसका हिस्सा भी नहीं हैं.

    गरीब किसान को नहीं होगा कोई खास लाभ
    सबसे बड़ी बात यह है कि करदाताओं का अरबों रुपया जो इसके लिए लगाया जाएगा वह बड़ी जोत वाले किसानों की जेब में जाएगा. देश के दूरदराज के गांवों में बैठे गरीब किसान को इससे कोई खास लाभ नहीं होगा. 2018-19 के सर्वेक्षण के मुताबिक 54 फीसद ग्रामीण ही खेती से जुड़े हुए हैं. इसलिए एमएसपी के तहत जो भारी भरकम रकम का स्थानान्तरण होगा उसका लाभ शहरी गरीबों को नहीं ही मिलेगा. साथ ही ऐसे लोगों को भी इसका लाभ नहीं पहुंचेगा जिनके पास खेती की ज़मीन नहीं है या कम ज़मीन है. केवल 29.5 फीसद ऐसे लोग हैं जिनके पास एक हेक्टेयर ज़मीन है, महज 11.8 फीसद के पास 2 हेक्टेयर ज़मीन है. वहीं अगर ग्रामीण क्षेत्र की बात करें तो महज़ 15.93 फीसद के पास एक हेक्टेयर और 6.37 फीसद के पास दो हेक्टेयर से ज्यादा जमीन है.

    इतने बड़े पैमाने पर जो पैसों के स्थानांतरण का कार्यक्रम है उसका लाभ अधिकतर संपन्न परिवारों को ही मिलेगा. अगर अगले दशक के हिसाब से इस स्थानांतरण का अनुमान लगाएं तो यह करीब 1.5 ट्रिलियन रुपये होगा. अगर इतनी बड़ी रकम का इस्तेमाल उन 40 फीसद ग्रामीणों के लिए किया जाए जो वाकई में हाशिये पर पड़े हैं तो क्या यह बेहतर नहीं होगा.

    Tags: Farmer, Farmer Laws, Farmer leader, Farmer movement, Farmer Organization

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